यूसीसी पर संसदीय समिति भी हुई ऐक्टिव, गोवा के लोगों से भी ली गई राय, कॉमन सिविल कोड पर क्या बोले? जानिए

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से देश में हर समुदाय के लोगों के लिए यूनिफॉर्म सिविल कोड की आवश्यकता पर जोर दिए जाने के बाद विधि मामलों पर संसद की स्थाई समिति भी इसको लेकर काफी सक्रिय हो गई है।

भाजपा के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सांसद सुशील मोदी की अगुवाई वाली विधि मामलों की संसद की 30 सदस्यीय स्थाई समिति ने यूसीसी पर चर्चा के लिए विधि आयोग और विधि मंत्रालय के अधिकारियों को बैठक के लिए बुलाया है।

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यूसीसी पर संसद की स्थायी समिति ने बुलाई बैठक
सुशील मोदी की अगुवाई वाली विधि मामलों की संसदीय समिति 3 जुलाई को यूनिफॉर्म सिविल कोड को लेकर दो राउंड में बैठक करने वाली है। यह बैठक विधि आयोग के साथ-साथ कानून मामलों के विभाग और विधायी विभाग के बड़े अफसरों के साथ होगी। यह दोनों ही विभाग विधि मंत्रालय के ही अधीन आते हैं।

सुशील मोदी ने ईटी से कहा है, 'समिति ने यूसीसी पर चर्चा के लिए विधि आयोग और विधि मंत्रालय के शीर्ष अधिकारियों को आमंत्रित किया है।' दरअसल, पीएम मोदी ने कहा है कि देश को यूसीसी की जरूरत है, क्योंकि 'अलग-अलग समुदायों के लिए भिन्न कानून' नहीं चल सकते।

22वें विधि आयोग ने लोगों और संस्थाओं से सुझाव मांगे हैं
इससे पहले 22वें विधि आयोग ने यूनिफॉर्म सिविल कोड को लेकर जनता और मान्यताप्राप्त धार्मिक संगठनों से 30 दिनों के अंदर सुझाव आमंत्रित किए हैं। विधि मंत्रालय की इसी पहल के बाद से इस मसले को लेकर देश में सियासी सरगर्मी बढ़ी हुई है और संकेत मिल रहे हैं कि इस साल होने वाले राज्य विधानसभा और 2024 के लोकसभा चुनावों में यह बड़ा मुद्दा बन सकता है।

संसदीय समिति के सदस्य गोवा का भी कर चुके हैं दौरा
वैसे पीएम मोदी के बयान के बाद एक तरफ यह चर्चा शुरू है कि सरकार यूसीसी को बहुत जल्द संसद में लाने की सोच रही है। हालांकि, विधि और कानून मंत्रालय की संसदीय समिति इसपर अध्ययन का कार्य पहले से ही कर रही है। इस सिलसिले में संसदीय समिति के सदस्यों ने पिछले साल गोवा का भी दौरा किया था।

गोवा में पहले से है कॉमन सिविल कोड
गोवा जाने का इरादा ये था कि पुर्तगाली सिविल कोड या कॉमन सिविल कोड को लेकर वहां के लोग क्या सोचते हैं। क्योंकि, गोवा के पुर्तगाल के कब्जे से मुक्त होने के बाद भी वहां के निवासियों पर यही कोड प्रभावी है। समिति के सदस्य कुछ सवालों के साथ गोवा के लोगों के बीच पहुंचे थे, जैसे कि इसे कैसे लागू किया गया था।

'राज्य के अधिकतर लोग, इससे काफी खुश और संतुष्ट'
संसदीय समिति के एक सदस्य के मुताबिक गोवा के दौरे पर समिति ने महसूस किया कि राज्य के अधिकतर लोग, 'इससे काफी खुश और संतुष्ट हैं।' हालांकि, विवाह और संपत्ति के बंटवारे को लेकर कुछ पुरातन प्रावधान थे, जो कि समानता के सिद्धांत पर आधारित नहीं थे। गौरतलब है कि आज की तारीख में देश में गोवा ही सिर्फ एक ऐसा राज्य है, जहां इस तरह का समान नागरिता वाला कानून मौजूद हैं। दूसरा राज्य उत्तराखंड हो सकता है, जहां बहुत जल्द इसे लागू होते हुए देखा जा सकता है।

पूर्ण बहुमत की सरकार में यूसीसी लाने का रहा है बीजेपी का वादा
भारतीय जनता पार्टी के चुनावी मसौदे में यूनिफॉर्म सिविल कोड को हमेशा से जगह मिली है। सबसे पहले इसे 1967 में भारतीय जनसंघ के ही घोषणापत्र में जगह दी गई थी। उसके बाद यह पार्टी के कोर एजेंडे में शामिल हो गया। पार्टी का वादा रहा है कि पूर्ण बहुमत की सरकार बनने पर यह लागू किया जाएगा और इस समय बीजेपी की पूर्ण बहुमत वाली सरकार का दूसरा कार्यकाल का अंतिम साल चल रहा है

सरकार ने वित्त आयोग से मांगे थे सुझाव
पिछले साल तत्कालीन कानून मंत्री किरेन रिजिजू ने राज्यसभा में एक लिखित सवाल के जवाब में कहा था कि सरकार ने लॉ कमीशन से कहा है कि यूसीसी से संबंधित विभिन्न विषयों पर विचार करे और सरकार को सुझाव सौंपे। 22वें वित्त आयोग की मौजूदा पहले उसी की अगली कड़ी है।

यूसीसी लागू होने पर क्या होगा?
यूनिफॉर्म सिविल कोड का मकसद देश के सभी नागरिकों के लिए एक समान विवाह, तलाक, गोद लेने और उत्तराधिकार का कानून लागू करना है। इस समय कुछ धर्मों के लिए अलग पर्सनल लॉ की व्यवस्था है। उदाहरण के लिए मुस्लिम पुरुषों को कुछ परिस्थियों में चार-चार शादियों का अधिकार है, जबकि हिंदू मैरिज ऐक्ट के तहत ऐसा करना गैर-कानूनी है। इसी तरह से संपत्ति के अधिकार में भी भेदभाव है।

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