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ग्रेटर हैदराबाद नगर निगम चुनाव: क्या BJP के लिए दक्षिण का दूसरा दरवाजा खुल गया है ?

नई दिल्ली। ग्रेटर हैदराबाद नगर निगम चुनाव 2020 के नतीजों ने दक्षिण की राजनीति के लिए नए संकेतों की तरफ इशारा कर दिया है। हैदराबाद के नतीजों में दिन भर उठापटक चलती रही और अंत में जो तस्वीर सामने है उसने साफ कर दिया है कि यहां बीजेपी (BJP) भले ही सबसे बड़ा स्कोर करने से रह गई लेकिन सबसे मजबूत खिलाड़ी बनकर जरूर उभरी है। हैदराबाद नगर निगम के चुनाव को भले ही बीजेपी या यूं कहिए कि अमित शाह बनाम ओवैसी बनाया गया हो लेकिन नतीजों ने ये भी दिखाया है कि बीजेपी ने सबसे तगड़ा झटका सत्ताधारी टीआरएस को दिया है।

AIMIM को नहीं टीआरएस को नुकसान

AIMIM को नहीं टीआरएस को नुकसान

मुख्यमंत्री केसी राव की टीआरएस को ये झटका कितना बड़ा है ये समझने के लिए नतीजों पर एक नजर डालते हैं। हैदराबाद नगर निगम चुनाव में पिछली बार 99 सीट लाने वाली टीआरएस इस बार भी सबसे बड़ी पार्टी है लेकिन उसकी सीटें घटकर 56 पर पहुंच गई है। पिछले चुनाव में नगर निगम की 44 सीट पाने वाली ओवैसी की AIMIM इस बार भी उतने पर ही है। अब बात करते हैं बीजेपी की जिसने 48 सीट पर जीत हासिल की है। जबकि पिछले चुनाव में बीजेपी ने 150 सीटों में मात्र 4 सीट जीती थीं।

एक नगर निगम के चुनाव में दूसरे नंबर की पार्टी बन जाने को भाजपा के लिए दक्षिण के दुर्ग का दरवाजा खुलने की बात कहना कुछ जल्दबाजी नहीं होगी ? ये सवाल तो सही है लेकिन इसका जवाब जानने के लिए इस नगर निगम को समझना जरूरी है। ग्रेटर हैदराबाद नगर निगम देश के बड़े महानगरों में से एक है। ये नगर निगम जिन चार जिलों में फैला है उनमें हैदराबाद, रंगारेड्डी, संगारेड्डी और मेडचल-मलकजगिरी है। इन चार जिलों में विधानसभा की 24 सीटें हैं जबकि इसी क्षेत्र में 5 लोकसभा सीटें आती हैं।

टीआरएस को AIMIM के सहारे की जरूरत

टीआरएस को AIMIM के सहारे की जरूरत

राज्य की 119 सदस्यों वाली विधानसभा में जिस क्षेत्र से 24 विधायक चुने जाते हों उसकी अहमियत का अंदाजा लगाया जा सकता है। इसी हैदराबाद क्षेत्र से बीजेपी का एक विधायक है जबकि पिछली बार नगर निगम में उसके पास 4 सीट ही थी। अब 48 सीट जीतने के बाद पार्टी के हौसले बुलंद हैं।

अब टीआरएस के सामने मुश्किल है कि नगर निगम की सत्ता हाथ में रखने के लिए बैसाखी की जरूरत होगी। ज्यादा संभावना है कि टीआरएस और AIMIM साथ आएं। नतीजों के बाद ओवैसी ने अपने बयान में इसके संकेत भी दे दि हैं। ओवैसी ने कहा कि TRS तेलंगाना की भावना का प्रतिनिधित्व करती है। टीआरएस AIMIM के साथ आने की दूसरी वजह भी है। AIMIM का प्रभाव हैदराबाद से बाहर तेलंगाना में नहीं है और वह 2013 के राज्य विधानसभा चुनाव में टीआरएस के लिए उतना बड़ा खतरा नहीं है। शायद भाजपा चाहती भी यही होगी। अगर केसीआर और ओवैसी साथ आते हैं तो भाजपा अपने उस आरोप को फिर दोहराएगी जिसमें वह कहती रही है कि टीआरएस और AIMIM में गुप्त समझौता है।

बीजेपी ब्रांड राजनीति में ओवैसी TRS के लिए मुश्किल

बीजेपी ब्रांड राजनीति में ओवैसी TRS के लिए मुश्किल

भाजपा जिस तरह की हिंदूवादी राजनीति करती रही है। खासतौर पर हैदराबाद नगर निगम चुनाव में ही पार्टी के स्टार प्रचारक और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने जिस तरह से हैदराबाद का नाम बदलकर भाग्यनगर रखने वाला बयान देकर पार्टी के इरादे जाहिर कर दिए हैं। अगर केसीआर नगर निगम में ओवैसी से समझौता करते हैं तो बीजेपी इसे लेकर राज्य में जाएगी। अगर ध्रुवीकरण की लहर बनी तो फिर विधानसभा में भी केसीआर के लिए झटका लगना तय है।

फिर हम उसी सवाल पर पहुंचते हैं कि क्या एक नगर निगम के चुनाव से राज्य की सियासत का दरवाजा खुलने की बात कहना जल्दबाजी है ? एक बार ये मान लें तो भी राज्य में बीजेपी की ताकत सिर्फ इस नगर निगम से ही नहीं है। हाल ही में इसी हैदराबाद से 110 किमी दूर हुए दुब्बाक विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव में बीजेपी ने अपनी बढ़ती ताकत का लोहा मनवाया है। टीआरएस को ये सीट जीत पाने पूरा भरोसा था लेकिन नतीजे आए तो जिस सीट को आम चुनाव में टीआरएस ने 62,500 वोट से जीती थी वहीं पार्टी भाजपा से 1000 वोट से हार चुकी थी।

दुब्बाक की हार केसीआर के लिए शर्मनाक

दुब्बाक की हार केसीआर के लिए शर्मनाक

दुब्बाक की जीत सामान्य जीत नहीं है। ये सीट जिस सिद्दीपेट जिले में है उसे टीआरएस का गढ़ माना जाता है। दुब्बाक सीट से लगी हुई तीन विधानसभा सीटों ऐसी हैं जिनका प्रतिनिधित्व केसीआर परिवार करता है। दक्षिण की विधानसभा गजवेल का मुख्यमंत्री केसीआर खुद प्रतिनिधित्व करते हैं। दुब्बाक से ही सटी सिद्दीपेट सीट से केसीआर के दामाद और मंत्री हरीश राव हैं। हरीश राव को कभी केसीआर के दावेदारों में समझा जाता था। वहीं उत्तर की सिरकला सीट पर केसीआर के बेटे कल्वाकुंतला तालक राम राव (केटीआर) विधायक हैं जो कि केसीआर सरकार में सूचना और प्रोद्योगिक मंत्री हैं। यानि कि दुब्बाक की हार सिर्फ एक विधानसभा की हार नहीं है। इसके राजनीतिक संदेश काफी बड़ा है। यही वजह है कि दुब्बाक जीतने के बाद से ही बीजेपी नेता ये दावे कर रहे थे कि हैदराबाद नगर निगम के चुनाव में वे दुब्बाक की जीत दोहराएंगे। अब जीएचएमसी के नतीजों ने एक बार फिर बीजेपी कार्यकर्ताओं के हौसले बुलंद कर दिए हैं और पार्टी इन नतीजों के बाद अगले विधानसभा के लिए जुट गई है। पार्टी की ताकत की एक और परीक्षा जल्द ही नागार्जुन सागर विधानसभा क्षेत्र में होगी जहां के विधायक नोमुल नरसिम्हा का हाल ही में निधन हो गया है।

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