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हरियाणा विधानसभा चुनाव: कांग्रेस नहीं किसी और की नैया डुबोकर हुआ बीजेपी का इतना बड़ा उभार

नई दिल्ली- पूरे भारत में बीजेपी की बढ़त से सबसे ज्यादा नुकसान कांग्रेस को हुआ है, ये एक जगजाहिर तथ्य है। लेकिन, हरियाणा की कहानी थोड़ी अलग है। यहां बीजेपी का बेड़ा पार होने से कांग्रेस को चपत लगी है, लेकिन इंडियन नेशनल लोकदल की मिट्टी सबसे ज्यादा पलीद हुई है। हरियाणा में आज आलम ये है कि आईएनएलडी का वोट शेयर बहुजन समाज पार्टी से भी नीचे जा पहुंचा है। मसलन, 2014 के लोकसभा और विधानसभा चुनावों में इसका वोट शेयर 24 फीसदी से ज्यादा था, जो कि 2019 के लोकसभा चुनाव में गिरकर 2 फीसदी से भी नीचे आ चुका है। जबकि, पिछले चुनाव में मायावती की बीएसपी का वोट शेयर 3.6 फीसदी रहा था। आईएनएलडी को पहुंचा नुकसान कितना ज्यादा है, इस बात का अंदाजा सिर्फ इसी बात से मिल जाता है कि वह जननायक जनता पार्टी से भी पिछड़ती हुई नजर आ रही है।

2014 के दोनों चुनावों में दूसरे नंबर की पार्टी थी आईएनएलडी

2014 के दोनों चुनावों में दूसरे नंबर की पार्टी थी आईएनएलडी

हरियाणा में आईएनएलडी सिर्फ पांच वर्षो में ही कैसे शिखर से शून्य पर आ पहुंची है, यह बीजेपी के उभार से समझा जा सकता है। 2014 के लोकसभा चुनावों में हरियाणा में भारतीय जनता पार्टी 10 में से सिर्फ 7 सीटें जीत सकी थी। मोदी लहर के बावजूद उस चुनाव में पूर्व सीएम ओम प्रकाश चौटाला की इंडियन नेशनल लोकदल 2 सीटें जीतने में कामयाब रही थी। सबसे बड़ी बात ये है कि जब पूरे देश में मोदी का डंका बजा था, तब भी हरियाणा में आईएनएलडी का वोट शेयर 2009 के लोकसभा चुनाव के25.8 फीसदी मुकाबले सिर्फ 24.4 प्रतिशत तक ही नीचे खिसका था। पिछले विधानसभा चुनाव में भी पार्टी ने अपना वही प्रदर्शन बरकरार रखा। तब पार्टी बीजेपी के बाद दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बनी थी और उसे 19 सीटें हासिल हुए थे। उसका वोट शेयर भी 24 फीसदी से ऊपर ही बरकरार रहा था। यानि तब तक हरियाणा में बीजेपी की बढ़त की मार कांग्रेस पर ही ज्यादा पड़ी थी।

2019 के लोकसभा चुनाव में हो गया सफाया

2019 के लोकसभा चुनाव में हो गया सफाया

2019 के लोकसभा चुनाव आते-आते बीजेपी के उभार से आईएनएलडी का लगभग सफाया ही हो गया। इसबार पार्टी कांग्रेस से भी बड़ी शिकार बनी। पिछले लोकसभा चुनाव में 2 सीटें जीतने वाली पार्टी इसबार 10 में से 6 सीटों पर पांचवें स्थान पर पहुंच गई। जबकि, बाकी 4 संसदीय क्षेत्रों में वह किसी तरह चौथे नंबर पर जगह बना पाई। इस चुनाव में पार्टी 2014 के लोकसभा चुनाव के 24.43 फीसदी वोट के मुकाबले महज 1.89 फीसदी वोट ही हासिल कर पाई। जबकि, इस दौरान बीजेपी का वोट शेयर 34.84 फीसदी से बढ़कर निर्णायक 58.02 फीसदी तक पहुंच गया। इस दौरान बीएसपी के वोट भी गिरे लेकिन, फिर भी वह 3.64 फीसदी पर कायम रही। हालांकि, आईएनएलडी नेता और ओम प्रकाश चौटाला के पोते करण चौटाला को लगता है कि ये विधानसभा चुनाव है और इसकी तुलना लोकसभा चुनाव से नहीं की जा सकती। सीएसडीएस (सेंटर फॉर द स्टडीज ऑफ डेवलपमेंट सोसाइटीज) से जुड़े संजय कुमार भी मानते हैं कि आईएनएलडी के वोट शेयर में आई गिरावट असाधाराण और बहुत ही महत्वपूर्ण है। जाहिर है कि 2019 के आम चुनाव में बीजेपी को 34 फीसदी के मुकाबले करीब 60 तक वोट शेयर मिलने से लगता है कि लोगों ने मोदी के नाम पर वोट किया, जिसमें उनके सामने आईएनएलडी विकल्प के रूप में रह ही नहीं गई थी।

परिवार में कलह बड़ी वजह

परिवार में कलह बड़ी वजह

आईएनएलडी के वोट शेयर में भारी गिरावट की वजह निर्विवाद रूप से परिवार में हुए दो फाड़ को माना जा सकता है। 2018 में करण चौटाला के चचेरे भाई और हिसार के तत्कालीन सांसद दुष्यंत चौटाला ने पार्टी से निकलकर जननायक जनता पार्टी के नाम से अलग पार्टी बना ली। पिछले लोकसभा चुनाव में दुष्यंत की पार्टी ने आईएनएलडी से बेहतर प्रदर्शन करके दिखाया और उसने करीब 5 फीसदी वोट हासिल किए। खुद दुष्यंत चौटाला भी हिसार में दूसरे नंबर पर रहने में कामयाब रहे। इसकी एक वजह ये भी रही कि जेजेपी ने अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी के साथ गठबंधन के तहत चुनाव लड़ा और मौजूदा चुनाव में भी कांग्रेस छोड़कर निकले पार्टी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष अशोक तंवर ने इसी पार्टी को समर्थन देने का ऐलान किया है।

क्या कहता है ट्रेंड?

क्या कहता है ट्रेंड?

चुनावी गणित समझने वाले जानकार मानते हैं कि भारतीय मतदाता चाहे हमेशा से किसी भी पार्टी से बंधे क्यों नह रहे हों, वो किसी भी कीमत पर अपना वोट बर्बाद होते नहीं देखना चाहते। यानि जब आईएनएलडी से जेजेपी अलग हो गई तो लोगों ने उलझन में पड़ने की बजाय दूसरी दमदार पार्टियों या उम्मीदवारों की ओर रुख करना ही बेहतर समझा। पिछले लोकसभा चुनाव के बाद से हरियाणा में आईएनएलडी की हालत और पतली हुई है, क्योंकि कई नेता पार्टी छोड़ चुके हैं। इसलिए पार्टी के नेता चाहे जो भी दावे करें, लेकिन जमीनी हालात कुछ और ही कहानी बयां कर रही है और ये चुनाव पार्टी के लिए जीत से ज्यादा अपनी वजूद बचाए रखने का हो गया लगता है।

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