Farmers Protest: 85 साल पहले किसानों केे हित में उठी थी बड़ी मांग, बदल जाती ' अन्नदाता' की किस्मत!
भारत की अबादी का सबसे बड़ा हिस्सा गांवों में है, गाव की लाइफ कृषि, पशुपालन और असंगठित श्रम पर आधारित है। ऐसे में आजादी के बाद से लगातार गांव और ग्रामीणों के विकास की चर्चा की होती है। लेकिन दशकों बाद किसानों को एक ऐसा नेता मिला, जिसने गांव, किसान और गरीब परिवारों किस्मत ही बदलने की ठान ली थी, हालांकि वो अलग बात है वो अपने उद्देश्य में पूरा नहीं हो पाया, लेकिन किसानों की दिलों में जो जगह बनाई उसे मिटा पाना मुश्किल है।
किसान एक बार अपनी मांगों के समर्थन में सड़कों पर उतर आए हैं। पंजाब में स्थिति नियंत्रित करने में पुलिस के पसीने छूट रहे हैं। किसान 'दिल्ली चलो' मार्च के तहत राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में प्रवेश करने पर अड़े हैं। इस बीच जिक्र भारत के पूर्व प्रधानमंत्री व किसानों के मसीहा माने जाने वाले नेता चौधरी चरण सिंह का जिक्र हो रहा है, जिन्होंने 60 प्रतिशत सरकारी नौकरी और सरकारी शिक्षण संस्थानों की सीटों को किसान परिवारों के लिए आरक्षित करने की मांग थी।

85 साल पहले बड़ा प्रस्ताव
पूर्व पीएम चौधरी चरण की छवि देश में बड़े किसान नेता के तौर पर है। वे किसानों के मसीहा कहे जाते हैं। चौधरी चरण सिंह ने भारत के आजाद होने से पहले ही किसानों को उत्थान के लिए प्रयास शुरू कर दिए। उन्होंने मार्च 1947 में 'Why 60% of Services Should Be Reserved for Sons of Cultivators' शीर्षक से एक दस्तावेज़ तैयार किया था। इसके पीछे चरण सिंह का उद्देश्य किसान परिवारों को सरकारी नौकरी और सरकारी शिक्षण संस्थानों की सीटों में 60 प्रतिशत किसान परिवारों के लिए आरक्षण सुरक्षित कराना था। दरअसल, चौधरी चरण सिंह किसान परिवारों का देश में प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना चाहते थे।
रिपोर्ट में बड़ी बात
इंडियन एक्सप्रेस पर प्रकाशित अपनी एक रिपोर्ट के मुताबिक, चरण सिंह ने किसानों के लिए कोटा की मांग सबसे पहले अप्रैल 1939 में उत्तर प्रदेश कांग्रेस विधायक दल की कार्यकारी समिति के समक्ष की थी। उस वक्त उन्होंने किसान परिवारों के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण का प्रस्ताव रखा था। हालांकि उनके इस प्रस्ताव का विरोध हुआ लेकिन उन्होंने विरोध के पीछे वजहों को ध्यान में रखते हुए इस आरक्षण के प्रस्ताव का दायरा बढ़ाने पर भी सहमति दी थी।
न्यूज प्लेटफॉर्म इंडियन एक्सप्रेस में राष्ट्रीय संपादक हरीश दामोदरन ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि चौधरी चरण सिंह के इस प्रस्ताव का विरोध का कारण कोटा की मांग नहीं बल्कि सिर्फ किसानों के बच्चों के लिए कोटा की मांग थी। दरअसल, सिंह ने अपने प्रस्ताव में भूमिहीन मजदूरों को शामिल नहीं किया था। जबकि 1951 में हुई जनगणना के मुताबिक कृषि कार्यबल का 28.1 प्रतिशत था। विरोध की बात सामने आने पर चौधरी चरण सिंह ने कहा था कि किसानों के साथ कृषि मजदूरों को शामिल करने में कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन ऐसी स्थिति में किसानों के लिए आरक्षण 60 प्रतिशत 75 प्रतिशत रखना होगा।
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