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हिंदू मैरिज ऐक्ट में ऐसा क्या है, जिसे अपने हक में बता रहे हैं समलैंगिक विवाह के समर्थक ? जानिए

समलैंगिक विवाह के पक्ष में दावा किया जा रहा है कि हिंदू विवाह कानून में विवाह के लिए स्त्री-पुरुष होने की शर्त नहीं है। इसके पक्ष में प्रचीन इतिहास का भी हवाला दिया जा रहा है।

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सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार की ओर से समलैंगिक विवाह पर भारतीय सभ्यता और संस्कृति की दुहाई देकर आपत्ति जताने के बाद इसके समर्थक तर्क दे रहे हैं कि हिंदू विवाह कानून और विशेष विवाह कानूनों में पहले से ही इसके लिए आधार तैयार हैं। क्योंकि, उनके मुताबिक ये कानून लैंगिकता के मामले न्यूट्रल हैं। समलैंगिक विवाहों पर काम कर चुके कुछ विद्वानों का मानना है कि भारत के प्राचीन इतिहास में भी ऐसे 'विवाहों' का जिक्र है और अभी इसपर हाय-तोबा मचाने का कोई मतलब नहीं है। इसलिए यह जानना दिलचस्प हो गया है कि हिंदू विवाह कानून में आखिर कैसे शब्द लिखे गए हैं, जिसे ऐसे विवाहों को जायज बताने के लिए बड़े हथियार के तौर पर पेश किया जा रहा है।

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दो हिंदुओं के बीच विवाह का मतलब ?
समलैंगिक विवाह के समर्थकों की ओर से दलील दी जा रही है कि भारत में हिंदू विवाह कानून और विशेष विवाह कानूनों की भाषा जेंडर-न्यूट्रल है, जिसे वे समलैंगिक विवाह को मान्य बताने के लिए बड़ा आधार मान रहे हैं। दरअसल, टीओआई को दिए एक इंटरव्यू में मोंटाना यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर रुथ वनीता ने भी ये दलील दी है। वह 'लव्स राइट: सेम-सेक्स मैरिज इन मॉडर्न इंडिया' की लेखक हैं और उन्होंने भारत में ऐसे समूहों पर व्यापक शोध के बाद यह किताब लिखी है। उन्होंने कहा है कि हिंदू विवाह कानून कहता है कि 'विवाह किसी भी दो हिंदुओं के बीच संपन्न हो सकता है।'

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हिंदू मैरिज ऐक्ट में क्या है ?
दरअसल, हिंदू विवाह कानून,1955 की शर्तों में कहा गया है- 'एक हिंदू विवाह किसी भी दो हिंदुओं के बीच संपन्न हो सकती है, अगर विवाह के लिए निम्नलिखित शर्तें पूरी होती हों....' समलैंगिक विवाह के समर्थक कानून की इसी भाषा को पकड़ रहे हैं कि इसमें विवाह के लिए आदमी और औरत जैसे शब्दों का इस्तेमाल नहीं हुआ। बल्कि, इसमें इसकी जगह वर-वधु शब्द लिखा गया है। इस कानून में विवाह के समय वर के लिए विवाह की आवश्यक आयु 21 साल और वधु के लिए 18 साल बताया गया है।

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समलैंगिक विवाह में केस स्टडी क्या है ?
प्रोफेसर वनीता का कहना है कि ज्यादातर समलैंगिक युगल खुद को दूल्हा और दुल्हन की तरह ही पेश करते हैं। इस तकनीकी आधार पर उन्हें लगता है कि समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता दिलाने में कोई रुकावट नहीं होनी चाहिए। केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में समलैंगिक विवाह की 'शुचिता' पर सवाल उठाए हैं। लेकिन, इसके समर्थन में यह दलील दी जा रही है कि यदि एक आदमी और औरत के रिश्तों में 'पवित्रता' हो सकती है, तो समलैंगिकों के बीच के प्रेम संबंधों में भी हो सकती है। उनका दावा है कि उनकी किताब में ऐसे कई युवा, गैर-अंग्रेजी भाषी, कम आय के समूहों का जिक्र है, जिन्होंने भारत के कई इलाकों में हिंदू रीति-रिवाज से शादी की है।

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    बिहार, एमपी और ओडिशा जैसे राज्यों का उदाहरण
    उन्होंने अपनी किताब में ऐसे कई उदाहरण देकर साबित करने की कोशिश की है कि देश में कम से कम 1987 के बाद ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जिसमें समलैंगिक शादियां हुई हैं, खासकर महिलाओं के बीच और उन्हें समाज ने मान्यता भी दी है। उन्होंने बिहार, मध्य प्रदेश, ओडिशा जैसे राज्यों की कुछ घटनाओं का हवाला दिया है। यह भी दावा किया गया है कि 1980 के बाद से कई ऐसी संयुक्त आत्महत्याओं की घटनाएं भी हुई हैं, जिसमें पुरुषों या महिलाओं की जोड़ी ने तब सुसाइड कर लिया, जब उन्हें अलग करने की कोशिश की गई। ऐसे लोगों ने सुसाइड नोट में कथित तौर पर लिखा कि अगर इस जन्म में वह नहीं मिल सके तो अगले जन्म में जरूर एक होकर रहेंगे।

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    भारत में समलैंगिकता का इतिहास
    मोंटाना यूनिवर्सिटी की विद्वान के मुताबिक चौथी सदी के कामसूत्र में पुरुषों के बीच आकस्मिक संबंधों का जिक्र किया गया है। लेकिन, यह उनके लिए है, जो मित्र हों और एक-दूसरे पर भरोसा करते हों। 11वीं सदी में लिखी गई कथासरित्सागर के मुताबिक एक दस्यु सरगना पुलिंदक एक व्यापारी के बेटे वसुदत्त को देखकर पहली ही नजर में दीवाना हो गया। इसके अनुसार फिर दोनों साथ-साथ रहने लगे। वसुदत्त ने तो एक महिला से विवाह भी किया, लेकिन पुलिंदक ने नहीं की। जब, वसुदत्त का निधन हुआ तो पुलिंदक समेत उसकी दोनों पत्नियों ने आत्महत्या कर ली। उनके दावे के मुताबिक 2002 में सिएटल में एक तमिल शैव पुजारी ने एक समलैंगिक-विवाह संपन्न करवाया था। 'उन्होंने मुझे बताया था कि विवाह आत्माओं का मिलन है और आत्मा पुरुष या स्त्री नहीं होता।'

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    मित्रता और समलैंगिकता
    उनके मुताबिक प्राचीन भारत में ही नहीं, चीन, जापान, ग्रीस, रोम और मध्य यूरोप में भी मित्रता को एक आदर्श माना जाता रहा है। जैसे अरस्तू ने कहा था कि दो पुरुष मित्र सब कुछ साझा करते हैं और पुरुष-स्त्री का विवाह भी एक मित्रता है। उनका कहना है कि वैदिक विवाह समारोह में पति-पत्नी एक दूसरे को 'सखा' बुलाते थे। मित्रता दोनों तरह के संबंधों के लिए आदर्श हो सकती है, विषमलैंगिक और समलैंगिक दोनों तरह के पति-पत्नियों के बीच।

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