Gujarat Assembly Election 2017: बीजेपी में कौन है कमजोर कड़ी?
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नई दिल्ली। गुजरात चुनाव में आखिर पाटीदार समाज की बीजेपी से बेरुखी क्यों नजर आ रही है, आरक्षण की मांग तो जगजाहिर है लेकिन राज्य सरकार में कभी पाटीदार समाज की तूती बोलती थी और अब वो बात नहीं रही। इसके लिए पाटीदार समाज से ज्यादा बीजेपी की कमजोरी रही, लापरवाही रही या मजबूरी रही, कुछ भी कहें, इन सबके के कारण पाटीदार समाज पार्टी से छिटकता चला गया। गुजरात के मुख्यमंत्री रहे केशुभाई पटेल से कद्दावर नेता पाटीदार समाज में कोई नहीं रहा। केशुभाई पटेल ने न केवल राज्य स्तर पर बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर अपनी छवि बनाई। यही नहीं बीजेपी में भी उन्हें कद्दावर नेता माना जाता रहा लेकिन वक्त बदलने के साथ ही केशुभाई पटेल किनारे होते गए। नरेंद्र मोदी ने उनकी जगह ली और जितने मोदी मजबूत होते गए, केशुभाई पटेल उतने ही गर्त में पहुंचते गए। ये राजनीति का तकाजा है कि कब किसका सितारा चमकता है, ये पार्टी का तकाजा है कि कब किसे बढ़ाए, किसे घटाए लेकिन समाज को इससे कोई लेना देना नहीं। गुजरात में ही नहीं देश में मोदी का कद बढ़ता गया और पटेल की अगुवाई वाले राज्य में पटेल नेता हाशिए पर पहुंच गए।

पाटीदार समाज को नहीं संभाल पाईं आनंदीबेन पटेल
नरेंद्र मोदी ने अपनी उत्तराधिकारी आनंदी बेन पटेल को बनाया। उनके दो प्लस प्वाइंट थे। एक तो पार्टी के लिए वो भरोसेमंद थी तो दूसरे वो पाटीदार समाज से थीं। भरोसेमंद तो वो रहीं लेकिन पाटीदार समाज को वो नहीं संभाल पाईं। हालांकि इसमें पूरा दोष उनका नहीं, क्योंकि वो दवाबमुक्त सरकार नहीं चला पाईं। वो खुद दिशा निर्देश पर चलती रहीं, और प्रशासन को कोई दिशा निर्देश नहीं दे पाईं। फलस्वरूप उनकी पारी का भी अंत हो गया। इसके बाद फिर गुजरात में ये सवाल आया कि मुख्यमंत्री कौन बनेगा, राजनीतिक रूप से तो किसी पटेल का बनना जरूरी था, लेकिन पार्टी में कोई इतना कद्दावर नेता भी होना जरूरी है, इससे भी ज्यादा जरूरी है कि वो भरोसेमंद हो। जब पार्टी में मंथन हुआ तो सबसे ज्यादा भरोसेमंद निकले विजय रूपानी।

भाजपा ने नितिन पटेल को दी ये जिम्मेदारी
पाटीदार समाज का कोई नेता पार्टी में नजर नहीं आया लेकिन बीजेपी जान रही थी, समझ रही थी कि पाटीदार समाज को संतुष्ट करना तो जरूरी है तो फिर क्या किया जाए, इसके लिए नितिन पटेल को चुना गया। उन्हें उपमुख्यमंत्री पद दिया गया ताकि पाटीदार समाज को कोई हीन भावना न आए। जाहिर है कि पार्टी ने उन्हें उपमुख्यमंत्री बनाया तो फिर पाटीदार समाज को अपने पक्ष में रखने के लिए जिम्मेदारी भी उनकी बनती है लेकिन नितिन पटेल इसमें विफल नजर आ रहे हैं। वो पाटीदार समाज को मनाने में, बीजेपी के पक्ष में करने में कामयाब नहीं हो पाए। वे हार्दिक पटेल के फैलाव को भी नहीं रोक पाए बल्कि कई जगह खुद विरोध का शिकार हो गए। नितिन पटेल पार्टी के पुराने नेता हैं। केवल एक बार चुनाव हारे हैं। उद्योगपति हैं।

फिर भी नितिन पटेल बने कमजोर कड़ी
पाटीदार समाज की सरकार में अगुवाई करने वाले नितिन पटेल फिर क्यों कमजोर कड़ी बने हैं। दरअसल हार्दिक पटेल की जो राजनीति है, उसमें और नितिन पटेल की राजनीति में बड़ा अंतर है। हार्दिक युवा हैं और उनके साथ जो टीम है, उसके मिजाज नरम नहीं गरम हैं। इस टीम ने नितिन पटेल की राजनीति को भी फीका करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। जब नितिन पटेल बीजेपी की गौरव यात्रा लेकर निकले तो पाटीदार समाज ने उनकी सभा में हंगामा खड़ा किया। इस विरोध से बीजेपी चिंतित है लेकिन पार्टी के पास और कोई दूसरा चेहरा भी नहीं जो बिगड़ती स्थिति को संभाल सके।












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