Galwan Clash: शिवसेना का 'सामना' के जरिए पीएम मोदी पर हमला.......हमारे सत्ताधीश दुनिया जीतने चले हैं
नई दिल्ली- शिवसेना ने लद्दाख की गलवान घाटी में चीनी सेना के साथ हुए खूनी संघर्ष को लेकर केंद्र की मोदी सरकार और खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ तीखे तेवर अपना लिए हैं। महाराष्ट्र में नई सरकार बनने से पहले तक एनडीए का हिस्सा रही शिवसेना ने अपने मुखपत्र 'सामना' के जरिए पहले भी भाजपा और मोदी सरकार पर हमला किया है, लेकिन अबकी बार उसके तेवर ज्यादा तल्ख हैं। खास बात ये है कि दो दिन पहले उसने महाराष्ट्र में अपने सत्ताधारी गठबंधन महा विकास अघाड़ी की एक अहम घटक कांग्रेस के खिलाफ भी तीखे तेवर दिखाए थे, लेकिन अब उसने लद्दाख की घटनाओं के लिए सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व पर सवाल उठा दिए हैं।

पीएम मोदी का जनता के सामने न आना चौंकाने वाला है-सामना
मराठी अखबार 'सामना' के जरिए शिवसेना ने पीएम मोदी और उनकी सरकार से सवाल किया है कि लद्दाख में जो कुछ भी हुआ और जिस तरह से देश के 20 जवान शहीद हुए, उसके बारे में पूरी बातें खुद प्रधानमंत्री ने जनता के सामने आकर नहीं बताया है यह बहुत ही चौंकाने वाला है। मराठी में लिखे उस लेख का हिंदी में तर्जुमा करने के बाद उसके कुछ अंश इस प्रकार हैं- 'भारत और चीन के सैनिकों में सोमवार को लड़ाई हुई। ये लड़ाई रक्तरंजित है। इसमें हिंदुस्तान के 20 जवानों की शहीद होने की खबर दुखदायी है।..........सीमा पर खून बह रहा है। हिंदुस्तान-चीन सीमा पर ये संघर्ष और इस तरह का हमला 50 वर्षों बाद शुरू हुआ है और 20 जवानों की शहादत के बावजूद वस्तुस्थिति बताने के लिए देश के प्रधानमंत्री का जनता के बीच न आना धक्कादायक है। ' संपादकीय में आगे कहा गया है कि गलवान वैली में हुई झड़प में हमारे 20 जवान शहीद हो गए, आधिकारिक रूप से ऐसा कहने में बुधवार की सुबह हो गई।
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जनता को क्यों नहीं बताया जा रहा है- शिवसेना
'सामना' में गलवान वैली की घटना पर पीएम मोदी की प्रतिक्रिया को तो सही कहा गया है, लेकिन वहां क्या चल रहा है ये नहीं बताने पर सवाल उठाया गया है। संपादकीय में लिखा गया है....'जवानों की शहादत व्यर्थ नहीं जाएगी। हमें छेड़ा तो जैसे को तैसा उत्तर देने में हम सक्षम हैं......', ऐसी चेतावनी दी, ये सही हुआ। फिर भी गलवान घाटी में क्या हुआ? चीन की सीमा पर क्या हो रहा है? यह अभी तक जनता को नहीं बताया गया है।' भाजपा की पूर्व सहयोगी के मुखपत्र में केंद्र सरकार को इतने भर से ही नहीं छोड़ा गया है। इसमें लिखा है, 'सूत्र कहते हैं कि चीन के कमांडिंग ऑफिसर और उसके 30-40 सैनिक मारे गए। तो चीन के सैनिक मारे गए, इस पर खुश होकर हम सिर्फ ताली बजाकर बैठ जाएं क्या? चीन का नुकसान हुआ, यह स्वीकार है। लेकिन हिंदुस्तान की सीमा में चीनी सेना घुस आई है, ये सच हुआ तो चीन ने हिंदुत्व की संप्रभुता पर आघात किया है। इसके पहले चीन की सेना 1975 में अरुणाचल प्रदेश में घुस आई थी और गोलीबारी की थी। उसमें भारत के 4 जवान शहीद हो गए थे। तब से लेकर अब तक की ये सबसे बड़ी झड़प सीमा पर हुई है। किसी भी प्रकार के हथियार बंदूक,अस्त्र, टैंक का इस्तेमाल न करते हुए दोनों तरफ इतनी बड़ी सैन्य हानि होनी है तो रक्षा उत्पाद और परमाणु बम क्यों बनाएं? हम पाषाण युग के पत्थरों से होने वाली लड़ाई में एक-दूसरे की जान ले रहे हैं। लद्दाख की सीमा पर यही देखने में आया....।

हमारे सत्ताधीश दुनिया जीतने चले हैं....... सामना
'सामना' लिखता है कि नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने से देश ज्यादा मजबूत, गंभीर और लड़ाकू तेवर वाला बन गया है,ये दावा तो पिछले 6 वर्षों से लगातार किया जा रहा है। लेकिन क्या वजह है कि इस दौरान पाकिस्तान, नेपाल और अब चीन ने हिंदुस्तान पर सीधे-सीधे हमला किया है? इसमें सीधे पीएम मोदी पर ये कहकर तंज किया गया है, 'हिंदुस्तान की सीमा से सटे किसी भी देश से हमारे अच्छे संबंध नहीं हैं और हमारे सत्ताधीश दुनिया जीतने निकले हैं, इस पर आश्चर्य होता है। नेपाल ने हिंदुस्तान का नक्शा कुतरा है। पाकिस्तान की मस्ती सर्जिकल स्ट्राइक के बाद भी चल ही रही है। चीन तो एक फंसाने वाला और मायावी देश है ही, लेकिन नेपाल भी भारत की ओर टेढ़ी नजर से देखकर चुनौती दे रहा होगा तो विश्वनेता और महासत्ता आदि बनने की ओर अग्रसर हमारे देश की अवस्था ठीक नहीं है, यह मानना होगा। ट्रंप और चीन की लड़ाई कोरोना के फैलने की वजह से हुई। लेकिन, अमेरिका चीन के मिसाइलों की जद में नहीं है। हमारा देश उसकी जद में है और चीन हमारा पड़ोसी देश है, इस बात को नहीं भुलाया जा सकता। इसीलिए पंडित नेहरू, इंदिरा गांधी और वाजपेयी ने हमेशा धधकती सीमा को शांत रखने की कोशिश की। देश को सीमा पर संघर्ष की बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है। चीन से जो संघर्ष आज शुरू है, उसका कारण पंडित नेहरू की असफल विदेश नीति है, ऐसा बोलकर सार्वजनिक सभाओं में तो तालियां मिल जाएंगी, लेकिन आज जवानों का जो बलिदान शुरू है, उसे रोकने की जिम्मेदारी मोदी सरकार की है।

प्रतिकार मोदी को ही करना होगा- सामना
इस संपादकीय में प्रधानमंत्री मोदी पर सबसे बड़ा हमला उनके कुछ पुराने बयानों की ओर इशारा करके इस तरह से किया गया है- "गड़बड़ सीमा पर नहीं, बल्कि दिल्ली में है। दिल्ली की सरकार नामर्द है, इसीलिए सीमा पर दुश्मन आंख दिखा रहा है।" 6 साल पहले जोर लगाकर ऐसा बोलने वाले नरेंद्र मोदी आज दिल्ली के सर्वसत्ताधीश हैं। इसलिए आज जो हुआ है, उसका प्रतिकार मोदी को ही करना होगा। चीन के राष्ट्रपति अहमदाबाद आकर प्रधानमंत्री मोदी के साथ झूले पर बैठकर ढोकला खाते बैठे। उसी समय हमने इसी स्तंभ से यह चेतावनी दी थी, "लाल चीनी बंदरों पर विश्वास मत करो! जैसे पंडित नेहरू का विश्वासघात किया गया, वैसे ही तुम्हारे साथ भी होगा।" दुर्भाग्य से ऐसा हो चुका है। पाकिस्तान को धमकी देना, चेतावनी देना, सर्जिकल स्ट्राइक करके राजनीतिक माहौल बनाना आसान है, क्योंकि पाकिस्तान देश नहीं, बल्कि एक टोली मात्र है। लेकिन, चीन के मामले में ऐसा नहीं है। अमेरिका जैसी मदमस्त महासत्ता को कुछ नहीं समझने वाला चीन एक वैश्विक शक्ति है। चीन साम्राज्यवादी और घुसपैठिया है। उसने हिंदुस्तान पर पहले ही अतिक्रमण किया हुआ है।' सामना में एक तरफ तो चीन की ताकत बताई गई वहीं दूसरी तरफ ये भी कहा गया है कि 20 जवानों के बलिदान को अगर व्यर्थ जाने दिया गया तो इससे मोदी की 'प्रतिमा' को धक्का लगेगा।
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