Tipraland की मांग क्या है? जिसने त्रिपुरा विधानसभा चुनाव 2023 में राजा को बना दिया 'किंग मेकर'
Tripura Election Result 2023: त्रिपुरा विधानसभा चुनाव 2033 की मतगणना हो रही है। भाजपा ने बहुमत का आंकड़ा पार कर लिया है। जानिए Tipra Motha की Greater Tipperland की मांग क्या है?

त्रिपुरा विधानसभा चुनाव 2023 में 2 मार्च को मतगणना हुई है, जिसमें दोपहर तक रुझानों में भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। बहुमत का आंकड़ा भी पार कर लिया। इस बार टिपरा मोथा पार्टी ने धमाकेदार एंट्री की और टिपरा मोथा अध्यक्ष प्रद्योत बिक्रम माणिक्य देब बर्मा को किंग मेकर की भूमिका में ला दिया।
त्रिपुरा में किसकी सरकार बनेगी?
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त्रिपुरा में किसकी सरकार बनेगी? यह तस्वीर अभी धुंधली है। इस जानिए आखिर टिपरा मोथा पार्टी ने ग्रेटर टिपरालैंड की मांग के दम पर त्रिपुरा के 'राजा' प्रद्योत बिक्रम माणिक्य देब बर्मा को कैसे पहली बार में किंग मेकर बना दिए? क्या है ग्रेटर टिपरालैंड की मांग?
त्रिपुरा विधानसभा चुनाव 2023 में टिपरा मोथा पार्टी
60 सीटों वाली त्रिपुरा विधानसभा के चुनाव में टिपरा मोथा पार्टी ने 42 सीटों पर प्रत्याशी उतारे। दोपहर तक के रुझानों में भाजपा के 33, माकपा के 11, टिपरा मोथा पार्टी के 11, कांग्रेस के 4 प्रत्याशी बढ़त बनाए हुए थे। टिपरा मोथा पार्टी त्रिपुरा में भाजपा की सरकार बनाने में साथ दे सकती है।

त्रिपुरा में लगभग 6 लाख त्रिपुरी आदिवासी
दरअसल, त्रिपुरा में एक तिहाई आबादी आदिवासियों की है। जनगणना 2011 के अनुसार त्रिपुरा में 31.8 फीसदी आबादी आदिवासी समुदाय से है, जो 19 अधिसूचित जनजातियों में बंटी हैं। त्रिपुरा में लगभग 6 लाख त्रिपुरी आदिवासी हैं। दूसरे नंबर पर दो लाख आबादी वाले ब्रू या रियांग हैं। तीसरी जमातिया की आबादी करीब एक लाख है।
ग्रेटर टिपरालैंड की मांग बढ़ रही
त्रिपुरा में 70 फीसदी आबादी बंगाली समुदाय से है। बंगाली समुदाय के बढ़ते असर के खिलाफ और अपने अलग राज्य ग्रेटर टिपरा लैंड की मांग त्रिपुरा के आदिवासी लंबे समय से कर रहे हैं।
ग्रेटर टिपरालैंड के लिए त्रिपुरा में धरना प्रदर्शन भी होते रहे हैं। ग्रेटर टिपरा लैंड की मांग करने वालों का कहना है कि उनके राज्य में बड़ी संख्या में आदिवासी रह रहे हैं। ऐसे में केंद्र संविधान के अनुच्छेद 2 और 3 के तहत अलग राज्य बनाया जाए।

ग्रेटर टिपरालैंड के लिए बनी टिपरा मोथा पार्टी
त्रिपुरा राजपरिवार के उत्तराधिकारी और टिपरा मोथा पार्टी के प्रमुख प्रद्योत किशोर माणिक्य देबबर्मा की आदिवासियों पर जबरदस्त पकड़ है। ग्रेटर टिपरा लैंड की मांग को लेकर प्रद्योत बिक्रम माणिक्य देब बर्मा हमेशा उग्र रहे हैं। इसी मांग के समर्थन में टिपरा मोथा पार्टी अस्तित्व में आई थी।
ग्रेटर टिपरालैंड के लिए प्रद्योत बिक्रम का तर्क
मीडिया की खबरों के अनुसार प्रद्योत बिक्रम का कहना था कि ग्रेटर टिपरालैंड आदिवासियों की विरासत, संस्कृति और हक को सुरक्षित करने के लिए त्रिपुरा से अलग एक नया राज्य बनाया जाना चाहिए।
1985 में संविधान की छठी अनुसूची के तहत आदिवासियों के अधिकार और विरासत सुनिश्चित करने के लिए टीटीएडीसी का गठन हुआ था।
ग्रेटर टिपरालैंड की मांग कैसे उठी?
दरअसल, साल 1949 में त्रिपुरा का भारत सरकार के साथ विलय होने के बाद 13वीं शताब्दी के अंत से जारी माणिक्य वंश का शासन समाप्त हुआ। त्रिपुरा भारत सरकार के कब्जे में आया।
साल 1971 तक पूर्वी पाकिस्तान (वर्तमान बांग्लादेश) से बंगालियों का विस्थापन खूब हुआ। आदिवासियों की आबादी घटती गई। 1881 से आदिवासी 63.77 फीसदी थी, जो 2011 तक 31.80 तक रह गई। इस बीच आदिवासियों के अलग राज्य ग्रेटर टिपरालैंड की मांग उठने लगी, जो अब जोर पकड़ चुकी है।
क्या पूरा हो पाएगी ग्रेटर टिपरालैंड की मांग?
त्रिपुरा में ग्रेटर टिपरालैंड की मांग पूरी होना संभव नहीं है। यह हम नहीं बल्कि त्रिपुरा के सीएम माणिक साहा कह चुके हैं। साहा ने तर्क दिया कि ग्रेटर टिपरालैंड की प्रस्तावित सीमा न केवल असम और मिजोरम बल्कि पड़ोसी बांग्लादेश से भी गुजरती है।












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