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ग्राउंड रिपोर्ट: 'वो चले गए, अब कौन मेरे बच्चों को देखेगा?'

इराक़ में साल 2014 में 40 भारतीय लापता हो गए थे जिनमें से 39 की हत्या की पुष्टि मंगलवार को विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने की.

इनमें से पांच बिहार के सिवान ज़िले से हैं. ज़िले के संतोष कुमार सिंह और विद्याभूषण तिवारी के घर सहसरांव गांव में हैं.

ये दोनों साल 2011 में एक साथ पहली बार विदेश में काम करने के लिए इराक़ गए थे.

ग्राउंड रिपोर्ट: वो चले गए, अब कौन मेरे बच्चों को देखेगा?

इराक़ जाने के बाद ये दोनों कभी घर नहीं लौट पाए. मंगलवार को उनकी वापसी की सभी उम्मीदें भी खत्म हो गईं.

सुषमा स्वराज की संसद में घोषणा के बाद थोड़ी देर बाद ही इन दोनों परिवारों को ये सूचना समाचार चैनलों से मिली.

संतोष के भाई पप्पू कुमार सिंह बताते हैं, ''जब से भैया फंसे थे तब से हमलोग उनके समाचार के लिए टीवी न्यूज़ ज्यादा देखने लगे थे. कल भी समाचार के लिए टीवी खोले तो अचानक दिखलाने लगा कि उनतालीस भारतीयों का डेड बॉडी मिल गया है.''

''सुषमा कहती थीं कि सब लोग जिंदा हैं''

वहीं विद्याभूषण की पत्नी पूनम देवी मंगलवार के बाद से रह-रह कर बेसुध हो जाती हैं. वह रोते हुए कहती हैं, ''वो हमें छोड़ के चले गए. वो बच्चों को बहुत पढाना चाहते थे. अब कौन हमें और मेरे बच्चों को देखेगा.''

भविष्य की चिंता

पूनम को तो ये भी ठीक से याद नहीं कि पति से उनकी अंतिम बातचीत कब हुई थी. वो कभी 2015 तो कभी 2016 का साल बताती हैं जबकि जून 2014 से संतोष का परिवार से कोई संपर्क नहीं हुआ था.

पति से अंतिम बातचीत के बारे में याद करते हुए उन्होंने कहा, ''वो बोले कि यहां बहुत गोली-बंदूक चल रहा है. मैंने कहा कि चले आइए तो उन्होंने जवाब दिया था कि कैसे आएं. आने का कोई उपाय नहीं है. इतने में फोन लाइन कट गई. इसके बाद फिर बात नहीं हुई."

पूनम के दो बच्चे हैं. दस साल की बेटी खुशी कुमारी और करीब छह साल का बेटा तनिष्क कुमार तिवारी. विद्याभूषण के इराक़ में रहते ही तनिष्क का जन्म हुआ था. विद्याभूषण के न तो पिता ही जीवित हैं और न ही उनका अपना कोई भाई है. ऐसे में घर के मुखिया उनके चाचा पुरुषोत्तम तिवारी हैं.

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कुछ महीने पहले लिया था ब्लड सैंपल

वे बताते हैं, ''हम उम्मीद रखे थे कि हमारा बच्चा आएगा. क्योंकि सुषमा स्वराज से मिलने पर अक्सर वो कहती थीं कि मैं सिंदूर की कसम खाकर कहती हूं कि सब लोग जिंदा हैं. वे कब्जे में हैं. वो लोग आएंगे. वो हमें कहती थी कि थोड़ा सब्र रखिए.''

बहन की शादी टाली जाती रही कुछ महीनों पहले डीएनए मिलान के लिए विद्याभूषण की मां, बेटे और बेटी के खूने के नमूने प्रशासन ने लिए थे.

क्या ब्लड सैंपल भेजने के बाद मन में आशंकाएं बढ़ गई थीं? इसके जवाब में पुरुषोत्तम तिवारी ने बताया, ''नहीं ऐसा नहीं लगा. हम डीएम साहब से पूछे कि सर सैंपल क्यूं लिए जा रहे हैं. इसके जवाब में उन्होंने बताया था कि उन लोगों की खोज, जांच-पड़ताल के लिए ये सैंपल लिया जा रहा है. ऐसा नहीं है कि वो लोग अब नहीं हैं.''

वो आगे कहते हैं, ''हमको ऐसा लगा कि उन लोगों को जेल वगैरह में रखा होगा. ब्लड ग्रुप से मिला कर हम लोगों को अपने-अपने परिजन को सुपुर्द करेगा.''

विद्याभूषण की वापसी के इंतजार में उनकी बहन नीलम की शादी दो साल तक टाली जाती रही. वो कहते थे कि हम आएंगे तो बहन की शादी करेंगे. उन्होंने बहन की धूमधाम से शादी करने के लिए पैसे भी इकट्ठे किए थे. लेकिन काफी इंतज़ार के बाद बीते साल नीलम की शादी कर दी गई.

2014 में आए फ़ोन ने बढ़ाई थी चिंता

विद्याभूषण के साथ इराक़ जाने वाले संतोष ने मैट्रिक तक की पढ़ाई की थी. जब वो गए थे तो उनकी उम्र करीब चौबीस साल रही होगी. वो अक्सर फोन करते रहते थे. चौदह जून, 2014 को घर वालों से आखिरी बातचीत में उन्होंने यें बातें बताई थीं, ''हमलोग को कंपनी दूसरी जगह ले जा रही है. हम लोग सुरक्षित हैं. दूसरी जगह पहुंचकर फोन करेंगे आप लोग घबराइएगा मत.''

साथ ही उनके भाई पप्पू कुमार सिंह एक दूसरे फोन कॉल के बारे में बताते हैं, ''2014 की सोलह जून को एक और फोन आया. उन्होंने पहले मेरा नाम पूछा और मां-पिताजी के बारे में भी पूछताछ की. उसके बाद फोन करने वाले ने बताया कि उन लोगों को मार दिया गया है. मैं इधर से फोन करने वाला का नाम पता पूछते रह गया लेकिन उन लोगों ने कुछ नहीं बताया. भाषा भी ज्यादा कुछ समझ नहीं आ रही थी. फिर फोन काट दिया गया.''

संतोष के घर वालों को एक फोन आया था कि संतोष को मार दिया गया है, दूसरी ओर सरकार सभी लापता के जीवित होने का भरोसा दिला रही थी. ऐसे में परिवार किस बात पर यकीन कर रहा था. इस सवाल के जवाब में पप्पू कहते हैं, "सुषमा जी से ये तसल्ली मिलती थी कि सभी भारतीय जिंदा हैं. आतंकवादी उनसे काम करा रहे हैं. हम लोग इसी उम्मीद भी थे वो लोग ठीक हैं.''

बीते चार साल से संतोष का परिवार आशा और आशंका के बीच इंतज़ार का एक-एक दिन काट रहा था. पिता चंद्रमोहन सिंह बताते हैं ''14 जून को संतोष से आखिरी बातचीत हुई थी. उसने बताया था कि हमलोग ठीकठाक से हैं. उसके बाद से कोई संपर्क नहीं हुआ. सुषमा स्वराज की बातों से हमें आशा थी. लेकिन कल ये आशा टूट गयी. बीते चार साल में आशा और अंदेशा के बीच कष्टमय जिंदगी गुजरी. अब तो ऐसे ही जिंदगी काटना है.''

संतोष के विदेश जाने के जुड़े सपनों के बारे में चंद्रमोहन कहते हैं, ''हर कोई सपना संजो कर रखता है. अब सब फीका हो गया. अब ये सब न कहने वाली बात है न सुनने वाली बात.''

सरकार से मदद की उम्मीद

दोनों के घरवालों को सरकार से नौकरी और आर्थिक मदद की उम्मीद है.

पुरुषोत्तम तिवारी कहते हैं, ''इस परिवार को देखने वाला कोई है ही नहीं.मेरी उम्र पैसठ बरस हो चुकी है. मैं अब कितने बरस जिंदा रहूंगा. पंजाब में मृतकों के परिजनों ने एक करोड़ की आर्थिक मदद और नौकरी की मांग की है. हम भी सरकार से ऐसी ही मांग करते हैं.''

उन्हें सरकार से शिकायत भी है. उनका कहना है कि पंजाब की राज्य सरकार पहले से ही आर्थिक मदद कर रही है लेकिन उन्हें अब तक कुछ नहीं मिला.

वहीं गांव के जुगल किशोर सिंह कहते हैं, ''अभी गांव के करीब सौ लोग विदेशों, खास कर खाड़ी देशों में काम करते हैं. सारे लोग रोजी-रोटी के गए हैं. इस घटना के बाद ऐसा नहीं है वे वापस आने की सोच रहे हों.''

सिवान बिहार के उन जिलों में से है जहां से सबसे ज्यादा लोग काम के लिए विदेश जाते हैं. लेकिन संतोष के भाई पप्पू काम करने के लिए अब विदेश नहीं जाना चाहते हैं.

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