केजरीवाल अगर लाठी लेकर भागते योगेन्द्र यादव के पीछे
नई दिल्ली(विवेक शुक्ला)अरविन्द केजरीवाल ने जिस तरह की सड़क छाप भाषा का इस्तेमाल किया प्रशांत भूषण और योगेन्द्र यादव के लिए उससे साफ है कि वे सच में आम आदमी पार्टी से जुड़े हैं। उनकी भाषा भी आम आदमी की भाषा है।
उन्होंने उसी भाषा का इस्तेमाल अपने साथियों के लिए किया है जो उनके मन की भाषा है। वो तो अच्छा हुआ कि उन्होंने हरियाणवी शैली में अलाप नहीं भरा ! वरना पीछे लात की जगह लाठी और बांस भी हो सकता था? तब बेचारे योगेन्द्र यादव क्या करते?
हाँ ये भाषा उन लोगों के लिए एक बड़ा आघात हो सकती है जिन्होंने अरविन्द को नैतिकता के सभी मापदंडों से ऊपर रखा था? लेकिन अरविन्द के साथ खड़े उन लोगों के लिए नहीं जो कुतर्क के साथ अपना पक्ष मीडिया में रख रहे हैं ।उनके लिए ये आम भाषा है जो बे अपने घरों में बोलते हैं!
महान पत्रकार रहे आशुतोष तो यहाँ तक कह रहे हैं कि उनके पिताजी भी इसी तरह की भाषा का इस्तेमाल करते थे और वे खुद संपादक के तौर अपने सहकर्मियों से ऐसी ही भाषा बोलते थे। अतः दुःख मत कीजिये! बल्कि वो द्रश्य देखने के लिए तैयार रहिये जब मंत्रिमंडल की बैठक में यही भाषा आधिकारिक रूप से इस्तेमाल होती नजर आये।
दढ़ियल और झोलाछाप
दिल्ली के लोगो तैयार हो जाओ। जो बो दिया है उसे काटना तो पड़ेगा? अपने को क्रांतिकारी बताने वाले हिंदी के दढ़ियल और झोलाछाप बुद्धिभोजी कितने कमअक्ल हैं कि दो महीने पहले तो वे अरविन्द केजरीवाल का झोला उठाये टीवी पर मुंह से फेन निकालते हुए डिबेट करते नज़र आते थे मगर अब ढार-ढार आँसू रो रहे हैं। अरे अरविन्द केजरीवाल ने भला गलत क्या किया! उन्होंने वही किया जो एक सफल और चतुर राजनीतिक को करना चाहिए।
क्रांतिकारी पार्टी का चेहरा
आम आदमी पार्टी यानी क्रांतिकारी पार्टी का चेहरा सबके सामने है। राजनीति में आदर्श स्थापित करने वालों का व्यवहार मानक! तो अरविन्द की नजर में जो कमीने थे वे बाहर निकाल दिए गए। पता नहीं लात मारकर या हाथ मारकर या धक्का देकर। हालांकि यह कार्य स्वयं अरविन्द को करना चाहिए था- लात मारने का। राजनीति में नेतृत्व का एक मानक स्थापित होता। शर्म भी ऐसी हरकतों से शरमा जाए। निंदनीय, घृणित, घिनौनी....जैसे शब्द भी छोटे।
कुछ नहीं बिगड़ेगा इनका
राजनीतिक विश्लेषक अवधेश कुमार कहते हैं कि 67 विधायकों की इतनी बड़ी ताकत अरविन्द एवं मनीष के साथ है कि विरोधी इस समय कुछ बिगाड़ नहीं सकते। विधायक अपनी सदस्यता नहीं गंवाना चाहेंगे। इन निष्काषितों के साथ किसी का आंतरिक समर्थक होगा भी तो उसका तत्काल कोई लाभ नहीं।
इसलिए मुझे अरविन्द की दिल्ली सरकार पर तत्काल कोई खतरा नहीं दिखता। लेकिन आपसी व्यवहार का जितना कचरा, कूड़ा, करकट बाहर निकल रहा है उसका दुर्गंध और पार्टी के स्वास्थ्य पर उसका प्रभाव रहेगा।













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