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क्या राहुल गांधी को शीशे में उतार चुके हैं तेजस्वी? मांझी और कुशवाहा को भी दिखायी हैसियत !

क्या राहुल गांधी को शीशे में उतार चुके हैं तेजस्वी?

पटना। राज्यसभा चुनाव की वजह से बिहार में विपक्ष की राजनीति एक नये मोड़ पर आ गयी है। राजद के नये स्टैंड से यह माना जा रहा है कि अब उसे कांग्रेस के सिवा कोई और सहयोगी नहीं चाहिए। राजद को कांग्रेस इसलिए भी मंजूर है क्योंकि राहुल गांधी ने तेजस्वी को बिहार में फ्री हैंड खेलने की इजाजत दे दी है। पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी और उपेन्द्र कुशवाहा आये दिन राजद को धमकी देते रहे हैं। अब राजद ने दोनों को हैसियत बताने की ठान ली है। सोमवार को राजद के वरिष्ठ नेता शिवानंद तिवारी ने मांझी को याद दिलाया कि वे अपनी पार्टी (हम) के एकलौते विधायक हैं, और राजद को एक विधायक वाली पार्टी की बिल्कुल परवाह नहीं है। राजद ने कुशवाहा की खिल्ली उड़ाते हुए कहा कि जिस दल का एक भी विधायक नहीं है वह भी बड़ी-बड़ी बातें कर रहा है। राजद ने उन नेताओं को पानी -पानी कर दिया है जो साथ हो कर भी उसके खिलाफ हैं।

जब राहुल गांधी राजी तब फिर क्या… ?

जब राहुल गांधी राजी तब फिर क्या… ?

सोमवार को तेजस्वी यादव ने बिहार कांग्रेस के उन नेताओं को चार सौ चालीस वोल्ट का झटका दिया जो राजद के खिलाफ हवा बनाने में लगे थे। पूर्व सांसद और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता निखिल कुमार के समर्थकों ने राज्यसभा चुनाव में धोखाधड़ी का आरोप लगाते हुए राजद के खिलाफ हो-हंगामा किया था। निखिल समर्थक राजद से गठबंधन तोड़ने के लिए नारा लगा रहे थे। इसके जवाब में तेजस्वी ने कहा, जब सारी बाते शीर्ष नेतृत्व से तय हो गयीं है तो कांग्रेस के स्थानीय नेता फालतू का हंगामा कर रहे हैं। यानी तेजस्वी ने राहुल-सोनिया की रजामंदी से राज्यसभा की दोनों सीटों पर अपने उम्मीदवार दिये। तेजस्वी ने पूरे आत्मविश्वास से मीडिया के सामने ये बात कही है। तो क्या तेजस्वी ने ऊपर ही ऊपर सेटिंग कर ली। अगर कांग्रेस आलाकमान तेजस्वी पर मेहरबान है तो यह बिहार कांग्रेस के नेताओं के लिए अपमानजनक स्थिति है। अगर राजद को दोनों सीट देने की डील पहले से पक्की थी तो क्या बिहार कांग्रेस प्रभारी शक्ति सिंह गोहिल इस बात से अंजान थे ? अगर नहीं तो फिर एक सीट देने के लिए गोहिल ने राजद को पत्र क्यों लिखा ? कांग्रेस एक राज्यसभा सीट के लिए हफ्तेभर तक चिरौरी करती रही तब तो राहुल गांधी ने कुछ भी नहीं कहा। वैसे आज भी वे कुछ नहीं कह रहे हैं। जो भी कह रहे हैं तेजस्वी कह रहे हैं। तो क्या तेजस्वी ने राहुल-सोनिया को शीशे में उतार लिया जिससे बिहार कांग्रेस के नेता अंजान हैं ? तेजस्वी के बयान का तो यही मतलब है कि जब राहुल गांधी ही राजी हैं तो वे बिहार के नेताओं की परवाह क्यों करें। तेजस्वी ने स्थिति स्पष्ट करने के लिए एक कहावत कही, जब मियां-बीवी राजी तो क्या करेगा काजी ।

मांझी और कुशवाहा को हैसियत दिखायी

मांझी और कुशवाहा को हैसियत दिखायी

घर में नहीं दाने, अम्मा चली भुनाने। राजद के वरिष्ठ नेता शिवानंद तिवारी ने जीतन राम मांझी और उपेन्द्र कुशवाहा को इसी दाज में ताना दिया है। राज्यसभा चुनाव के समय जीतन राम मांझी ने महागठबंधन के लिए एक कोऑर्डिनेशन कमेटी बनाये जाने की मांग फिर उठायी। मांझी इसी बहाने अपनी अहमियत साबित करना चाहते थे। मांझी करीब एक साल से कोऑर्डिनेशन कमेटी गठित किये जाने की मांग कर रहे हैं। राजद ने मांझी की इस मांग पर कभी ध्यान नहीं दिया। अगर ऐसी कोई कमेटी बनेगी तो राजद को महत्वपूर्ण मसलों पर घटक दलों के प्रति जवाबदेह होना पड़ेगा। अस्सी विधायकों वाले राजद को ये बिल्कुल गवारा नहीं कि कोई उससे सवाल पूछे। खासकर तब जब सवाल पूछने वाले घटल दल संख्या बल में बिल्कुल फिसड्डी हों। शिवानंद तिवारी ने सोमवार को कहा कि राज्यसभा चुनाव के समय कोऑर्डिनेशन कमेटी क्या जरूरत है। वोट हमारे पास है (अस्सी विधायक), हमारे वोट से सांसद का चुनाव होगा। जिस दल के एक विधायक हैं या जिस दल का एक भी विधायक नहीं है, क्या वे हमें समझाएंगे कि क्या होना चाहिए? शिवानंद तिवारी ने मांझी और कुशवाहा को इशारों इशारों में बता दिया कि आप की इतनी हैसियत नहीं कि राजद को डिक्टेट कर कर सकें।

मांझी का कितना जनाधार?

मांझी का कितना जनाधार?

राजनीति में संख्याबल का ही महत्व है। नाम नहीं नम्बर चाहिए। जीतन राम मांझी नीतीश कुमार की कृपा से मुख्यमंत्री बने थे। वे अतिमहत्वाकांक्षा का शिकार हो गये। खुद को दलितों का सबसे बड़ा नेता मानने लगे। जब नीतीश से अलग हुए तो एनडीए में आ गये। एनडीए में उन्होंने पूर्व मुख्यमंत्री और महादलितों के बड़े नेता के नाम पर दबाव बनाया। 2015 के विधानसभा चुनाव में एनडीए के घटक दल के रूप में उन्हें 21 सीटें मिलीं। मांझी का कितना बड़ा जनाधार है, इस चुनाव में इसकी पोल खुल गयी। मांझी ने दो जगहों से चुनाव लड़ा था। एक जगह जीते और एक जगह हारे। उनके अन्य 19 उम्मीदवार भी पराजित हो गये। तब यह कहा जाने लागा कि जब मांझी खुद एक पर सीट हार गये तो वे दूसरे को भला क्या जिताएंगे ? लोकसभा चुनाव के समय मांझी महागठबंधन में आ चुके थे। यहां भी तोलमोल कर उन्होंने लालू यादव से तीन सीटें ले लीं। तीनों पर हारे। यानी मांझी, लालू की नाव पर सवार हो कर भी पार नहीं उतर पाये। इससे जाहिर हो गया कि मांझी के पाले में कितने वोट हैं ? राजद की सोच है कि जिस नेता के पास वोट ही नहीं उससे गठबंधन का फायदा क्या ?

कुशवाहा के पास कितने वोट?

कुशवाहा के पास कितने वोट?

राजद की नजर में उपेन्द्र कुशवाहा भी उसके लिए बोझ की तरह हैं। 2015 में कुशवाहा एनडीए के साथ थे। विधानसभा चुनाव में उन्हें एनडीए के तहत 23 सीटें मिलीं थीं। केवल दो उम्मीदवार ही जीते थे। बाद में वे दोनों विधायक जदयू में चले गय़े। लोकसभा चुनाव के समय ज्यादा सीट लेने के चक्कर में वे एनडीए छोड़ महागठबंधन में आये। लोकसभा चुनाव में हवा बांध कर कुशवाहा ने पांच सीटें ले लीं थीं। खुद दो सीटों से लड़े। अपनी जीती हुई सीट काराकाट तो हारे ही उजियारपुर में भी दुर्गति हो गयी। बाकी तीन अन्य उम्मीदवारों का भी यही हाल रहा। उन्हें लालू के नाम का सहारा भी न मिला। काराकाट औऱ उजियारपुर को कुशवाहा बहुल क्षेत्र माना जाता है उसके बाद भी उपेन्द्र कुशवाहा हार गये। जब वे अपने गढ़ में हारे गये तो फिर अपने सहयोगी दलों को कैसे जिता सकते हैं ? यानी मांझी और कुशवाहा जिस भी एलायंस में रहे, दबाव बना कर हैसियत से अधिक सीट लेने की रणनीति पर चलते रहे। लेकिन अब राजद ने इस रणनीति को नाकाम करने का संकेत दे दिया है।

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