इलेक्शन के T-20 फॉरमेट में बार-बार फेल हो रहे मोदी-शाह, पढ़ें हार दर हार का Analysis
नई दिल्ली। यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ के गढ़ गोरखपुर और डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य की सीट फूलपुर में वोटों की गिनती जारी है। दूसरी ओर बिहार के अररिया, भाभुआ और जहानाबाद में भी काउंटिंग का काम जारी रही है। कुल मिलाकर जो तस्वीर सामने आ रही है, वह बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह और पीएम नरेंद्र मोदी दोनों के लिए चिंताजनक है। नॉर्थ-ईस्ट में कमल खिलने के बाद यूपी-बिहार उपचुनाव के नतीजों पर पूरे देश की नजरें की टिकी हैं। खासतौर पर उत्तर प्रदेश, जहां सीएम योगी सरकार चला रहे हैं और बीजेपी में बड़े ब्रैंड के तौर पर उभरे हैं। हालांकि, अभी काफी काउंटिंग बाकी है, लेकिन बीजेपी पिछड़ रही है। सबसे बुरी खबर यह है कि सीएम और डिप्टी सीएम के गढ़ में पिछड़ रही है। इससे पहले राजस्थान उपचुनाव में दो लोकसभा और एक विधानसभा में भी बीजेपी हार का सामना करना पड़ा। इसी तरह से मध्य प्रदेश, पंजाब, उड़ीसा, पश्चिम बंगाल में बीजेपी को उपचुनाव में हार का ही सामना करना पड़ा। आखिर ऐसा क्या है कि मोदी का चुनावी अश्वमेघ उपचुनावों में आकर रुक जाता है? इलेक्शन के T-20 फॉरमेट में आखिर क्यों फेल रही है मोदी-शाह की रणनीति? आइए जानते हैं इसके पीछे के मुख्य कारण।

अपने गढ़ में बीजेपी को लगातार झेलनी पड़ रही एंटी इनकमबैंसी
यह बात सच है कि बीजेपी को राजस्थान, मध्य प्रदेश के अलावा उड़ीसा, पश्चिम बंगाल और पंजाब में भी हार का सामना करना पड़ा। वैसे उड़ीसा और पंजाब उपचुनाव में बीजेपी की हार की चर्चा राष्ट्रीय स्तर नहीं, क्योंकि यहां वह न तो सत्ता में है और न ही पार्टी का बेस बहुत मजबूत। चूंकि, राजस्थान और मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश, बिहार में बीजेपी की सरकार है, इसलिए ये राज्य ज्यादा महत्वपूर्ण हैं। पश्चिम बंगाल में बीजेपी की हार को अहमियत इसलिए दी जा रही है, क्योंकि यहां बीजेपी मुख्य विपक्षी दल के तौर पर उभरी है। कुला मिलाकर उपचुनावों में बीजेपी की हार की चर्चा सबसे ज्यादा राजस्थान और एमपी की हुई। एमपी तो गुजरात के बाद हिंदुत्व की दूसरी लैबोरेट्री माना जाता है। वहीं, गुजरात से सटे राजस्थान में भी बीजेपी प्रचंड जीत दर्ज करके सत्ता में आई थी। लेकिन दोनों राज्यों में बीजेपी को एंटी इनकमबैंसी का सामना करना पड़ा। इसका फायदा कांग्रेस ने भरपूर उठाया भी। बीजेपी के लिए और चिंता की बात यह है कि राजस्थान, एमपी के बाद अब उत्तर प्रदेश और बिहार में एंटी इनकमबैंसी का असर दिख रहा है।
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तो क्या योगी समेत बीजेपी के क्षत्रपों में नहीं है चुनावों में जीत दिलाने का माद्दा
राजनीति में बड़े चेहरों को हर पार्टी में इसलिए ज्यादा महत्व दिया जाता है, क्योंकि ये चेहरे जीत की कुंजी कहलाते हैं। जनता से निजी जुड़ाव और व्यक्तित्व के करिश्मे से ये क्षत्रप नतीजों किसी भी वक्त बदल देते हैं। खासतौर से बीजेपी में इन क्षत्रपों को काफी अहमियत दी गई है। मसलन, एमपी में शिवराज वर्षों से पार्टी का एकमात्र चेहरा हैं। इसी प्रकार से यूपी में योगी और राजस्थान में वसुंधरा। कुछ ऐसी ही भूमिका गुजरात में नरेंद्र मोदी की भी थी। लेकिन नरेंद्र मोदी ने पीएम बनने के बाद न केवल गुजरात में एंटी इनकमबैंसी के बावजूद जीत दिलाने में सफलता पाई बल्कि अपने दम पर एक के बाद एक राज्यों में भगवा परचम लहराया। शिवराज ने भी अपने दम पर तीन बार सत्ता हासिल की। छत्तीसगढ़ में रमन सिंह ने भी ऐसा ही कर दिखाया। लेकिन राजस्थान और उत्तर प्रदेश में योगी और वसुंधरा का जादू उस प्रकार से वोट में तब्दील होता नहीं दिख रहा है। ऐसे में ब्रैंड योगी पर सवाल उठ रहे हैं। अगर यूपी उपचुनाव में बीजेपी को हार मिलती है तो इसे योगी के लिए बड़े झटके के तौर पर देखा जाएगा।
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आखिरकार वही हो रहा है जिसका पीएम मोदी बार-बार कर रहे हैं जिक्र
विधानसभा हो या लोकसभा चुनाव पीएम नरेंद्र मोदी ने हर चुनाव में जान फूंकी और उनके चेहरे पर बीजेपी को वोट भी मिला। लेकिन उपचुनावों में पार्टी को लगातार हार मिल रही है, इसका एक कारण यह भी है पीएम मोदी उपचुनावों में प्रचार करने नहीं जाते हैं। पीएम मोदी और अमित शाह लगातार अपने सांसदों से क्षेत्र में समय गुजारने के लिए कह रहे हैं, लेकिन ऐसा प्रतीत हो रहा है कि वे जनता को उतना समय नहीं दे रहे हैं। जनता की तो छोडि़ए हाल ही में एक कार्यक्रम के दौरान पीएम मोदी ने अपने सांसदों से शिकायत कर दी कि वे उन्हें ही टाइम नहीं देते हैं।
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