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G. R. Khairnar: गुंडों को पटक कर मारने वाला एक ईमानदार अफसर

नई दिल्ली, 29 अक्टूबर। गोविंद राघव खैरनार। जी आर खैरनार के नाम से मशहूर। भारत के महानतम अधिकारियों में एक। ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा की ऐसी मिसाल मुश्किल है। कद काठी तो बेहद साधारण लेकिन जिगर फौलाद का। न नेताओं से डरे न गुंडों से। उन्होंने मुख्यमंत्री से लेकर अंडरवर्ल्ड डॉन तक को कानून की हनक दिखायी। उन पर कई बार जानलेवा हमले हुए। गोलियां खायीं। लेकिन उनके इरादे अटल रहे।

Govind Raghav Khairnar a story of the honest officer g r Khairnar

लाजवाब काम की वजह से ही वे अपर डिविजन क्लर्क से तरक्की कर मुम्बई महानगरपालिका के डिप्टी कमिश्नर तक बने। उनकी दिलेरी की कई कहानियां हैं। एक कहानी उनकी आत्मकथा 'राही अकेला' से।

ईमानदार और जांबाज अफसर

ईमानदार और जांबाज अफसर

जी आर खैरनार का जन्म महाराष्ट्र के नासिक जिले में एक साधाऱण किसान परिवार में हुआ था। स्नातक करने के बाद 1964 में वे अपरडिविजन क्लर्क बने। 1974 में वे लेखा अधिकारी बन कर मुम्बई महानगरपालिका (बीएमसी) में आये। अपनी कार्यकुशलता वे लगातार तरक्की करते गये। 1985 में वार्ड अधिकारी के रूप में उनकी तैनाती हुई। फिर वे मुम्बई महानगरपालिका के डिप्टी कमिश्नर भी बने। वे जब बीएमसी में वार्ड अधिकारी बने थे तब उन्होंने अतिक्रमण के खिलाफ एक सघन अभियान चलाया था। इससे भूमाफिया और सड़क पर अवैध बाजार लगाने वालों को परेशानी होने लगी। खैरनार साहब ने सरकारी जमीन और सड़क को मुक्त कराने के लिए बेहद सख्त रवैया अपनाया। वे न मंत्री की सुनते न अपने बड़े अफसर की। वे लिखते हैं, "जब मैं महापालिक में गया तब वहां भ्रष्टाचार का अथाह सागर हिलोरें ले रहा था। एक-आध को छोड़ कर पूरा महापालिका भ्रष्टाचार, दादागिरी और लापरवाही के दलदल में आकंठ डूबा हुआ था। अवैध निर्माण पर नजर रखने वाले इंजीनियरों की पांचों उंगलियां घी में थीं। छोटा अफसर बड़े अफसर को चढ़ावा देकर खुश करता था। इनका तबादला भी मुश्किल था, क्यों कि उनके हाथ बहुत लंबे थे। लेकिन मैंने किसी की परवाह नहीं की। तय कर लिया कि कानून के हिसाब से जो सही होगा वही करूंगा।"

घायल होने के बाद भी गुंडे को दे मारी लाठी

घायल होने के बाद भी गुंडे को दे मारी लाठी

एक दिन खैरनार साहब अतिक्रमण हटाने सड़क पर निकले थे। तभी किसी ने पीछे से उनके सिर वार कर दिया। वे खून से लथपथ हो गये। उनके हाथ से गाड़ी की चाबी और घड़ी जमीन पर गिर पड़ी। घायल होने के बाद भी वे डरे नहीं। उन्होंने देखा कि वह गुंडा दूसरा वार करने के लिए फिर डंडा ऊपर उठा चुका है। तभी वे उस पर झपट पड़े और हाथ से डंडा छीन लिया। फिर उन्होंने उसी डंडे पर उस गुंडे पर वार किया। वह जमीन पर गिर पड़ा और बेहोश हो गया। फिर उन्होंने गुंडों को ललकारा। अरे डरपोकों, हिम्मत है तो सामने से मुकबला करो ! देखते हैं कि कौन मरता और कौन जिंदा रहता है ? इस चैलेंज से आठ-दस गुंडे भौंचक्के रह गये। उनका एक साथी बेहोश पड़ा था। खैननार साहब का साहस देख कर गुंडे भागने लगे। तब उनका बेहोश साथी भी होश में आ चुका था। गुंडे जान बचा कर भागने लगे। खून से लथपथ खैरनार साहब पकड़ो ! पकड़ो ! कह कर खदेड़ते रहे। मुम्बई की सड़क पर किसी फिल्म जैसा नजारा था। सड़क पर मौजूद कुछ लोगों ने उन्हें पहचान लिया। खून में सने कपड़े देख उन्हें रोक लिया और अस्पताल ले गये। उनकी पत्नी को खबर मिली तो वे दौड़ी-दौड़ी आयीं। उनके सिर पर पट्टी बंधी थी और कपड़े खून से लाल थे। पति को इस हालत में देख कर वे बिफर पड़ी, भांड में जाए ऐसी नौकरी जिसमें जान का खतरा हो। इस हालत में भी खारनार साहब अपनी पत्नी को समझा- बुझा कर शांत कराते रहे।

डॉन वरदाराजन की पेशकश

डॉन वरदाराजन की पेशकश

1970-80 के दशक में वरदराजन मुदलियार मुम्बई का डॉन था। लोग उसे वरदा भाई कह कर बुलाते थे। उसके आतंक से लोग थरथर कांपते थे। हमले के कुछ दिन बाद खैरनार साहब बीएमसी के दफ्तर पहुंचे थे। तभी वहां वरदाराजन के दो आदमी पहुंचे। उन्होंने कहा, "हमें वरदा भाई ने भेजा है। आपके ऊपर हमला हुआ है जिससे उनको तकलीफ हुई है। हमें आदेश मिला है कि आपके हमलावर को खोज कर उनके हाथ-पैर तोड़ दें। आपने जिन फेरीवालों को सड़क से हटाया है वे जुलूस लेकर आपके दफ्तर में आ रहे हैं।" खैरनार साहब ये सब सुन कर हैरान रहे गये। उन्होंने वरदाराजन के दोनों आदमियों से कहा, गरीब फेरी वालों के हाथ पैर तोड़ने की जरूरत नहीं। मैं तो किसी को पहचानता भी नहीं। आप लोग यहां से चले जाइए। वे चले गये। इतने में खैरनार साहब ने देखा कि फेरी वालों का मोर्चा उनके दफ्तर के करीब पहुंच गया है। वे अभद्र नारे लगा रहे थे। उनके खिलाफ बहुत गुस्सा था। बचाव के लिए उन्होंने अपने दफ्तर का दरवाज अंदर से बंद कर लिया। फेरीवाले दफ्तर में घुस तक तोड़फोड़ करने लगे। तभी पुलिसवाले आ गये और खैरनार साहब की जान बची।

गोली लगने के बाद भी गुंडों को खदेड़ते रहे

गोली लगने के बाद भी गुंडों को खदेड़ते रहे

20 मई 1985 की सुबह 7 बज कर 50 मिनट। खैरनार साहब दफ्तर पहुंचे। उन्होंने कार खड़ी की और अपने कमरे की तरफ बढ़े। कुछ लोग भीड़ बना कर उनके कमरे के बाहर उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे। तभी उन्होंने एक तेज आवाज सुनी। उन्होंने समझा कोई पटाखा फूटा है। लेकिन तभी एक आदमी को नीचे गिरा देख। सामने दो लगो आ रहे थे। एक के हाथ में तलवार और दूसरे के हाथ में पिस्तौल थी। तब उनकी समझ में आया कि गोली चली है। हथियारबंद हमलावर जब पांच सात फीट के फासले पर रह गये तब खैरनार साहब डर गये। उनका दिमाग तेजी से घूम रहा था। उन्हें लगा कि हमलावर गोली मारने वाले हैं। तभी वे तेजी से नीचे झुक गये। गोली उनके जांघ के आरपार हो गयी। जब मौत सामने खड़ी हो तो बचने के लिए इंसान कुछ भी करने को तैयार रहता है। खैरनार साहब झुके झुके ही हमलावरों पर तेजी से झपटे। इससे वे घबरा गये क्यों कि बीएमसी के दफ्तर में खड़े थे। पकड़े जाने के डर वे भागने लगे। खैरनार साहब के पास अपना लाइसेंसी रिवाल्वर था। उन्होंने अपना रिवाल्वर निकाला और गोली चलाने वाले अपराधी को खदेड़ने लगे। उन्होंने गुंडों को डराने के लिए हवा में गोलियां चलायीं। मुम्बई के सेनापति बापट मार्ग पर जिसने भी ये दृश्य देखा वो हक्का-बक्का रह गया। लोगों ने किसी पुलिस अधिकारी को तो ऐसा करते देखा था लेकिन किसी प्रशासनिक अधिकारी को पहली बार इस रूप में देख रहे थे। गुंडे पकड़ में नहीं आये। खैरनार साहब की जांघ में गोली लगी थी। उन्हें इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती कराया गया।

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