जानिये भारत की यमन में सफलता का क्या राज, क्यों दुनिया से बेहतर है भारत

बेंगलुरू। यमन में जिस तरह के युद्ध जैसे हालात हैं ऐसी परिस्थिती में भारत ने अपने नागरिकों को वहां से सुरक्षित स्वदेश वापसी के लिए अपना सब कुछ झोंक दिया है। भारत के लिए यह अभियान सबसे मुश्किल अभियान भी रहा है। यमन और सउदी अरब ने एक दूसरे के खिलाफ युद्ध छेड़ रखा है, ऐसे हालात में यह सुनिश्चित कर पाना काफी मुश्किल हो जाता है कि दोस्त कौन है और दुश्मन कौन।

yemen crisis

पीएम मोदी और सउदी के शाह के बीच की कूटनीति

दुनिया के 23 देशों ने भारत से उनके नागरिकों को सुरक्षित निकालने के लिए भारत से मदद की गुहार लगायी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और सउदी अरब के बीच की कूटनीति ने इस अभियान में बहुत ही अहम भूमिका निभाई।

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Posted by General V.K. Singh on Tuesday, April 7, 2015

इस अभियान में भारत ने यमन का पक्ष नहीं लिया और सउदी अरब ने भारत के ऑपरेशन राहत का पूरा समर्थन किया और भारत को उसके नागरिको को वापस भारत पहुंचाने में पूरी मदद की।

लाल फीताशाही को किया दरकिनार

जब किसी देश में युद्ध जैसे हालात होते हैं तो ऐसी परिस्थितियों में लाल फीताशाही को दरकिनार करना काफी मुश्किल होता है। भारतीय नागरिकों को यमन से सुरक्षित निकालने के लिए कई नियमों और कानूनों से बचने के लिए भारत ने अपने शीर्ष मंत्रियों को इस अभियान में लगाया। विदेश राज्य मंत्री वीके सिंह ने खुद इस पूरे अभियान की अगुवाई की और खुद यमन में भारतीयों को एक-एक करके सुरक्षित स्वदेश वापसी को सुनिश्चित किया।

vk singh

भारत अपने शीर्ष नेताओं को इस अभियान में लगाने का सबसे बड़ा फायदा यह मिला कि भारतीयों नागरिको को यमन से निकालने में किसी तरह की लाल फीताशाही से नहीं जूझना पड़ा और अविलंब भारतीयों को वापस भारत पहुंचाने में मदद मिली।

समय पर फैसले लेने के चलते मिली जबरदस्त सफलता

सामान्य हालात में ऐसे अभियान को अंजाम देते समय इस अभियान के मुखिया को विदेश मंत्री से हर समय इजाजत मांगनी पड़ती है और कूटनीतिक स्तर पर सभी बातों का खयाल रखना पड़ता है।

इन परिस्थितियों में ऐसे अभियान को जल्दी पूरा करना काफी मुश्किल होता है। लेकिन यमन के अभियान में किसी भी तरह की देरी नहीं की गयी। ऐसे में गौर करने वाली बात यह है कि अगर यमन में फैसले लेने में देरी होती तो इसका काफी बुरा खामियाजा भारत को भुगतना पड़ता।

बम धमाकों और गोलीबारी के बीच बचाया गया भारतीयों को

भारत ने अपने नागरिकों को बम धमाकों और भारी गोलीबारी के बीच वापस लाने में सफल रहा है। ऐसे हालात में जब युद्ध चल रहा हो तो फैसले लेने में देरी कतई नहीं की जा सकती है। इसी बात का खयाल रखते हुए भारत ने कैबिनेट मंत्री को इस अभियान में लगाया ताकि वह खुद ऐसे हालात में आकस्मिक फैसले ले सके।

प्रधानमंत्री मोदी की जबरदस्त कूटनीति

सउदी अरब से कूटनीतिक स्तर पर बेहतरीन तालमेल ने इस अभियान में जबरदस्त मदद की। यमन में शिया और सुन्नी विवाद को लेकर जबरदस्त युद्ध छिड़ा हुआ है, भारत को इस बात का एहसास है कि इस अभियान में सउदी अरब की खुलकर मदद उसके लिए मुश्किल खड़ी कर सकती है। ऐसे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद सउदी अरब के सुल्तान किंग सलमान से लगातार संपर्क में बने रहे।

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भारत और सउदी अरब के प्रमुखों के बीच लगातार बातचीत के जरिए ऐसे मुश्किल अभियान को अंजाम देने में काफी मदद मिली। सउदी ने यमन में हर अहम जगह पर अपनी सेना को तैनात किया था ऐसे में इन सबके बीच तालमेल बैठाना भारत के लिए काफी चुनौतीभरा था। ऐसे में इन सभी हालातों से निपटने के लिए पीएम मोदी लगातार सउदी के शाह से संपर्क में बने रहे।

यही नहीं सउदी से भारत के विमानों की सकुशल वापसी को भी सुनिश्चित करना भारत के लिए अहम चुनौती थी। इस स्तर पर भी भारत की कूटनीति में काफी अहम भूमिका निभाई। युद्ध जैसे हालातों के बीच विमान की सकुशल वापसी को सुनिश्चित कराने में भारत को काफी अहम सफलता हासिल ह हुई।

भारत की तटस्थता की नीति

यमन और सउदी के बीच विवाद पर भारत ने अपनी कोई स्थिति जाहिर नहीं की बल्कि तटस्थता के सिद्धांत पर चलने का फैसला लिया। जिसका फायदा भारत को पूरी तरह से मिला। भारत हमेशा से कोई पक्ष लेने से बचता है, बल्कि भारत की यह कोशिश रहती है कि मानवीय आधार पर ऐसे मौको पर अपनी राय रखी जाए।

भारत को इस बात का एहसास था कि यमन में जो हालात हैं वह वहां के स्थानीय लोगों और यहां के अन्य अहम लोगों के बीच का है। ऐसे में भारत को इस मसले पर हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए भारत ने इस अभियान में यमन को अपना दुश्मन नहीं माना जिसके चलते भारत को अपने नागरिकों को वहां से सकुशल वापस लाने में सफलता मिली।

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यमन में भारतीय नागरिक लोगों का निशाना नहीं हैं और ना ही उन्हें जानबूझकर निशाना बनाय जा रहा है। भारत ने इसी नीति का अनुसर इराक में युद्ध के दौरान किया था, जिसके चलते हजारों भारतीयों को वहां से सकुशल वापस लाने में भारत को सफलता मिली थी।

तटस्थता की नीति भारत के लिए हमेशा से से कारगर

विशेषज्ञों ने वन इंडिया को बताया कि भारत की तटस्थता की नीति ने हमेशा ही भारतीयों को सकुशल वापस लाने में मदद की है। भारत को इस बात का ऐहसास है कि तटस्थता की नीति हमेशा ही कारगर रहती है।

यह नीति ना सिर्फ ऐसी परिस्थितियों में फंसे लोगों को भारत वापस लाने में मदद करती है बल्कि स्वदेश में भी भारत को किसी विरोध का सामना नहीं करना पड़े वह सुनिश्चित करना भी जरूरी होता है, भारत की यह नीति हमेशा से ही कारगर साबित हुई है।

पूर्व के अनुभवों और खुफिया एजेंसियों ने निभायी अहम भूमिका

भारत को राहत और बचाव कार्य को अंजाम देने का बेहद ही लंबा अनुभव है। हाल ही में भारत ने इराक में खूनी घमासान से भारतीयों को वापस लाने में जबरदस्त सफलता पायी थी। ऐसे देश जहां युद्ध बेहद ही बेतरतीब तरीके लड़े जा रहे वहां से नागरिकों को सुरक्षित लाना काफी जोखिम भरा होता है। इराक की सड़कों और गलियों में खून खराबा मचा हुआ था, जिसमें भारत ने सफलता पायी थी।

2011 में भारत ने लिबिया और 2006 में लेबनान में भी राहत कार्य को बेहद ही कुशलता से अंजाम दिया था। ऐसे हालात में भारत की खुफिया एजेंसियों ने भी अहम भूमिका निभाई थी। अमेरिकी खुफिया एजेंसियों के साथ मिलकर भारत ने हर समय तत्कालीन परिस्थितियों से राहत एवं बचाव कार्य में लगी टीम की मदद की जिसने ऐसे अभियान को सफल बनाने में मदद की।

अमेरिका और सउदी की खुफिया एजेंसियों ने भी की मदद

इन्ही अनुभवों को भारत ने यमन अभियान में भी प्रयोग किया। भारत की खुफिया एजेंसियों ने अमेरिका और सउदी अरब की खुफिया एजेसियों की मदद से हर पल की जानकारी भारती की टीम को दी जिससे की तुरंत फैसले लेने में मदद मिले और भारतीय नागरिकों को सकुशल स्वदेश वापस भेजा जा सके।

ऐसे कई बार हालात उत्पन्न हुए जब यमन की सड़कों पर खून-खराबा मचा लेकिन भारती की खुफिया एजेंसियों ने समय पर भारतीय खेमे को इनपुट भेजे और नागरिकों को समय पर वहां से बचाये जाने में हर बार सफलता मिली।

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