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अब नरेंद्र मोदी की ‘फील्ड स्ट्राइक’ ! बदल गया पंजाब, यूपी का इलेक्शन नैरेटिव

नई दिल्ली, 19 नवंबर। पांच राज्यों के चुनाव के पहले तीन कृषि कानूनों को वापस लेना, मोदी सरकार की 'फील्ड स्ट्राइक' है। बालाकोट एयर स्ट्राइक से नरेन्द्र मोदी ने लोकसभा चुनाव का नैरेटिव बदल दिया था। उसी तरह इस फील्ड स्ट्राइक से उन्होंने पंजाब, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड (गोवा और मणिपुर भी) के चुनावी परिदृश्य को बदलने का दांव खेल दिया है।

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पंजाब और उत्तर प्रदेश में किसानों की नाराजगी भाजपा के लिए चिंता का कारण बनी हुई थी। लेकिन अब नरेन्द्र मोदी के एक अहम फैसले से खेल बिल्कुल पलट गया है। गुरुनानक जयंती के मौके पर कृषि कानूनों को वापस लेने की घोषणा, पंजाब और उत्तर प्रदेश के लिए गेमचेंजर साबित हो सकती है। पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने अब एलान कर दिया है कि वे भाजपा के साथ मिल कर चुनाव लड़ेंगे। सरकार के इस फैसले से उत्तर प्रदेश, खास कर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भाजपा अपनी पुरानी जमीन वापस पा सकती है।

पंजाब में भाजपा को फायदा

पंजाब में भाजपा को फायदा

तीन कृषि कानूनों के कारण पंजाब में भाजपा का शिरोमणि अकाली दल से गठबंधन टूट गया था। इसकी वजह से भाजपा को किसान विरोधी बताया जा रहा था। पंजाब में भाजपा अकेली पड़ गयी थी। कांग्रेस से अलग होने के बाद कैप्टन अमरिंदर सिंह ने भाजपा के साथ गठबंधन के संकेत दिये थे। लेकिन तीन कृषि कानूनों को वापस लेने की शर्त रख दी थी। भाजपा पंजाब में अपनी खोयी हुई जमीन वापस पाना चाहती थी। पिछले तीन विधानसभा चुनाव में अगर भाजपा की राजनीतिक स्थिति को देखें तो इसमें उत्तरोत्तर गिरावट ही दिखायी पड़ रही है। गठबंधन में शिरोमणि अकाली दल को तो फायदा होता रहा लेकिन भाजपा हमेशा नुकसान में ही रही। सीट शेयरिंग में भाजपा को पिछले तीन चुनावों से 70 में 23 सीट ही मिलती रही। 2007 में भाजपा ने 23 में 19 सीटें जीत कर अपने बेहतर स्ट्राइक रेट का प्रदर्शन किया था। 2012 में भाजपा की सीटें घट कर 12 हो गयीं। 2017 में प्रदर्शन और खराब हुआ विधायकों की संख्या सिमट कर 3 पर पहुंच गयीं। यानी 15 साल में भाजपा 19 से 3 पर पहुंच गयी। अब भाजपा पंजाब में नये अमरिंदर सिंह के साथ नये युग में प्रवेश करेगी। अमरिंदर सिंह के रूप में भाजपा को एक मजबूत सहयोगी मिलेगा जिससे पंजाब में वह अपनी पारी को नये सिरे से जमा सकती है। पंजाब में 'किसान' सबसे बड़ा मुद्दा है और भाजपा ने इस मुद्दे पर 'रिवर्स स्वीप' खेल दिया है।

उत्तर प्रदेश पर फैसले का असर

उत्तर प्रदेश पर फैसले का असर

तीन तृषि कानूनों को वापस लेने के फैसले का सबसे अधिक असर उत्तर प्रदेश में पड़ने वाला है। जिस किसान आंदोलन की वजह से योगी आदित्यनाथ की नैया डगमगाती नजर आ रही थी, अब उसको किनारा मिल जाने की उम्मीद है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश जाट बहुल इलाका है। इस इलाके के 15 जिलों में कुल 71 विधानसभा सीटों आती हैं। यहां जाट किसान निर्णायक स्थिति में हैं। 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने इन 71 में से 51 सीटों पर जीत हासिल की थी। यानी किसानों ने भाजपा के पक्ष में एक तरफा वोटिंग की थी। लेकिन सितम्बर 2020 में जब मोदी सरकार ने तीन कृषि कानूनों को लागू किया तो यहां के किसानों ने इसका विरोध शुरू कर दिया। राकेश टिकैत के नेतृत्व में बड़ा किसान आंदोलन शुरू हो गया। भाजपा को वोट देने वाले किसान सरकार के फैसले के खिलाफ सड़क पर उतर गये। भाजपा के सामने एक बड़े वोट बैंक को खोने का खतरा बना हुआ था। चूंकि किसान तीन कृषि कानूनों का ही विरोध कर रहे थे। इसलिए जब ये कानून ही नहीं रहेंगे तो फिर उनकी नाराजगी भी नहीं रहेगी। लखीमपुर खीरी, पीलीभीत इलाके में सिख समुदाय की एक बड़ी आबादी खेती-किसानी से जुड़ी हुई है। गुरुनानक देव जयंती के मौके पर कृषि कानूनों के वापस लेकर इनके जख्म पर भी मरहम लगाने की कोशिश की गयी है।

छवि बदलने की कोशिश

छवि बदलने की कोशिश

जब तीन कृषि कानूनों के खिलाफ किसान आंदोलन शुरू हुआ था तब अमित शाह ने कहा था कि ये कानून संसद से पास हैं और इन्हें कभी वापस नहीं लिया जाएगा। इसके बाद नरेन्द्र मोदी को अभिमानी और तानाशाह कहा जाने लगा था। उन्हें किसान विरोधी भी बताया जा रहा था। लेकिन अब कृषि कानूनों को वापस लेकर नरेन्द्र मोदी ने खुद को लचीला और संवेदनशील राजनीतिज्ञ के के रूप में पेश किया है। इस फैसले को किसानों की जीत और सरकार की हार बताया जा रहा है। लेकिन अपनी छवि बदलने के लिए नरेन्द्र मोदी ने यह जोखिम भी उठाया है। आम तौर पर यह माना जाता है वे कोई फैसला लेकर पीछे हटने वाले नेता नहीं हैं। लेकिन उन्होंने ये संदेश दिया है कि वे जनहित में अपने फैसले पर पुनर्विचार भी कर सकते हैं। यह नरेन्द्र मोदी का नया चेहरा है। जाहिर है यह सब कुछ उन्होंने अपनी स्वीकार्यता को बढ़ाने के लिए किया है। उनके यू टर्न से उत्तर प्रदेश और पंजाब में कांग्रेस का गेम प्लान ध्वस्त हो गया है। कांग्रेस ने विधानसभा चुनाव में किसान आंदोलन को अपने हक में भुनाने का मंसूबा बनाया था। लेकन अब इस मंसूबे पर पानी फिरता दिख रहा है।

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