हिमाचल में सरकार तो बच गई, लेकिन लोकसभा चुनाव में बदल सकता है समीकरण, इन 3 सीटों पर बढ़ेगी कांग्रेस की टेंशन
हिमाचल प्रदेश में राज्यसभा की सीट गंवाने के बाद कांग्रेस ने तत्कालीक रूप से अपनी सरकार को तो बचा लिया है। लेकिन, उसके सामने सबसे बड़ा संकट अब लोकसभा चुनाव है। क्योंकि, 6 बागी विधायकों पर कार्रवाई के बाद उनके प्रभाव वाले इलाकों पर पार्टी को मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है।
हिमाचल प्रदेश की राजनीति पर पकड़ रखने वाले जानकारों को भी लगता है कि कांग्रेस पार्टी के अंदर आए इस संकट का असर कुछ लोकसभा क्षेत्रों में देखने को मिल सकता है।

चार बागियों का हमीरपुर लोकसभा सीट में प्रभाव
राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस के प्रत्याशी अभिषेक मनु सिंघवी के खिलाफ मतदान करने वाले पार्टी के 6 बागी विधायकों में से चार की विधानसभा सीटें हमीरपुर लोकसभा क्षेत्र में आती हैं।
ये हैं राजेंद्र राणा, इंदर दत्त लखनपाल, चैतन्य शर्मा और देवेंद्र भुट्टो। अभी हमीरपुर लोकसभा सीट का प्रतिनिधित्व केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर कर रहे हैं। पिछली बार ठाकुर को यहां 68.81% वोट मिले थे। ऐसे में यहां चार-चार विधायकों की नाराजगी कांग्रेस को इस बार और भारी पड़ सकती है।
कांगड़ा लोकसभा सीट में क्या होगा?
इसी तरह से सुधीर शर्मा का चुनाव क्षेत्र धर्मशाला, कांगड़ा लोकसभा सीट में पड़ता है। यहां भाजपा प्रत्याशी किशन कपूर को 2019 में 71.84% वोट आए थे। शर्मा को 2022 के विधानसभा चुनाव में 45% वोट मिले थे। उनका भाजपा खेमे में झुकना, किसी भी तरह से कांग्रेस की सेहत के लिए ठीक नहीं माना जा रहा है।
जानकारों का मानना है कि तीन बार के विधायक राजेंद्र राणा और चार बार के विधायक सुधीर शर्मा अपने-अपने इलाकों में बहुत ज्यादा प्रभावशाली हैं और उनकी वजह से कांग्रेस को नुकशान होने की आशंका बढ़ सकती है।
मंडी में भी कांग्रेस की बढ़ सकती है मुश्किल
इसी तरह छठे बागी रवि ठाकुर लाहौल-स्पीति (सुरक्षित) विधानसभा सीट पर 52.91% वोट लेकर जीते थे। यह विधानसभा मंडी लोकसभा क्षेत्र का हिस्सा है। 2019 के आम चुनाव में यहां भाजपा प्रत्याशी को 68.62% वोट मिले थे। लेकिन, इस सीट पर 2021 में हुए उपचुनाव में प्रदेश कांग्रेस की अद्यक्ष प्रतिभा सिंह की जीत हुई थी।
यह संगठन की नाकामी का भी संकेत है- एक्सपर्ट
खुद प्रतिभा सिंह ने गुरुवार को कबूल किया है कि बागियों को अयोग्य ठहराए जाने से आम चुनावों पर असर पड़ेगा। हिमाचल प्रदेश यूनिवर्सिटी के राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर हरीश ठाकुर का भी कहना है कि अपने घर को सहेजकर नहीं रख पाने का पार्टी पर दूरगामी असर पड़ेगा।
टीओआई ने उनके हवाले से लिखा है, 'यह बीजेपी के लिए फायदेमंद है। अगर एमएलए अपने सीएम से खुश नहीं हैं, तो इससे मतदाताओं को गलत संकेत जाता है। यह संगठन की नाकामी का भी संकेत है और चुनावों में पार्टी के लिए नुकसानदेह साबित हो सकता है।' हालांकि, उन्होंने इससे बागियों को नुकसान होने की आशंका से भी इनकार नहीं किया है।
इसी यूनिवर्सिटी के एक राजनीतिक विश्लेषक प्रोफेसर रमेश के चौहान के मुताबिक कांग्रेस के झगड़े से बीजेपी को फायदा होगा। उनके अनुसार, 'कांग्रेस के अंदर नेतृत्व की नाकामी, विधायकों में नराजगी, सीएम और विधायकों में संवादहीनता से बीजेपी को फायदा होगा। लग तो यह रहा है कि कांग्रेस हाई कमान भी हिमाचल की जमीनी सच्चाई से अनजान रहा।'
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इस संकट की वजह से कांग्रेस के अंदर वीरभद्र गुट का दबदबा और बढ़ेगा, जिससे टिकट बंटवारे में उनकी ज्यादा चल सकती है।
सुक्खू कैंप पर हावी हो सकता है वीरभद्र गुट- राजनीतिक विश्लेषक
ठाकुर का कहना है, 'कांग्रेस हाई कमान ने जिस तरह से शिमला पर नियंत्रण के लिए विक्रमादित्य को खुश करने की कोशिश की है, उससे लगता है कि प्रदेश की राजनीति में उनका कितना महत्त्व है। मौजूदा परिस्थितियों में वीरभद्र गुट निश्चित रूप से सुक्खू कैंप पर हावी होगा। लोकसभा चुनाव में टिकट बंटवारे में इसकी बहुत बड़ी भूमिका हो सकती है।'
2014 और 2019 दोनों ही लोकसभा चुनावों में बीजेपी हिमाचल प्रदेश की चारों सीटें शिमला, हमीरपुर, कांगड़ा और मंडी जीती थी। सिर्फ 2021 में मंडी लोकसभा उपचुनाव में प्रतिभा सिंह को सहानुभूति वोट का लाभ मिला था और वह लोकसभा पहुंच गईं। 2022 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को बड़ी जीत मिली और उसने हिमालय के इस राज्य में सरकार बना ली।












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