बिना नमक, शाकाहारी भोजन...कैसे आज की लाइफस्टाइल में फिट बैठती है महात्मा गांधी की 'डायट'
Mahatma Gandhi food diet plan: 'मुझे कई लोग सनकी और पागल आदमी के रूप में जानते हैं...', महात्मा गांधी ने ये बात 1929 में अपनी साप्ताहिक पत्रिका 'यंग इंडिया' में अपने भोजन और आहार प्रयोगों का जिक्र करने के लिए कही थी। महात्मा गांधी अपने भोजन को लेकर बहुत गंभीर थे। महात्मा गांधी की 'डायट' आज की लाइफस्टाइल में बिल्कुल फिट बैठती है। गांधी जयंती विशेष में आज हम बापू के खाने के तौर-तरीकों पर चर्चा करेंगे।
आज के वक्त में हम कई तरह के आहार और जीवनशैली अपनाते रहते हैं लेकिन महात्मा गांधी की जीवनशैली को भूल जाते हैं। जो वास्तव में न्यूनतर, सरल है और प्रकृति के प्रवाह और लय के साथ चलती है।

महात्मा गांधी कोई हेल्थ एक्सपर्ट या फिर डाइटिशियन या न्यूट्रिशन नहीं थे लेकिन अपने लिए एक सही डायट विकसित करने में उन्होंने कई अवधारणाओं को आजमाया था, जो आज के जमाने में और भी ज्यादा प्रासंगिक हो गई है।
कैसा था गांधी जी का डायट
महात्मा गांधी कहते थे कि, 'आहार में संयम, मात्रा और गुणवत्ता उतना ही जरूरी है, जितना विचार और वाणी में संयम जरूरी होता है।' गांधीजी की आहार को लेकर कई चिंताएं अस्वाभाविक रूप से समसामयिक थीं। महात्मा गांधी हमेशा कम और शाकाहारी भोजन करते थे। उनके लिए भोजन करना भोग-विलास के बारे में नहीं था, बल्कि आपके शरीर के लिए एक आम जरूरत थी।
शाकाहारी बने रहना, नमक की मात्रा सीमित करना, कभी-कभी बिना नमक के खाना खाना, सूर्यास्त के बाद भोजन न करना, हफ्ते में एक-दो दिन उपवास करना, सिर्फ फल और जूस पीकर रहना...,सूरज की रोशनी के साथ जल्दी उठना, जल्दी सोना... ये कुछ ऐसी आदतें हैं, जो गांधी जी ने ताउम्र की।
आज के जमाने में जहां नमक का सेवन कम करने, शाकाहारी बनने पर जोर दिया जा रहा है, वहीं गांधी जी ने इन सारी आदतों को सालों पहले अपनाया हुआ था।
गांधी जी ने हमेशा क्षेत्रीय और मौसमी फल और सब्जियों के खाने की वकालत की, जिसमें बहुत सारे फल, सूखे मेवे, जड़ी-बूटियां शामिल हैं। गांधी जी पौष्टिक भोजन, सादा पका हुआ भोजन, जो उसके पोषक तत्वों को नष्ट ना करे, ऐसा खाना खाने पर पर जोर देते थे। उन्होंने कई बार ज्यादा नमक और ज्यादा चीनी खाने वालों को सर्तक रहने को कहा था। गांधी जी तेल की जगह शुद्ध घी, चीनी की जगह गुड़ और गाय-भैंस की दूध की जगह बकरी के दूध के उपयोग को बढ़ावा दिया करते थे।

उपवास पर जोर देते थे गांधी जी
आज के जमाने में आपने इंटरमिटेंट फास्टिंग के बारे में जरूर सुना होगा, लेकिन गांधी जी सालों पहले शरीर को आराम देने और खुद को डिटॉक्स करने के लिए उपवास की वकालत की थी। इसलिए, वह एक दिन रुक-रुक कर फलों का जूस और तरल आहार लिया करते थे।
गांधी जी का तर्क था कि एक बार जब आपका शरीर हल्का और फिट महसूस करता है, तो आप सकारात्मक अंतर्दृष्टि पर ध्यान केंद्रित कर सकते हैं और ध्यान आसान हो जाता है। यह ऑटोफैगी की प्रक्रिया को सक्रिय करता है, जो कई तरह की बीमारियों को रोकने में मदद करता है।
गांधी जी अपनी पसंद से थे शाकाहारी!
गांधी जी ने कभी भी अपने आहार संबंधी विश्वासों को किसी पर नहीं थोपा और इस विषय पर बाकियों के विचारों को सुनकर वो खुश भी होते थे। गांधी जी, अपनी पसंद से शाकाहारी भोजन करते थे। गांधी जी एक शाकाहारी गुजराती परिवार से थे और उन्होंने अपने जीवन में मांस का सेवन बचपन में सिर्फ 5-6 बार किया होगा।
गांधी जी ने अपनी आत्मकथा में बताया है कि जब वह स्कूल में पढ़ा करते थे तो उनके भाई के एक दोस्त के जिद्द करने पर उन्होंने मांस का सेवन किया था, वो भी परिवार और रिश्तेदारों से छिपकर। गांधी जी ने बताया है कि उनके भाई के दोस्त ने कहा था कि 'अंग्रेज भारतीयों पर शासन करने में इसलिए सक्षम हैं..क्योंकि वो मांस खाने वाले लोग हैं।' गांधी जी ने इसके बाद ही एक साल के दौरान लगभग 6 बार चुपके से मांस खाए होंगे...लेकिन उन्होंने बताया कि उसके बाद उन्होंने जीवन में कभी मांस का सेवन नहीं किया।
1888 में कानून की पढ़ाई के लिए इंग्लैंड जाने से पहले गांधी जी ने अपनी मां की कसम खाई कि वह मांस या शराब को नहीं छूएंगे। उन्होंने अपनी बात रखी हालांकि शाकाहारी भोजन मिलना विदेश में मुश्किल था और वह इसकी वजह से वह कई बार भूखे रहते थे।
गांधी जी का दृढ़ विश्वास था कि नॉनवेज खान स्वास्थ्य के लिए अच्छा नहीं है, क्योंकि मांस अपने साथ "उन जानवरों के दोष लाता है, जिनसे वो मिलता है।'' लेकिन इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि उनके शाकाहारवाद में गहरे आध्यात्मिक और दार्शनिक आधार थे। यह उनकी राजनीति की आधारशिला अहिंसा के प्रति उनकी प्रतिबद्धता का हिस्सा था। गांधी जी का मानना था कि मांस खाने का मतलब जानवरों के प्रति हिंसा करना था, उनका मानना था कि उनमें जान और आत्माएं होती हैं।

कम नमक खाने के पक्षधर थे गांधी जी
गांधीजी कम नमक वाले आहार के पक्षधर थे। उन्होंने कई सालों तक दाल खाने से भी परहेज किया था। यह एक सिद्धांत था जिसका उन्होंने सालों तक पालन किया। गांधी जी ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि, उन्होंने कहीं पढ़ा था कि "कमजोर शरीर वाले" को दाल खाने से परहेज करना चाहिए।
अपनी आत्मकथा में उन्होंने दक्षिण अफ्रीका के उस समय का जिक्र किया है जब उनकी पत्नी कस्तूरबा की तबीयत ठीक नहीं थी। गांधीजी ने उनसे नमक और दालें त्यागने के लिए कहा था। भारत लौटने के काफी समय बाद तक गांधी जी ने दाल और नमक से दूरी बना ली थी।
उन्होंने लिखा था, 'चिकित्सकीय रूप से इस आहार के मूल्य के बारे में दो राय हो सकती हैं, लेकिन नैतिक रूप से मुझे इसमें कोई संदेह नहीं है कि सभी त्याग आत्मा के लिए अच्छे हैं। आत्मसंयमी व्यक्ति का आहार सुखी व्यक्ति से अलग होना चाहिए।'
कच्चा भोजन क्यों करते थे गांधी जी?
मई 1929 में गांधीजी ने केवल कच्चा भोजन खाने का एक गंभीर प्रयोग किया था। उन्होंने अपनी साप्ताहिक पत्रिका, यंग इंडिया में लिखा, "मैं सालों कच्चे फलों और मेवों पर जीवित रहा हूं, लेकिन पहले कभी भी इतने लंबे वक्त के लिए अनाज और दालों से परहेज नहीं किया है।''
कच्चा भोजन क्यों करते हैं...? इसके जवाब में गांधी जी ने कहा था, ' अगर मेरा प्रयोग सफल होता है तो यह पुरुषों और महिलाओं को अपने जीवन जीने के तरीके में क्रांतिकारी बदलाव करने में सक्षम होगा। यह महिलाओं को कठिन परिश्रम से मुक्त करता है...कच्चे भोजन का नैतिक मूल्य अतुलनीय है।''












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