गुलाबो-सिताबो भी आलम आरा की तरह मनोरंजन के इतिहास में दर्ज होगी

गुलाबो-सिताबो

जिस तरह क्विज़ में सवाल पूछा जाता है कि हिंदी की पहली बोलती फ़िल्म कौन-सी थी?

जैसे 1931 में बनी आर्देशर ईरानी की फ़िल्म आलम आरा पहली बोलती फ़िल्म थी वैसे ही गुलाबो सिताबो ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म पर रिलीज़ होने वाली पहली ए-लिस्टर फ़िल्म है, जिसे बनाया तो सिनेमाघरों के लिए था, लेकिन कोरोना जो न कराए.

बहरहाल, अब बात फ़िल्म की.

"मैंने बच्चे इसलिए पैदा नहीं किए कि हवेली मेरी ही रहे", हवेली (फ़ातिमा मंज़िल) पर कब्ज़ा करने की ताक में बैठा 78 साल का बूढ़ा इंसान मिर्ज़ा जब अपने वकील से ये बात कहता है तो आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि लालच उसके रग-रग में कितना बसा होगा.

हवेली पर मालिक़ाना हक़ मिर्ज़ा की बेग़म का है जिसके मरने का वो बेसब्री से इंताजार कर रहा है और उस हवेली में रहने वाला किराएदार बांके रस्तोगी (आयुष्मान खुराना) जो सिर्फ़ 30 रुपए किराया देता है, वो भी इसी ताक में है. और दोनों के बीच जन्म-जन्म का बैर है.

लखनऊ, बांके और मिर्ज़ा

ऐसे ही दो इंसानों की कहानी है गुलाबो सिताबो. लेकिन इन किरदारों से परे ये कहानी है लखनऊ की, उसकी संकरी गलियों, पुरानी हवेलियों और इमामबाड़ों की जिसे सिनेमेटोग्राफ़र अवीक मुखोपाध्याय ने कैमरे में एक लव स्टोरी की तरह क़ैद किया है.

अमिताभ और आयुष्मान खुराना की तीखी नोक-झोंक, वो भी ठेठ लखनवी अंदाज़ में इस फ़िल्म की जान है. चुसी हुई गुठली का चेहरा, दीमक, लीचड़ - कुछ 'प्यार भरे' शब्द हैं जो दोनों एक दूसरे के लिए इस्तेमाल करते रहते हैं.

गुलाबो-सिताबो

पिछली कई फ़िल्मों की तरह आयुष्मान अपने किरदार में रच-बस जाते हैं- न सिर्फ़ बोल-चाल में बल्कि चाल-ढाल में भी.

आटा चक्की लगाकर तीन बहनों और माँ की ज़िम्मेदारी उठाने वाले बांके के लिए बांके नहीं बल्कि ग़रीबी उनकी सबसे बड़ी दुश्मन है.

"10 बाय दस के कमरे में पाँच लोग हैं सोने वाले, कोने में पर्दे के पीछे लोटा और बाल्टी पड़ी रहती है जिससे सब नहाते हैं, टॉयलेट जाना हो तो मिश्रा जी की फ़ैमिली के साथ शेयर करना पड़ता है. तुम्हीं बताओ कैसे कर लें शादी." जब बांके अपनी प्रेमिका फौजिया से ये कहता है तो आप उसकी झुंझलाहट दिखती ही नहीं, महसूस भी की जा सकती है.

तिकड़मबाज़ी का बादशाह

और एक लालची, लड़ाकू , तिकड़मबाज़, बूढ़े खूसट और कंजूस का जो जामा अमिताभ ने पहना है वो उनके तमाम पुराने किरदारों से जुदा है.

जिस तरह मिर्ज़ा बड़बड़ाता है, हर किसी से झगड़ा मोल लेता है, वो आपको भी असल ज़िंदगी के किसी मिर्ज़ा की याद दिला देता है.

हालांकि कइयों को उनका प्रोस्थैटिक और मेकअप काफ़ी पंसद आया लेकिन मुझे कुछ अटपटा-सा लगा.

लेकिन चेहरे के मेकअप की ऊंच-नीच को मिर्ज़ा साहब उस पर उकेरे जज़्बातों और एक्टिंग से भर देते हैं.

साधारण शब्दों में कहानी ये है कि मिर्ज़ा ताक लगाए बैठे हैं कि उनकी बेग़म फ़ातिमा ( जो उनसे 15 साल बड़ी हैं) को कब जन्नत नसीब हो और पुश्तैनी हवेली पर उनका हक़ हो जाए- 78 साल की उम्र में भी.

गुलाबो-सिताबो

वहीं बांके 30 रुपए की किराएदारी छोड़ना नहीं चाहता.

और इस खींच-तान के बीच है पुरातत्व विभाग का एक अधिकारी ( विजय राज़) और वकील ( बृजेंद्र काला). अब कौन किसके साथ है और किसके ख़िलाफ़ ये तो फ़िल्म देखकर ही पता लगाइए लेकिन मामला पूरा गोलमाल है.

हाशिए पर जीने वालों की कहानी

गोलमाल के ऋषिकेश मुखर्जी की तरह अकसर मध्यम वर्ग के किस्सों को फ़िल्म में उतारने वाले निर्देशक शुजीत सरकार ने इस फ़िल्म में अपने पुराने दायरे से बाहर जाकर ऐसे लोगों की कहानी दिखाई है जो कहीं न कहीं हाशिए पर ज़िंदगी जी रहे हैं.

पीकू या विकी डोनर से उलट फ़िल्म की धीमी गति कुछ लोगों के लिए थोड़ी उबाऊ हो सकती है क्योंकि ये कहानी हर किरदार को गढ़ने के लिए थोड़ा वक़्त लेती है. अगर इतना धैर्य रख पाएँ तो ये फ़िल्म परतों में छिपा एक बेहतरीन कटाक्ष है.

फ़ातिमा बेग़म का कमाल

दूसरे रोल में काम करने वाले कुछ कलाकार भी बेहतरीन हैं, ख़ासकर सृष्टि श्रीवास्तव.

95 साल की फ़ातिमा बेग़म बनी फ़ारुख़ ज़फ़र ने भी कमाल का काम किया है जो जानती सब कुछ है कि पति उसके नहीं उसकी हवेली के पीछे है लेकिन अपना ट्रंप कार्ड वो बचाकर रखती है.

कई सीन में फ़ारुख़ ज़फ़र बिना कुछ कहे ही जान डाल देती है और आपके चेहरे पर ख़ुद-ब-ख़ुद मुस्कान आ जाती है- मसलन, जब फ़ातिमा बेग़म को समझ में आ जाता है कि मिर्ज़ा उसके अंगूठा का निशान हवेली के कागज़ात पर लेना चाहता है तो वो अपनी ऊंगलियों पर पट्टी बाँधकर चोटिल होने का नाटक करती है और उसकी आँखों में शरारत भरी मुस्कान सब कुछ कह जाती है.

लालच बुरा बला है?

हालंकि बांके और मिर्ज़ा के बीच बहुत सारे दूसरे किरदार आने से भीड़ सी हो जाती है.

इसलिए क्लाइमेक्स में जब भीड़ छंटती है तो दोनों के बीच का रिश्ता उभरकर आता है और आपको एक पल के लिए लगता है कि दोनों के बीच खटपट और किराएदार -मालिक़ के रिश्ते से बढ़कर भी शायद कुछ था या हो सकता था.

बांके और मिर्ज़ा की कहानी से परे ये लालच की कहानी है- लालच जिसने यूँ तो कभी किसी का भला नहीं किया. पर क्या एक दूसरे के बैरी बांके और मिर्ज़ा के लिए कुछ बदलेगा ?

फ़िल्म का क्लाइमेक्स आपको थोड़ा हैरान करेगा, थोड़ा हँसाएगा और थोड़ा उदास करेगा.

फ़िल्म बाक़ी पिक्चरों से अलग तो है लेकिन शायद सबके मिजाज़ की न हो. फ़िल्म के स्क्रीनप्ले और ख़ासकर डायलॉग के लिए जूही चतुर्वेदी बहुत सारी तारीफ़ के काबिल हैं.

घर पर ही सिनेमाघर

वैसे इस फ़िल्म का रिव्यू करना अपने आप में अनोखा अनुभव ज़रूर रहा.

सिनेमा घर के बाहर नहीं बल्कि रात को 12 बजे इंटरनेट पर फ़िल्म का रिलीज़ होना, फिल्म के पहले दिन, या पहले दिन से पहले ही जाकर स्पेशल शो देखना, रिव्यू के लिए कुछ पंच वाले डायलॉग दिमाग़ में याद करके रखना, बहुत हुआ तो फ़ोन की लाइट में कागज़ पर कुछ नोट करना...ऐसे रिव्यू बहुत बार किए.

लेकिन एमेज़न प्राइम पर इस तरह का रिव्यू पहली बार किया.

अमिताभ की फ़िल्मों के कई किस्से पढ़े हैं जहाँ उनकी फ़िल्मों की टिकट ब्लैक में बिकते थे, लोग घंटों लाइन में लगते थे.

लेकिन यहाँ सिर्फ़ रात के बारह बजने का इंतज़ार था. अपना मोबाइल ऑन कीजिए और सिनेमाघर आपके घर पर हाज़िर.

फ़िल्म का कोई सीन या डायलॉग समझ में न आए तो रिवाइंड कीजिए.

कोरोनावायरस ने ज़िंदगी तो बदल ही दी है, ज़िंदगी की हक़ीकतों से परे सिनेमा और फैंटसी की दुनिया भी तब्दील कर दी है.

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