कैसे भ्रमित विपक्ष 2024 के लिए आसान कर रहा है बीजेपी का रास्ता ?

नई दिल्ली, 13 दिसंबर: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी सरकार के खिलाफ विपक्षी एकता की बात तो जोर-शोर से की जाती है, लेकिन पिछले दो हफ्तों में ही विपक्षी राजनीति को देखने से लगता है कि वह 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद से अभी तक वह दिशाहीन ही बनी हुई है। संसद के भीतर हो या संसद के बाहर, भाजपा के खिलाफ विपक्षी लामबंदी ढीली पड़ती जा रही है। यहां मौजूदा सरकार के खिलाफ मजबूत मोर्चा बनाने से ज्यादा जोर खुद को विपक्ष का चेहरा बनाने पर है। विपक्ष का ज्यादातर ऐक्शन जमीनी तथ्यों से परे नजर आ रहा है और उसपर फोकस करने की कोई गंभीर पहल भी नहीं दिख रही है। सवाल है कि ऐसे आधे-अधूरे मन और खुद की इमेज चमकाने में जुटे नेताओं की वजह से क्या भाजपा के लिए 2024 चुनाव का रास्ता खुद ही आसान नहीं किया जा रहा है। सिर्फ तथ्यों पर आधारित जानकारी पर विचार कीजिए और मौजूदा राजनीतिक स्थिति का खुद ही आकलन करिए।

पवार ने अपने सारे पत्ते नहीं खोले हैं

पवार ने अपने सारे पत्ते नहीं खोले हैं

एनसीपी नेता शरद पवार पहले जरूर कह चुके हैं कि बीजेपी विरोधी विपक्षी गठबंधन कांग्रेस के बिना मुमकिन नहीं है। लेकिन, उनसे मुलाकात के बाद उनकी मौजूदगी में ही पश्चिमी बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से इस महीने के पहले दिन ही जिस तरह से यूपीए के अस्तित्व को नकार दिया तो लगा था कि पवार अब टीएमसी सुप्रीमो के लिए पिच तैयार करने लगे हैं। लेकिन, सिर्फ 12 दिन बाद ही एनसीपी ने जिस तरह से उन्हें 2024 के लिए उन्हें प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर प्रोजेक्ट करने की कोशिश की है, उससे लगता है कि मराठा नेता ने अपने सारे पत्ते अभी नहीं खोले हैं। पवार के 81वें जन्मदिन पर पार्टी नेता छगन भुजबल ने कहा कि, 'आज देश का काफी सारा विपक्ष उनकी ओर (पवार) उम्मीद से देख रहा है। आपने महाराष्ट्र में जो चमत्कार (शिवसेना-एनसीपी और कांग्रेस की सरकार बनवाकर) किया है, आपको 2024 में दिल्ली में भी वही चमत्कार करना चाहिए।'

पवार के भतीजे ने उनके लिए पेश की दावेदारी

पवार के भतीजे ने उनके लिए पेश की दावेदारी

अकेले भुजबल पवार के नाम पर बैटिंग नहीं कर रहे हैं। पार्टी सांसद अमोल खोले ने तो पवार को पीएम मटेरियल बताने के लिए दलील भी तैयार कर ली है। उनका कहना है कि 'देश को आज आपके (पवार) मार्गदर्शन की आवश्यकता है। अगर 26 सांसदों वाला गुजरात अपना प्रधानमंत्री बना सकता है (तथ्य यह है कि पीएम मोदी यूपी के वाराणसी से सांसद हैं, जहां भाजपा को लगातार दो चुनावों से अधिकतर सीटें मिल रही हैं), तो 48 सांसदों वाले राज्य (महाराष्ट्र) का प्रधानमंत्री क्यों नहीं हो सकता है? वे (पवार)देश के सबसे ऊंचे पद पर क्यों नहीं बैठ सकते? हमें यह सोचना होगा और इसके लिए काम करना होगा।' गौरतलब है कि पवार खुद ही कह चुके हैं कि उनकी पार्टी के पास इतने सांसद ही नहीं होंगे कि वह खुद को पीएम पद का उम्मीदवार समझने लगें। लेकिन, उनके भतीजे रोहित पवार जो इशारा कर रहे हैं, उससे जाहिर है कि किसके अंतर्मन में क्या चल रहा है। उन्होंने कहा, 'यह (प्रधानमंत्री) पद के लिए नहीं, बल्कि लोकतंत्र बचाने की लड़ाई है और अगर पवार साहेब इसका नेतृत्व करते हैं और यदि बाकी नेता उनका समर्थन करते हैं, तब बीजेपी के विरोध में विकल्प तैयार हो सकता है।'

ममता बनर्जी अपने लिए कर रही हैं बैटिंग

ममता बनर्जी अपने लिए कर रही हैं बैटिंग

बंगाल से बाहर कांग्रेस की जमीन पर अपने लिए आधार तैयार करने में जुटीं ममता बनर्जी ने यूपीए और कांग्रेस के राहुल गांधी की ओर इशारा करके जो कुछ कहा था, वह मराठा नेता की मौजूदगी में कहा था। उन्होंने साफ कहा था कि यूपीए जैसा अब कुछ है ही नहीं। ऊपर से बिना नाम लिए पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की राजनीतिक गंभीरता पर सवाल खड़े कर दिए थे। उन्होंने गोवा में टीएमसी का आधार मजबूत करने के लिए ऐसे लोक-लुभावन वादे किए हैं, जिसपर दिग्गज कांग्रेसी पी चिदंबरम कह रहे हैं कि 'गोवा का तो भगवान ही मालिक है।' पश्चिम बंगाल के प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष और लोकसभा में कांग्रेस के पूर्व नेता सदन अधीर रंजन चौधरी तो ममता बनर्जी पर बीजेपी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इशारे पर कांग्रेस को कमजोर करने के आरोप तक लगा चुके हैं। वहीं, राजनीतिक विश्लेषकों का साफ मानना है कि पश्चिम बंगाल की सीएम ने प्रदेश में तीसरी बार सत्ता में आकर इतनी उत्साहित हैं कि वह 2024 के लिए अपना राष्ट्रीय जनाधार कायम करने में लगी हैं और मकसद सिर्फ एक ही है कि खुद को पीएम मोदी के खिलाफ विपक्ष का चेहरा के रूप में प्रोजेक्ट करना।

कांग्रेस तो बाई-डिफॉल्ट मानती है राहुल को पीएम मटेरियल

कांग्रेस तो बाई-डिफॉल्ट मानती है राहुल को पीएम मटेरियल

2024 के लोकसभा चुनाव में अभी कम से कम ढाई साल बाकी हैं। लेकिन, इतने पहले विपक्ष में जो राजनीति शुरू हुई है, उससे तय है कि बीजेपी-विरोधी मुख्य विपक्षी खेमे में अभी तक कम से कम तीन नेताओं के लिए पीएम-उम्मीदवारी की दावेदारी ठोकी जा चुकी है। क्योंकि, पवार और बनर्जी के अलावा कांग्रेस के नेता राहुल गांधी तो बाय-डिफॉल्ट पीएम पद के उम्मीदवार तो माने ही जाते रहे हैं। हाल ही में राहुल से कई दफे मिल चुके शिवसेना प्रवक्ता और सांसद संजय राउत ने पार्टी के मुखपत्र सामना में अपने कॉलम में लिखा है, 'राहुल गांधी के नेतृत्व को लेकर बहुत ज्यादा भ्रांति और गलतफहमी पैदा की जा रही है......इस तरह की तस्वीर पेश की जा रही है कि विपक्ष उनके नेतृत्व में एकजुट होने को तैयार नहीं है, जैसे कि (प्रधानमंत्री) नरेंद्र मोदी और बीजेपी के लिए राजनीतिक मैदान खुला रह जाए.....यह सच नहीं है।' वैसे ममता बनर्जी ने राहुल की राजनीतिक गंभीरता को लेकर जो पश्नचिन्ह खड़े किए हैं, वह पवार की मौजूदगी में ही किए हैं और पिछले दो वर्षों से मराठा नेता ही राउत और शिवसेना सुप्रीमो उद्धव ठाकरे के भी मेंटर बने हुए हैं।

कांग्रेस विपक्ष को नेतृत्व देने से क्यों पिछड़ रही है ?

कांग्रेस विपक्ष को नेतृत्व देने से क्यों पिछड़ रही है ?

शुरू में ही कहा है विपक्ष चाहे दावे जितने करे, लेकिन वह बीजेपी और पीएम मोदी के खिलाफ एकजुटता कायम करने को लेकर अभी भी भ्रमित ही लग रहा है। एक उदाहरण रविवार को जयपुर में महंगाई के खिलाफ हुई कांग्रेस की विशाल रैली का भी है। केंद्र की बीजेपी सरकार के खिलाफ महंगाई इस समय बड़ा मुद्दा है। लेकिन, कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष ने वहां हिंदू या हिंदुत्व जैसे मुद्दे उछालकर खूब तालियां बटोरीं। जबकि, कांग्रेस चाहती तो महंगाई के मसले पर भारतीय जनता पार्टी को घेरने के लिए उसके पास काफी कुछ था। पांच राज्यों में चुनाव होने हैं और वहां बीजेपी को इस मुद्दे पर आसानी से घेरा जा सकता है। लेकिन, खुद ही ऐसे मुद्दे पर उसे दावत दी जा रही है, जिसपर भाजपा के लिए खेलना ज्यादा आसान साबित हो सकता है।

भ्रमजाल से नहीं निकल पा रहा विपक्ष ?

भ्रमजाल से नहीं निकल पा रहा विपक्ष ?

विपक्षी खेमे की अगुवाई की उम्मीद करने वाली पार्टियों का रुख स्पष्ट है। लेकिन, कांग्रेस अभी भी धरातल की राजनीति से दूर होकर उम्मीदों के सहारे सियासत करती नजर आ रही है। पार्टी के एक नेता अभिषेक मनु सिंघवी ने टीओआई को दिए एक इंटरव्यू में कहा है, 'विपक्ष की एकता ना सिर्फ समय की मांग है, बल्कि 2024 में यह होगा। किसी को भी शुरुआती झटकों से गुमराह नहीं किया होना चाहिए, जो स्थानीय चुनावों तक सीमित हो सकती हैं या क्षेत्रीय कारणों से हो सकती हैं।' सवाल है कि अगर टीएमसी गोवा में खुद को मजबूत कर रही है या फिर उत्तर-पूर्व में कांग्रेस की जमीन खिसका रही है तो उससे आखिर नुकसान किसका हो रहा है? अगर गोवा में बीजेपी सरकार के खिलाफ अलग-अलग लड़ रही आम आदमी पार्टी, कांग्रेस और टीएमसी की वजह से भाजपा को फायदा हुआ तो राजनीतिक मुश्किल किसके लिए खड़ी होगी?

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