ग्राउंड रिपोर्ट: ‘सेव गर्ल चाइल्ड’ पेंटिंग बनाने वाली बच्ची क्यों झुलस गई?

मेरठ
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उस अंधेरे कमरे में दाख़िल होने के साथ ही सबसे पहले पपड़ी छोड़ रही दीवार पर चिपकी इस पेंटिंग पर नज़र जाती है. तस्वीर एक सुंदर मॉडल नुमा युवती की है, जिस पर लिखा गया है - सेव गर्ल चाइल्ड. और नीचे अँग्रेज़ी में अक्षर उकेरे गए हैं - आइ एम बेस्ट!

पेंटिंग्स
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पेंटिग थोड़ी ऊंचाई पर थी, इसलिए पलंग पर चढ़कर देखना पड़ा. उसी पीली दीवार पर दूसरी पेंटिंग्स भी चिपकाई गई हैं - एक सीनरी जिसमें बहती नदी के ऊपर सूरज चमक रहा है.

जिन हाथों ने इन चित्रों को रंगों से सजाया था, कल्पनाओं से गढ़ा था वो अब झुलसे पड़े हैं.

सफ़दरजंग का बर्न वॉर्ड
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सफ़दरजंग का बर्न वॉर्ड

14 बरस की कविता (बदला हुआ नाम) अब सत्तर फ़ीसदी जली देह और सौ फ़ीसदी जल चुके विश्वास के साथ दिल्ली के सफ़दरजंग अस्पताल के बर्न्स वॉर्ड में भर्ती हैं.

मेरठ के पास सरधना क़स्बे में दायर की गई एफ़आइआर के मुताबिक़ कविता को छह मर्दों ने 17 अगस्त को उसके घर में घुसकर ज़िंदा जलाने की कोशिश की. पाँच लोगों की गिरफ़्तारी भी हो चुकी है.

चमकदार रंगों और गाने का शौक़ रखने वाली कविता अधजली हालत में भी अपनी पढ़ाई के लिए चिंतित है.

बर्न वॉर्ड के बाहर पहुंचकर उनके पिता से मोबाइल पर बात हुई तो उन्होंने कहा, सीधे चलते आइए, जहां भीड़ है, मैं वहीं खड़ा हूं.

पचास-साठ क़दम कदम की दूरी पर कुछ लोग एक आदमी को घेरकर खड़े थे. उनमें से कुछ न्याय, क़ानून, फांसी जैसी बातें कह रहे थे और उनके बीच में खड़ा एक छोटे कद का आदमी सबको सुन रहा था.

ये लोग ख़ुद को नवयुवक शक्ति संगठन के कार्यकर्ता बता रहे थे और कविता के पिता को विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लेने के लिए तैयार कर रहे थे. उनमें से कुछ लोग शिवपाल (बदला हुआ नाम) को सलाह दे रहे थे कि वो अपनी बेटी के हमलावरों को फाँसी देने की माँग करें.

सफ़दरजंग का बर्न वॉर्ड
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सफ़दरजंग का बर्न वॉर्ड

शिवपाल सिर्फ़ हाथ जोड़े खड़े थे और इतना ही कह रहे थे कि जो मेरी बेटी के साथ हुआ मैं नहीं चाहता वो किसी और के साथ हो.

कुछ देर बाद शिवपाल से बात करने का मौक़ा मिला. उन्होंने कहा, "करीब 60-70 फ़ीसदी जल चुकी है. चेहरा सबसे ज़्यादा प्रभावित हुआ है लेकिन बोल पा रही है...".

पंद्रह मिनट की बातचीत के दौरान उनके मोबाइल पर तीन बार घंटी बजी. तीनों ही बार उन्होंने बेटी के जलने का किस्सा तीन अलग-अलग लोगों को बताया. बीच-बीच में कुछ लोग उनके पास आते और पूछते कि आगे क्या करना है...वो उन्हें रुकने का इशारा करते और फिर बात करने लगते.

शिवपाल 17 अगस्त को अपनी दुकान पर थे कि उन्हें कविता पर हमले की ख़बर अपने फ़ोन पर मिली और वो तुरंत घर गए.

वही घर जिसकी पीली दीवारों पर कविता ने अपने हाथ से बनाई पेंटिंग्स चिपका रखी हैं.

कविता का घर...

"कविता को रंगों से बहुत प्यार है. पेंटिंग करना, बेकार पड़ी चीज़ों से सजाने का सामान बनाना उसे अच्छा लगता है", ये कहते हुए उनकी माँ की नज़र कविता की बनाई श्रीकृष्ण एक पेंटिग पर गई और उनकी आंखें भर आईं. अचानक से बोल उठीं "जली हुई थी फिर भी बोली, मम्मी अब मैं इंजीनियर कैसे बनूंगी. इलाज का ख़र्चा कहां से आएगा?"

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उनकी माँ भीतर के कमरे में जाकर जल्दी से कविता की दो तस्वीरें लेती आईं और मेरे हाथ में थमाते हुए बोलीं, देख लीजिए, क्या आपको लगता है कि ये लड़की कुछ भी ऐसा-वैसा करेगी.

"उसको सिर्फ़ दो ही चीज़ का शौक़ था. पढ़ने का और पेंटिंग का. जब पढ़ते-पढ़ते थक जाती थी तो यही टीवी चला लेती थी. कमरा बंद कर लेती थी. गाना चलाकर डांस कर लेती थी. घर का कोई काम हम लोग उससे नहीं कराते थे."

शुचिता
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कविता की माँ हिंदी से पीएचडी हैं. घटना वाले दिन को याद करते हुए वो बताती हैं कि "रोहित और उसके दोस्त कविता को कई दिन से परेशान कर रहे थे लेकिन 16 तारीख़ को जब वो ट्यूशन से लौट रही थी तो उन लोगों ने उसके हाथ में ज़बरदस्ती मोबाइल दे दिया और रात को बात करने को कहा."

अगले दिन सुबह सुबह कविता के पिता ने उस लड़के के घर जाकर शिकायत की. पर तब न उन्हें अंदाज़ा था और न कविता के परिवार वालों को कि एक सामान्य सी बात उनकी बेटी की ज़िंदगी को ख़तरे में डाल देगी.

शिकायत करने के कुछ ही घंटे बाद तीन लोग कविता के घर पहुँच गए और उन्होंने बाद में तीन और लोगों को बुला लिया.

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कविता की माँ को वो दृश्य अच्छी तरह याद है: "बच्ची इसी डबल बेड पर बैठकर मैथ के सवाल हल कर रही थी. तभी अचानक से वो लोग इस कमरे में घुस गए. मैं इस कोने पर बैठी थी और मेरी सास थोड़ी दूर उधर. उन्होंने आने के साथ बच्ची को भला-बुरा कहना शुरू कर दिया. मैंने उसे ऊपर जाने को कहा तो उन्होंने मुझे धक्का दे दिया. फिर उन्होंने रोहित को भी बुला लिया. कुछ मिनट में उन्होंने मेरी बच्ची पर तेल डालकर आग लगा दी."

सविता ने ही कहा, चलिए वो जगह देख लीजिए, जहां वो जली. फिर उस जगह पर बिछी फोल्डिंग को समेटते हुए कहती हैं यहीं पर वो खड़े-खड़े जल गई और वो लोग भाग गए.

किसी पड़ोसी ने उन्हें आते देखा नहीं?

पड़ोस में रहने वाले भूपेश (बदला हुआ नाम) बताते हैं कि इस मोहल्ले में बंदरों का आतंक है. इसलिए ज़्यादातर लोग अपने घरों का दरवाज़ा बंद करके अंदर ही रहते हैं. ज़यादातर लोग नौकरीपेशा हैं तो सुबह ही निकल जाते हैं ऐसे में कौन आ रहा है और कौन जा रहा है...कम पता चलता है.

भूपेश कहते हैं, "हम लोगों ने किसी को आते नहीं देखा लेकिन जब बच्ची चिल्लाने लगी तो शोर सुनकर हम लोग बाहर आए. बच्ची के पिता को फ़ोन किया गया. वो भी आए और हम लोग तुरंत अस्पताल पहुंच गए."

जब मैं वहां से जाने के लिए उठी तो अब तक ख़ामोश बैठी कविता की दादी बोलीं, मेरी बिटिया के लिए प्रार्थना करना. वो ठीक हो जाए और फिर पल्लू के कोने से आंसू पोंछते हुए किवाड़ बंद कर लिया.

शिवपाल की ओर से भी पुलिस में इसी आधार पर एफ़आईआर रजिस्टर कराई गई थी. जिसमें नामज़द छह अभियुक्तों में से पांच को पुलिस गिरफ़्तार कर चुकी है.

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एसएसपी ऑफ़िस के पीआरओ ने बताया कि गिरफ़्तारी हो चुकी है और मामले की गंभीरता को देखते हुए जांच चल रही है.

सरधना थाने के एसएचओ दिलीप सिंह ने भी बताया कि सभी अभियुक्तों की गिरफ़्तारी हो चुकी है और पुलिस इस मामले को काफ़ी गंभीरता से ले रही है.

मामले में मुख्य अभियुक्त रोहित सैनी का घर शुचिता के घर से ज़्यादा दूरी पर नहीं है.

महज़ चार-पांच गलियों बाद ही उनका घर आ जाता है.

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हालांकि उनकी मां मुझे रास्ते में ही मिल गईं. काफ़ी कोशिशों के बाद वो बात करने के लिए राज़ी हो गई. उन्होंने कहा कि यहां सड़क पर नहीं, जो बात करनी है घर पर चलकर करना.

घर पर उनका बड़ा बेटा नहाने की तैयारी कर रहा था. उसी ने दरवाज़ा खोला. उसने कहा, "32 साल में पहली बार थाने गया, थप्पड़ खाया. मेरी मां थाने गई. अभी तो न खाने की सुध है न कुछ सोच पाने की."

हालांकि रोहित की मां और भाई ने ये ज़रूर कहा कि उन्हें अब भी यक़ीन नहीं हो रहा कि उनके भाई ने ऐसा कुछ किया है.

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दूसरे अभियुक्त यानी राजवंश बागड़ी और उनके पिता देवेंद्र बागड़ी के घर पर ताला लटका हुआ था. राजवंश की मां संतोष पूर्व भाजपा सभासद रह चुकी हैं. कुछ ही दूर पर उनके जेठ का घर है लेकिन वहां भी कोई नहीं था. फिर पड़ोसियों से मालूम चला कि संतोष के देवर यहीं से थोड़ी दूरी पर रहते हैं.

जब हमने उनसे इस मामले पर उनका पक्ष जानने की कोशिश की तो उन्होंने कहा कि मैं अपने भतीजे के बारे में कुछ भी नहीं कहूंगा लेकिन मेरा भाई निर्दोष है. जिस समय ये सब हुआ वो अपनी दुकान पर थे.

संतोष ने पुलिस में एक हलफ़नामा दिया है. उनका आरोप है कि कविता किसी लड़के से प्यार करती थी और इसका पता उनके घरवालों को चल गया था. जिसके बाद उन्होंने उसे काफ़ी डाँटा. इससे परेशान होकर उसने खुद पर मिट्टी का तेल डालकर आग लगा ली.

आरोप-प्रत्यारोप के बीच में एक बिंदु बेहद महत्वपूर्ण है और वो ये कि दोनों ही पक्ष मोबाइल रिकॉर्ड निकलवाकर उसकी जांच किए जाने की मांग कर रहे हैं.

कविता 10वीं की छात्रा हैं. जब हमने उनके स्कूल प्रबंधक से इस मामले में बात की तो उन्होंने बताया कि उनके स्कूल में रोज़ उसकी सलामती के लिए प्रार्थना हो रही है.

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कविता फिलहाल दिल्ली के सफ़दरजंग अस्पताल में भर्ती हैं. 22 अगस्त को उनके पिता शिवपाल ने बीबीसी को बताया था कि वो बात कर पा रही है लेकिन बर्न केस में संक्रमण फैलने का ख़तरा सबसे अधिक होता है. जब वो ये बात मुझे बता रहे थे तो थोड़ी ही दूर मोटरसाइकिल पर बैठे कुछ आदमी ये चर्चा कर रहे थे कि अगर प्रशासन ने उनकी मांगें नहीं मानी तो उनका अगला क़दम क्या होगा.

कविता के कमरे में दीवार पर कुछ खाने बने हुए थे. वो उन्हें ट्रॉफी से सजाना चाहती थी. निराश आंखों से कमरे को देखते हुए उसकी माँ कहती हैं सुबह से तीन बार मेरी सांस अटक चुकी है. टीवी वाले बोल दिए कि वो नहीं रही...मेरी तो सुनकर ही जान निकल गई.

इस पूरे मामले में दो पक्ष हैं. एक शिवपाल और उनके परिवार का तो दूसरे अभियुक्तों के परिवार का. शिवपाल के परिवार का कहना है कि आग लड़कों ने लगाई, दूसरा पक्ष कहता है कि लड़की ने आत्मग्लानि में आकर खुद को जला लिया.

पर बात सिर्फ़ इतनी है कि एक घटना ने हंसती-खेलती, रक्षाबंधन के मौके पर भाई के हाथ में राखी बांधने से पहले खुद के हाथों में मेंहदी लगाने का अरमान रखने वाली कविता फिलहाल बर्न वॉर्ड के बेड पर है. पट्टियों में लिपटी...सिकुड़ी-काली देह के साथ.

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और वहाँ मेरठ में कविता के हाथ की बनाई पेंटिंग दीवार पर लटकी हुई है. जिसपर लिखा हुआ है- सेव गर्ल चाइल्ड....आई एम बेस्ट.

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