बाढ़ ही बाढ़: कश्मीर पर सरकारी नजरें इनायत,बाकी से बेरुखी

नई दिल्ली(विवेक शुक्ला) जम्मू कश्मीर में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 2100 करोड रुपया दिया, सेना, एनडीआरफ पूरी तरह लगी है। कश्मीर के लोगों पत्थर खाने के बावजूद सेना प्रमुख ने कह दिया है कि जब तक एक-एक व्यक्ति को सेना बाहर निकाल कर राहत शिविरों तक नहीं पहुंचा देती वापस नहीं लौटेगी।

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इधर भी ध्‍यान दीजिए मिस्‍टर प्राइम मिनिस्‍टर

प्रधानमंत्री ने लोगों से कश्मीरियों के लिए खुलकर दान देने का आह्वान कर दिया है। वरिष्ठ लेखक अवधेश कुमार कहते हैं कि इनसे किसी को समस्या नहीं। ऐसा होना ही चाहिए।

देश के लोगों के सामने बाढ़ को लेकर कुछ प्रश्न खड़े हो रहे हैं। मसलन, बाढ़ केवल कश्मीर में नहीं है।

कोसी नदी ने पूर्वी उत्तर प्रदेश से लेकर बिहार तक कहर बरपा रखा है। लोग बांधों पर, स्वयं के टेंटों में या स्थानीय लोगों के चंदे आदि से मिले सामानों पर गुजारा करने को मजबूर हैं।

बिहार में भी बाढ़

बिहार के मिथिलांचल से लेकर सीमांचल तक चले जाइए, कलेजा मुंह को आ जाएगा। मध्य प्रदेश के कई जिले बाढ़ की चपेट में है। स्वयं प्रधानमंत्री के राज्य गुजरात में बाढ़ है। आंध्र में बाढ़ है। क्या वे सब देश के भाग नहीं है?

बिहार की तो बुरी गति है। वहां तो सरकार तक ध्यान नही दे रही। आश्चर्य है कि वहां के भाजपा के नेता तक केन्द्र से सहायता नहीं मांग रहे। यह दोहरा आचरण क्यों?

आप कश्मीर को अवश्य दीजिए, लेकिन बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश जैसे को नजरअंदाज मत करें। उनने आपका क्या बिगाड़ा है? कारण, वह इस समय अनाथ प्रदेश जैसा हो चुका है।

बाकी सूबों को भी देखें साथ ही पूर्वी उत्तर प्रदेश, गुजरात, मध्यप्रदेश एवं आंध्र की ओर भी नजर उठाएं। ऐसा नहीं करते तो उनके प्रति जो विश्वास पैदा हुआ है उनसे जो उम्मीदें लोगों की बंधी है वे ध्वस्त हो जाएंगी।

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