नवजात बच्ची को सांस लेने में दिक्कत, कीजिए बेबस मां-बाप की मदद
नई दिल्ली। पूर्णा कुमार का कहना है कि अपने जुड़वा बच्चों की बात सुनकर तो मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहा था। पूर्णा ने बताया कि उसकी शादी को 12 साल हो चुके थे और इतने लंबे समय तक उन्हें माता-पिता बनने का सुख नहीं मिल पा रहा था। आखिरकार भगवान ने हमारी मुराद सुन ली और हम अपने आने वाले जुड़वा बच्चों के स्वागत की तैयारियों में लग गए थे। हमारे जुड़वा बच्चों ने समय से पहले इस दुनिया में जन्म ले लिया।
आपकी छोटी सी मदद किसी के घर की खुशियों को बचा सकती है, कीजिए मदद

पूर्णा के परिवार में सब कुछ बहुत जल्दी बदल गया
मेरी पत्नी के गर्भवती होने के पांच महीने बाद ही हमारे एक बच्चे की मौत हो गई। रात भर मेरी पत्नी रोती रही। हम अपने दूसरे बच्चे की ज़िंदगी की दुआ मांगते रहे और जब उसका जन्म हुआ तो हम अपने आंसू नहीं रोक पाए। वो कमज़ोर थी लेकिन बहुत सुंदर और प्यारी बच्ची थी। अधिकतर लोग अपने नवजात बच्चे को घर ले जाकर खुशियां मनाते हैं लेकिन कुमार और उसकी पत्नी अपनी 3 महीने की बच्ची को आईसीयू में ज़िंदगी और मौत के बीच झूलते हुए देख रहे हैं।

इलाज के लिए चाहिए 20 लाख
जन्म के समय बच्ची का वज़न महज़ 660 ग्राम था और उसके फेफड़े भी पूरी तरह से विकसित नहीं हो पाए थे और उसे सांस लेने में भी दिक्कत हो रही थी। इस वजह से उसे वेंटिलेटर पर रखा गया। अगले 4 हफ्तों तक उसे एनआईसीयू ट्रीटमेंट की ज़रूरत पड़ेगी। कुमार को बताया गया कि इसमें 20 लाख तक का खर्चा आएगा।

बेटी को सांस लेने में दिक्कत.... मां-बाप परेशान
पूर्णा कुमार अस्पताल के खर्चों को पूरा करने में लगा हुआ है साथ ही उसे अपनी पत्नी का भी ध्यान रखना पड़ रहा है जो इस सदमे को सहन नहीं कर पा रही है। अपने मरे हुए बच्चे के गम तक से वो अभी तक उबर नहीं पाई है। उसे डर है कि कहीं वो दोबारा अपने बच्चे को ना खो दे। कुमार और दिव्या एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी करते हैं और उन दोनों की कुल आय 60 हज़ार रुपए है। एक मध्यम वर्गीय परिवार के लिए इतनी आय काफी होती है लेकिन उनके पास अपनी बच्ची के ईलाज के लिए लाखों रुपए नहीं है। कुमार का कहना है कि अब तक अपनी बच्ची के इलाज पर हम 32 लाख रुपए खर्च कर चुके हैं। दोस्तों और रिश्तेदारों ने भी हमारी बहुत मदद की है लेकिन अब हमें खुद ही कुछ करना होगा।

आपका छोटा सहयोग किसी की मुस्कान वापस ला सकता है...
उसने यह भी बताया कि अस्पताल में बच्ची के पास रहने के लिए उसकी पत्नी को नौकरी से भी छुट्टी लेनी पड़ी। मैं फिर भी हफ्ते में कुछ दिन काम पर चला जाता हूं लेकिन ऐसी परिस्थिति में मैं अपने काम पर भी ध्यान नहीं दे पा रहा हूं। कुमार बताते हैं कि उनके लिए इस कड़वी सच्चाई के साथ जीना बहुत मुश्किल हो गया है। 12 साल के बाद उनके घर किसी बच्चे की किलकारियां गूंजी थी लेकिन उन्हें क्या पता था कि ये खुशी उनकी ज़िंदगी का सबसे बड़ा गम बन जाएगी। हमें बस इतनी उम्मीद है कि हम अपनी बच्ची के इलाज के लिए पैसे जमा कर पाएं। अब इस परिवार ने 20 लाख रुपए की धनराशि जमा करना शुरु किया है। आपकी छोटी सी भी मदद इनके बहुत काम आ सकती है।












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