Hema Committee Report: मलयालम सिनेमा में यौन उत्पीड़न, पांच साल तक क्यों सोयी रही केरल सरकार?
Sexual Harassment in Malayalam Cinema: कोलकाता में महिला ट्रेनी डॉक्टर की जिस तरह से बलात्कार के बाद हत्या कर दी गई, उससे पूरा देश आंदोलित है। इसी दौरान केरल सरकार ने मलयालम फिल्म उद्योग में महिलाओं से यौन उत्पीड़न को लेकर जस्टिस हेमा कमेटी की रिपोर्ट जारी की है, जिससे इन आशंकाओं की पुष्टि होती है कि चाहे स्वास्थ्य सेवाएं हों या फिल्म इंडस्ट्री महिलाएं कहीं भी सुरक्षित नहीं हैं।
लेकिन, जिस तरह से कोलकाता कांड पर पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी सरकार का रवैया संदेहास्पद रहा है, उसी तरह से जस्टिस हेमा कमेटी की रिपोर्ट पर पांच साल तक कुंडली मार कर बैठने की वजह से केरल की पिनराई विजयन की अगुवाई वाली एलडीएफ सरकार पर भी गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।

5 साल क्यों सोयी रही केरल सरकार?
एलडीएफ या लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट की अगुवा सीपीएम है, जो महिला अधिकारों को लेकर धरना-प्रदर्शन में सबसे आगे रहती है। फिर ऐसा क्या हुआ कि मॉलीवुड या मलयालम फिल्मों में महिलाओं के खिलाफ चलने वाले यौन उत्पीड़न रैकेट से पर्दा उठाने वाली रिपोर्ट को सार्वजनिक करने में सीपीएम के मुख्यमंत्री के हाथ पांच साल तक कांपते रहे।
मलायलम फिल्म उद्योग का काला सच उजागर
सबसे कड़वा मजाक तो ये है कि 51 गवाहों के बयानों पर आधारित 235 पन्नों की यह सनसनीखेज रिपोर्ट जब सार्वजनिक की गई है, तब मलयालम सिनेमा 'आट्टम' को सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार मिलने का जश्न मनाया जा रहा है। इस फिल्म में यौन उत्पीड़न की बात बहुत ही संवेदनशीलता के साथ की गई है, जबकि न्यायमूर्ति हेमा समिति की रिपोर्ट से पता चलता है कि मॉलीवुड में महिलाओं को व्यापक रूप से यौन उत्पीड़न का शिकार होना पड़ता है।
मॉलीवुड में कदम रखते ही महिलाओं को करना पड़ता है कड़वे सच से सामना-रिपोर्ट
घटना 2017 के फरवरी की है। कोच्चि में एक चलती कार में एक अभिनेत्री को अगवा करके उसका यौन उत्पीड़न किया गया। रिपोर्ट से खुलासा हुआ है कि मलयालम सिनेमा में कदम रखने के साथ ही महिलाओं के साथ सेक्सुअल डिमांड का सामना करने का सिलसिला शुरू हो जाता है। यह थमता नहीं है और हर जगह इसका मुकाबला करना पड़ता है। लेकिन, जब महिलाएं आवाज उठाती हैं तो फिर उनकी प्रताड़ना शुरू हो जाती है।
आम जनता का कैसे रहेगा सिस्टम पर भरोसा?
2017 के जुलाई में बनी समिति ने पिनराई सरकार के साथ अपनी रिपोर्ट 2019 में ही साझा कर दी थी, बीच में कुछ कानूनी अड़चनें आईं और पिनराई सरकार ने अब जाकर इसे जारी किया है। ऐसे में इस रिपोर्ट में कमेटी ने जो भी सवाल उठाए हैं या सरकार को इसमें सुधार के लिए सिफारिशें की हैं, उसे लागू करने में पहले ही बहुत देर हो चुकी है। इस तरह की व्यवस्था से पूरे सिस्टम से ही आम जनता का भरोसा उठने लगता है।
महिला सुरक्षा पर अपनी जिम्मेदारी से कैसे बच सकती है सरकार?
केरल देश का वह राज्य है जो अपनी साक्षरता और अन्य मापदंडों में आगे रहने के लिए पूरे देश में सराहा जाता है। लेकिन, इस रिपोर्ट से जो सच्चाई सामने आई है, उसने 'ईश्वर के अपने देश' की प्रतिष्ठा को कलंकित करने का काम किया है, जिसके लिए केरल की जनता कहीं जिम्मेदार नहीं है। लेकिन, प्रदेश की सरकार पहले मॉलीवुड पर नियंत्रण नहीं रख पाने और फिर इतनी संवेदनशील रिपोर्ट को सार्वजनिक करने में कोताही के उत्तरदायित्व से बच नहीं सकती।
सिनेमा उद्योगों पर आज भी पुरुषों का दबदबा
वैसे जस्टिस हेमा कमेटी ने मलयालम सिनेमा में जिस कास्टिंग काउच की भयानकता को उजागर किया है, वह समस्या सिर्फ यहीं की नहीं और देश में अन्य फिल्म उद्योगों से भी ऐसी खबरें रह-रह कर बाहर आती रहती हैं। इसकी एक बड़ी वजह ये लगती है कि सिनेमा जगत आज भी पुरुष प्रधानता वाली मानसिकता से पीड़त है।
तथ्य ये है कि एक रिपोर्ट के अनुसार देश में आज भी मात्र 9% डायरेक्टर ही महिलाएं हैं। वहीं स्क्रिप्ट राइटिंग में समाज की आधी आबादी का योगदान 12% है तो मात्र 15% ही महिला प्रोड्यूसर हैं; और जहां तक टॉप मैनेजमेंट की बात है तो उसमें गिनी-चुनी महिलाओं को ही अपनी बात रखने का सौभाग्य मिल पाता है।












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