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ग्राउंड रिपोर्ट: असम में डिटेंशन कैंप के भीतर क्या होता है

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    सुचिंद्रा गोस्वामी, चन्द्रधर दास, अजित दास
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    सुचिंद्रा गोस्वामी, चन्द्रधर दास, अजित दास

    कल्पना कीजिए कि एक 35 फ़ुट x 25 फ़ुट के कमरे में करीब 35 आदमी सो रहे हों.

    सुबह पांच बजे लगभग सभी को एक दहाड़ती हुई आवाज़ के साथ जगा दिया जाए.

    छह बजे तक इन सभी को कमरे में मौजूद एकमात्र टॉयलेट से फ़ारिग होकर चाय और बिस्कुट ले लेने होंगे.

    साढ़े छह बजे इन सभी लोगों को बाहर एक बड़े से आँगन में छोड़ दिया जाएगा, पूरा दिन काटने के लिए.

    अगर सुबह की चाय-बिस्कुट मिस कर गए तो फिर कुछ घंटे बाद ही चावल मिलेगा, जिसके साथ दाल कितनी पकी मिलेगी ये सिर्फ़ क़यास की बात है.

    चार बजे तक रात का डिनर भी ले लेना अनिवार्य सा है. सब्ज़ी-दाल और चावल.

    हफ्ते में दो दिन उबले अंडे मिलेंगे और एक दिन मीट परोसा जाएगा.

    सिलचर सेन्ट्रल जेल
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    सिलचर सेन्ट्रल जेल

    रोज़ शाम साढ़े छह बजे इनकी दुनिया वापस उसी कमरे में सिमटा दी जाएगी.

    रात भर खाने का कोई दूसरा ज़रिया नहीं और 'सही जुगाड़ वालों को' वालों को टॉयलेट के दरवाज़े से थोड़ी दूर सोने को मिल सकता है.

    लेकिन इस दुनिया को सिर्फ़ भीतर रहने वाले ही देख पाते हैं और बयान कर पाते हैं.

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    बाहर का नज़ारा

    दोपहर के साढ़े ग्यारह बजे हैं और लोहे के एक बड़े गेट के बाहर क़रीब एक दर्जन लोग लाइन लगा चुके हैं.

    सभी को इंतज़ार है गेट के उस पार की दुनिया से किसी अपने की शक्ल देखने का, उसकी सुध लेने का.

    सिर्फ़ पांच से 10 मिनट मिलेंगे ये करने को और अगर आपके पास 100 रुपए ज़्यादा हैं तो 10 मिनट बढ़ भी सकते हैं.

    सन 1881 में बनी लाल रंग की ये इमारत सिलचर सेन्ट्रल जेल है.

    बाहर गेट पर आपने मोबाइल भी निकाल लिया तो दो गार्ड पूछने दौड़ते हैं, "फोटू मत लेना, नहीं तो सजा हो सकता है."

    लाइन में खड़े लोगों में एक मोहम्मद यूनुस भी हैं जो अपने पिता का हाल लेने आए हैं.

    "मेरे बाप ने कोई क़त्ल या चोरी नहीं की है. उन्हें कोई सजा भी नहीं सुनाई गई है. लेकिन पिछले कई महीनों से वे जेल के एक हिस्से में क़ैद हैं क्योंकि उन्हें विदेशी (बांग्लादेशी) बताया जा रहा है. अब आप मेरा फोटो मत लेना सर, नहीं तो मुझे भी विदेशी मान लिया जाएगा", कहते हुए यूनुस की आँखे नम हो चुकी हैं.

    सिल्चर सेन्ट्रल जेल के भीतर ही एक डिटेंशन कैंप है जिसमें 50 से ज़्यादा ऐसे लोग क़ैद हैं जिनकी भारतीय नागरिकता पर शक़ है.

    असम में पिछले 10 वर्षों से 6 डिटेंशेन कैंप हैं और सरकार के मुताबिक़ क़रीब 1,000 लोग फ़िलहाल राज्य के डिटेंशेन कैंपों में क़ैद हैं.

    एस लक्ष्मनन, कछार प्रांत के जिला उपायुक्त
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    एस लक्ष्मनन, कछार प्रांत के जिला उपायुक्त

    ये कैंप राज्य के सिलचर, ग्वालपाड़ा, कोकराझार, तेज़पुर, जोरहट और डिबरूगढ़ ज़िलों में हैं.

    ख़ास बात ये है कि ऐसे मामलों की सुनवाई विशेष रूप से बनी विदेशी ट्राइब्यूनल में ही शुरू हो सकती है.

    साल 2008 से अब तक क़रीब 90,000 लोगों की नागरिकता शक़ के घेरे में आ चुकी है.

    इनमें वो भी शामिल हैं जिनका नाम डी-वोटर यानी संदिग्ध वोटर श्रेणी में है.

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    ऐसे ही शख़्स अजित दास भी हैं जिनके ख़िलाफ़ विदेशी ट्राइब्यूनल से तीन महीने पहले वारंट जारी हुआ था.

    अजित एक पेशी में नहीं पहुंचे जिसके चलते उन्हें सिलचर जेल के भीतर बने डिटेंशन कैंप में पहुंचा दिया गया.

    ढाई महीने बाद बेल पर रिहा होने वाले अजित ने अपना तजुर्बा बताया.

    उन्होंने कहा, "डेढ़ महीने तक मर्डर, रेप और चीटिंग केस वाले क़ैदियों के साथ रखा गया. शिक़ायत करने पर उसी जेल के डिटेंशेन कैंप में शिफ़्ट किया. अस्पताल में बीमार लोगों सा खाना मिलता था. जाते समय मेरा वज़न 60 किलो था. ढाई महीने रहने पर 5 किलो कम हो गया. बाहर आने पर चलने-फिरने में दिक़्क़त हो रही है. एक रूम में 50 लोगों को रखा जाता है, बाथरूम के सामने सोना पड़ता है".

    दशक भर पहल बने इन डिटेंशन कैंपों की व्यवस्था पर सवाल पहले भी उठे हैं.

    चंद महीने पहले ही पूर्व प्रशासनिक अधिकारी और सामाजिक कार्यकर्ता हर्ष मंदर ने भी राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की उस कमिटी से इस्तीफ़ा दिया था इसने असम जाकर इन डिटेंशन कैंपों का जायज़ा लिया था.

    हर्ष मंदर का दावा है कि, "कमिटी के दो और नुमाइंदों के साथ जमा होने वाली रिपोर्ट के अलावा मैंने एक स्वतन्त्र रिपोर्ट भी आयोग को सौंपी थी लेकिन उस पर कोई एक्शन नहीं लिया गया".

    विदेशी ट्राइब्यूनल
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    विदेशी ट्राइब्यूनल

    हालाँकि असम सरकार ने इस बात को कई बार दोहराया है कि, "डिटेंशन कैंपों की तुलना जेलों से करना ग़लत है."

    दक्षिणी असम के विशालकाय कछार प्रांत के जिला उपायुक्त एस लक्ष्मनन ने सभी आरोपों पर बीबीसी से बात की.

    उन्होंने कहा, "कुछ संदिग्ध वोटरों को सज़ा काट रहे क़ैदियों के साथ एक ही जेल में रहना पड़ रहा है क्योंकि जगह की कमी है. वैसे भी जेल एक रिफ़ार्म सेंटर होता है. जिनको किसी भी क़िस्म की तकलीफ़ या मेडिकल सहायता की ज़रूरत होती है, उन्हें हम सब कुछ निःशुल्क मुहैया कराते हैं. सरकारी स्टाफ़ की कमी को भी पूरा किया जा रहा है."

    इस बीच डिटेंशन कैंपों में रह कर आए लोगों के दावे दिल दहलाने वाले हैं.

    करीब सात साल पहले सिलचर की रहने वाली सुचंद्रा गोस्वामी के घर विदेशी ट्राइब्यूनल का एक नोटिस पहुंचा था.

    विदेशी होने के शक का नोटिस जिस व्यक्ति के नाम पर था उससे सुचंद्रा का नाम ज़रा सा ही मिलता था तो परिवार ने नोटिस पर ध्यान नहीं दिया.

    लेकिन मई, 2015 की एक शाम स्थानीय पुलिस वाले सुचिंद्रा को उनके घर से पूछताछ के लिए थाने ले गए और फिर वहां से डिटेंशन कैंप.

    सुचिंद्रा गोस्वामी उस दिन को याद कर के आज भी भावुक हो उठती हैं.

    उन्होंने कहा," ग़लत नाम के चलते तीन दिन सेंट्रल जेल में रहना पड़ा. ऐसा तजुर्बा तो बुरा ही होगा. मेरी जैसी हाउसवाइफ़ को जेल में डाल दिया. डिटेंशेन कैंप नाम की कोई चीज़ नहीं थी, मुझे दूसरे क़ैदियों के साथ डाल दिया. जेल में साफ़-सफ़ाई नहीं है,. बाथरूम इतने गंदे कि पूछिए मत. समझ लीजिए खाना सिर्फ़ ज़िंदा रहने के लिए मिलता है. कोई क़ैदी है तो क्या हुआ, उसका पानी-खाना तो ठीक होना चाहिए".

    डिटेंशन कैंप के बाहर
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    डिटेंशन कैंप के बाहर

    सुचिंद्रा के लिए ग़लतफ़हमी के वे तीन दिन तीस साल के बराबर हैं.

    डिटेंशन कैंप में रह कर आए ज़्यादातर लोग बताते हैं कि वहां ज़्यादातर बुज़ुर्ग लोग ही हैं.

    उनमें से कुछ ऐसे हैं जिनके विदेशी होने का प्रमाण भी मिल चुका है.

    लेकिन अमराघाट के रहने वाले और अपनी उम्र 100 से ऊपर बताने वाले चन्द्रधर दास जैसे भी हैं जिन्हे फ़िलहाल छोड़ दिया गया है अगली पेशी की तारीख़ तक.

    हाइवे से सटे एक छोटे से दो कमरे वाली टीन की छत के नीचे चन्द्रधर दास ने अपनी दास्तान सुनाई.

    "जेल में दूसरे क़ैदियों को मेरी उम्र और वहाँ होने पर ताज्जुब था. क़ैदी ही मेरी मदद करते थे क्योंकि मैं बिना सहारे के चल नहीं सकता, उठ-बैठ नहीं सकता. मैंने ऐसा क्या गुनाह किया था कि इस उम्र में मुझे तीन महीने जेल में डाल दिया गया...अगर जेल जाना पड़ा तो दोबारा जाऊँगा लेकिन ये साबित करके रहूँगा कि मैं भारतीय ही हूँ".

    असम के डिटेंशन कैंप इन दिनों ज़्यादा चर्चा में इसलिए हैं क्योंकि हाल ही में एनआरसी यानी राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर की अंतिम लिस्ट को जारी किया गया है.

    इस लिस्ट में उन लोगों का नाम है जिन्हें भारतीय नागरिक घोषित कर दिया गया है. हालांकि करीब 40 लाख लोग ऐसे भी हैं जिनका नाम इस लिस्ट में नहीं आया है.

    लोगों में इस बात को लेकर डर था कि आगे उनका क्या होगा, क्या उन्हें विदेश भेज दिया जाएगा या फिर कहीं उनके ख़िलाफ़ विदेशी ट्राइब्यूनल में मामले तो नहीं शुरू हो जाएंगे.

    हलांकि सरकार ने इस बात को साफ़ किया है कि एनआरसी का डिटेंशन कैंपों में रहने वालों से कोई लेना-देना नहीं है और जिनका नाम लिस्ट में नहीं आया उन्हें और मौके दिए जाएंगे नागरिकता साबित करने के.

    लेकिन डिटेंशन कैंपों के भीतर के हालात पर असम सरकार ने अभी तक ज़्यादा खुल कर बात नहीं की है.

    राज्य गृह मंत्रालय के एक वरिष्ठ अफ़सर ने बीबीसी से कहा, "हम लोग इस बात पर काम कर रहे हैं कि डिटेंशन कैंपों को जेलों से अलग शिफ़्ट किया जाए. साथ ही हम लोग डिटेंशन कैंपों के हालात सुधारने के लिए पूरे प्रयास कर रहे है."

    ये 'प्रयास' कब तक सच होने की शक्ल लेंगे ये कह पाना फिलहाल मुश्किल है.

    लेकिन जिन लोगों के यहाँ रहना पड़ रहा है या जो लोग यहाँ रह चुके हैं, उनके लिए ये डिटेंशन कैंप एक भयानक सपना है जिसे भुलाने में वे दिन-रात लगे हैं.

    NRC हिंदू-मुस्लिम मुद्दा नहीं, सियासत की असल कहानी कुछ और है

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    English summary
    Ground Report what happens inside the detention camp in Assam

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