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विवेचनाः जब फ़ारुख़ इंजीनियर ने वेस हॉल की गेंदों को रुई की तरह धुना !

By Bbc Hindi

बात उन दिनों की है जब फ़ारुख इंजीनियर ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ़ विश्व एकादश की तरफ़ से खेल रहे थे.

गालों पर डिंपल, बला के बातूनी और मुंह फट, गोरे चिट्टे फ़ारुख़ इंजीनियर की गिनती अपने ज़माने के सबसे 'डैशिंग' बल्लेबाज़ों और विकेटकीपरों में होती थी.

एक बार जब इंजीनियर ने डेनिस लिली के बाउंसर को 'हुक' किया तो लिली उनके पास दौड़ते हुए आए और उन्हें 'ब्लैक बा.....ड' कह कर 'स्लेज' किया.

इंजीनियर ने स्लिप में खड़े हुए ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ियों से मुस्कुराते हुए पूछा, 'इज़ ही क्लर ब्लाइंड?' या दूसरे शब्दों में क्या लिली को दृष्टि दोष है?

शशि कपूर के चेहरे को घायल होने से बचाया

इंजीनियर मुंबई में पैदा हुए थे और वहीं के डॉन बास्को स्कूल में पढ़ा करते थे, जहां मशहूर अभिनेता शशि कपूर उनके सहपाठी थे.

एक बार वो उनके बग़ल में बैठ कर उनसे बातें कर रहे थे. तभी उनके अध्यापक ने लकड़ी का एक 'डस्टर' खींच कर शशि कपूर के मुंह की तरफ़ मारा.

इंजीनियर बताते हैं, ''उस ज़माने के अध्यापक आज की तरह नहीं थे. गलती करने पर बच्चों को सज़ा देना आम बात थी. शशि मेरा बहुत अच्छा दोस्त था. वो मुझसे बातें कर रहा था कि टीचर ने खींच कर डस्टर शशि के मुंह की तरफ़ फेंका. वो उसकी आंख में लगने वाला ही था कि मैंने उसे उसके चेहरे से एक इंच पहले कैच कर लिया.''

''शशि का चेहरा बहुत सुंदर था. बाद में उन्होंने हिंदी फ़िल्मों में कई महत्वपूर्ण रोल किए. मैं उससे मज़ाक करता था कि अगर उस दिन मैंने वो 'डस्टर' कैच नहीं किया होता, तो तुम्हें सिर्फ़ डाकू के रोल ही मिलते.''

टेस्ट मैच में एक दिन के 50 रुपए मिलते थे भारतीय टीम को

1961 में कानपुर में इंग्लैड के ख़िलाफ़ अपने करियर की शरुआत करने वाले फ़ारुख़ के खेल की ख़ास बात थी उनकी दिलेरी और बड़े से बड़े तेज़ गेंदबाज़ को मारने की उनकी क्षमता.

इंजीनियर याद करते हैं, ''हमारे ज़माने में वेस हॉल सबसे तेज़ गेंदबाज़ हुआ करते थे और 100 मील प्रति घंटे की रफ़्तार से गेंद फेंकते थे. उस समय 'बाउंसर' और 'बीमर' फेंकने पर कोई रोक या 'लिमिट' नहीं थी. आज कल तो एक ओवर में सिर्फ़ एक 'बाउंसर' फेंकने की ही अनुमति है.''

''बैट भी बहुत साधारण हुआ करते थे. छक्का मारने के लिए बहुत ज़ोर लगाना पड़ता था. आज कल तो इसने अच्छे बैट बन गए हैं कि बल्ले का बाहरी किनारा लगने पर भी गेंद छक्के के लिए बाउंड्री के पार हो जाती है. हम और दुर्रानी छक्कों के स्पेशलिस्ट थे जो दर्शकों की मांग पर छक्के लगाया करते थे.''

''उस समय हमें टेस्ट खेलने के लिए बहुत कम पैसे मिलते थे, एक दिन का सिर्फ़ पचास रुपया. मुझे याद है मैं गावस्कर के साथ टेस्ट के चौथे दिन 'क्रीज़' पर था. खेल ख़त्म होने में आधा घंटा बाकी थी और हमें जीतने के लिए सिर्फ़ 20 रन बनाने थे. तभी 'ड्रेसिंग रूम' से संदेश आया कि धीमे खेलो. अगर खेल आज ही ख़त्म हो गया तो कल के हमारे पचास रुपए मारे जाएंगे. नतीजा ये हुआ कि हमने हर गेंद को 'ब्लॉक' किया ताकि हमें अगले दिन के 50 रुपए मिल सके.''

जब इंजीनियर ने वेस हॉल और चार्ली ग्रिफ़िथ को धुना

विश्व पटल पर फ़ारुख़ का नाम सबसे पहले 1966 में आया जब उन्होंने वेस्ट इंडीज़ के ख़िलाफ़ सलामी बल्लेबाज़ के तौर पर खेलते हुए लंच से पहले 94 नाबाद रन बनाए.

दूसरे छोर पर खेल रहे दिलीप सरदेसाई की सुस्ती की वजह से वो लंच से पहले शतक नहीं मार पाए, वर्ना वो विक्टर ट्रंपर, डॉन ब्रेडमैन और माजिद ख़ाँ सरीखे खिलाड़ियों की सूची में शामिल हो जाते, जिन्होंने ये कारनामा कर दिखाया था.

इंजीनियर बताते हैं, ''1966 में वेस्ट इंडीज़ के ख़िलाफ़ मद्रास टेस्ट में उनके 'फ़ास्ट बॉलर्स' की वजह से कोई भी भारतीय बल्लेबाज़ 'ओपनिंग' करने के लिए तैयार नहीं था. पटौदी ने मुझसे पूछा, 'क्या तुम ओपनिंग करोगे?' मैंने कहा 'बिल्कुल.''

''आते ही मैंने दोनों तेज़ गेंदबाज़ों वेस हॉल और चार्ली ग्रिफ़िथ को धुनना शुरू कर दिया. दिलचस्प बात ये थी कि जब मैं हॉल की गेंद पर चौका मारता तो ग्रिफ़िथ को हंसी फूट पड़ती, और जब मैं ग्रिफ़िथ को हुक करता तो हॉल की हंसी नहीं रुकती. वेस्ट इंडियन सोच रहे थे कि कहाँ से आया है ये खिलाड़ी. सारे भारतीय बल्लेबाज़ हमारी गेंद पर अब तक 'डक' रहे थे. ये आ कर हमें 'हुक' कर रहा है.''

''थोड़ी देर बाद सोबर्स नाराज़ हो गया. वो खुद गेंदबाज़ी करने आया. मैंने उसके ओवर में भी 20 रन बनाए. लंच होने से दो ओवर पहले मैं 92 रन बना चुका था. मैंने ग्रिफ़िथ को 'हुक' किया. रोहन कन्हाई ने 'डीप स्कवायर लेग' पर 'डाइव' मार कर चौका रोका. वहां आसानी से दो रन हो सकते थे, लेकिन सरदेसाई ने सिर्फ़ एक रन ही लिया. उसी तरह दोबारा जब दो रन लेने का मौका मिला तो सरदेसाई ने सिर्फ़ एक ही रन लिया. इस तरह मैं लंच पर 94 पर नाबाद लौटा.''

जब इंजीनियर ने ज़हीर अब्बास की मूंछ खींची

लंच के बाद पहली गेंद पर छक्का मार कर फ़ारुख़ इंजीनियर ने अपना शतक पूरा किया. 1971 में उन्हें ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ़ विश्व एकादश में सुनील गावस्कर और बिशन बेदी के साथ चुना गया.

उस टीम में दो पाकिस्तानी खिलाड़ी भी थे - इंतख़ाबे आलम और ज़हीर अब्बास. इंजीनियर बताते हैं, ''उस ज़माने में भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध हो रहा था और ज़हीर अब्बास मेरा 'रूम मेट' था. हम दोनों रोज़ एक दूसरे के परिवार की ख़ैरियत के बारे में पूछते थे.''

''उन दिनों ज़हीर की बड़ी मूछें हुआ करती थी. एक दिन 'प्रैक्टिस' के दौरान मैं मज़ाक में ज़हीर की मूछें खींच रहा था. तभी एक ऑस्ट्रेलियाई फ़ोटोग्राफ़र ने दूर से हमारी तस्वीर खींच ली. अगले दिन ऑस्ट्रेलिया के एक बड़े अख़बार में आधे पेज पर हमारी वो तस्वीर छपी जिसके नीचे 'कैप्शन' था इन दोनों को देख कर क्या आपको लगता है कि इन दोनों देशों के बीच लड़ाई चल रही है ?''

इंजीनियर सुबह चार बजे अपने होटल के कमरे में लौटे

भारतीय क्रिकेट में फ़ारुख़ से ज़िंदादिल और मज़ाकिया खिलाड़ी कम ही हुए हैं. अपने साथियों के साथ प्रैक्टिकल जोक्स खेलना उनकी आदत में शुमार था.

उनके बाद भारतीय टीम के विकेटकीपर बने सैयद किरमानी याद करते हैं, ''1971 के इंग्लैंड दौरे में मुझे फ़ारुख़ का 'रूम मेट' बनाया गया. हमारे मैनेजर कर्नल हेमू अधिकारी बहुत सख़्त थे. उन्होंने आदेश दिया कि रात दस बजे तक सभी खिलाड़ी सोने चले जाएंगे.''

''उन दिनों इंग्लैंड में सूरज रात के 10 बजे डूबता था और इंजीनियर तो इंग्लैंड में ही रह रहे थे. उन्होंने मुझे निर्देश दिया कि जब अधिकारी रात में हमारे कमरे पर आएं तो तुम बत्ती मत जलाना और थोड़ा सा ही दरवाज़ा खोलना.''

''फिर उन्होंने अपने बिस्तर पर कंबल के नीचे तकियों को इस तरह लगाया जैसे कोई उसके नीचे सो रहा हो और बाहर घूमने चले गए. साढ़े दस बजे हेमू अधिकारी ने हमारे कमरे का दरवाज़ा खटखटाया. उन्होंने अंदर झांक कर देखा और ये देख कर खुश हो गए कि इंजीनियर के बिस्तर पर कोई सो रहा है. उन्होंने कहा इंजीनियर को सोने दो. उस दिन इंजीनियर सुबह चार बजे होटल के कमरे में लौटे.''

हर मिनट में एक चुटकुला

विकेट के पीछे खड़े हो कर 'स्लिप' के 'फ़ील्डरों' और बल्लेबाज़ों के साथ लगातार बात करना फ़ारुख़ इंजीनियर की ख़ास अदा हुआ करती थी.

सुनील गावस्कर बताते हैं, ''फ़ारुख़ भारतीय क्रिकेट के असली 'प्ले ब्वॉय' थे. उनकी वजह से ही मैं 'स्लिप फ़ील्डर' बना. कप्तान अजीत वाडेकर स्लिप के ग़ज़ब के 'फ़ील्डर' हुआ करते थे. लेकिन कुछ 'ओवरों' बाद वो या तो 'कवर' में खड़े हो जाते थे या 'शॉर्ट मिड विकेट' पर.''

''बाद में उन्होंने मुझे बताया कि बग़ल में खड़े फ़ारुख़ इंजीनियर के मुंह से हर मिनट निकलने वाले चुटकलों की वजह से उनका ध्यान 'बॉलिंग चेंज' और 'फ़ील्ड प्लेसमेंट' से हट जाया करता था. इसलिए वो 'स्लिप से' हट जाते थे और मुझे उनकी जगह 'फ़ील्डिंग' करनी पड़ती थी.''

''फ़ारुख़ और मैं एक दूसरे को 'डीकरा' कह कर बुलाते थे जिसका अर्थ होता है बेटा, हांलाकि वो मुझसे उम्र में कई साल बड़े हैं.''

विकेट कीपिंग के दौरान फ़ारुख इंजीनियर साथ में स्लिप में खड़े सुनील गावस्कर
Getty Images
विकेट कीपिंग के दौरान फ़ारुख इंजीनियर साथ में स्लिप में खड़े सुनील गावस्कर

महारानी ने बेटी पैदा होने का समाचार दिया

1967 में लार्ड्स टेस्ट के दौरान जब इंग्लैंड की महारानी उनसे हाथ मिला रही थीं, तभी उन्होंने मुंबई में उनकी बेटी पैदा होने का शुभ समाचार उन्हें सुनाया था.

इंजीनियर याद करते हैं, ''मेरी माँ बहुत बीमार थी. बहुत ही कम उम्र में उनका देहांत हो गया. जब मैं उनके पलंग की बगल में बैठ कर रो रहा था, तो उन्होंने मेरा हाथ पकड़ कर कहा था कि 'तुम घबराओ नहीं, मैं तुम्हारी बेटी के रूप में फिर से तुम्हारे घर में आउंगी.''

''मेरी पत्नी जब गर्भवती हुई तो मुझे पूरा विश्वास था कि उसे लड़की पैदा होगी. उस दिन 'लार्ड्स' के 'लॉंन्ग रूम' में हम लोग महारानी से हाथ मिलाने के लिए उनका इंतज़ार कर रहे थे. जब वो मेरे पास आईं तो उन्होंने मुझसे पूछा कि मेरे पास तुम्हारे लिए एक अच्छी ख़बर है. मैं समझ गया कि उनका आशय क्या है.''

''मैंने पूछा लड़का है या लड़की ? उन्होंने पूछा तुम क्या चाहते हो ? मैंने कहा 'लड़की', क्यों कि मुझे मरते समय अपनी माँ की कही बात याद थी. रानी ने मुझे बताया कि तुम्हारी लड़की ही पैदा हुई है. अपनी माँ के नाम पर मैंने उसका नाम भी 'मिनी' रखा.''

जब इंजीनियर ने आबिद अली को समझाया

1971 में ओवल के मैदान पर जब भारत ने इंग्लैंड को इंग्लैंड की ज़मीन पर पहली बार हराया था तो आबिद अली और फ़ारुख़ इंजीनियर क्रीज़ पर थे.

इंजीनियर बताते हैं, ''विश्वनाथ का विकेट गिरने के बाद आबिद अली क्रीज़ पर आए. मैंने उनसे कहा कि तुम कोई बेवकूफ़ी मत करना, क्योंकि तुम्हारे बाद बेदी और चंद्रशेखर को आना है, जिन्हें ढ़ंग से बल्ला पकड़ना भी नहीं आता.''

''मेरे समझाने के बावजूद आबिद ने इलिंगवर्थ की गेंद पर क्रीज़ से बाहर निकल कर एक अंधाधुंध 'शॉट' लगाया. ग़नीमत रही कि एलन नॉट ने एक आसान 'स्टंपिंग' 'मिस' कर दी, वर्ना भारत का सातवाँ विकेट गिर जाता.''

''मैं फिर आबिद के पास गया और उन्हें समझाने की कोशिश की. उन्होंने अगली ही गेंद पर फिर एक 'वाइल्ड स्विंग' लगाया और गेंद 'स्लिप फ़ीलडर्स' के ऊपर से होती हुई 'बाउंड्री' पार कर गई. इस तरह हमारी जीत तो हुई, लेकिन मैं और आबिद अली आज भी उस शॉट को याद कर हंसते हैं.''

टाटा ने इंजीनियर के पैड खोले

1973 में जब मुंबई के 'ब्रेबर्न स्टेडियम' में फ़ारुख़ इंजीनियर ने शतक जमाया था तो 'पवेलियन' में मौजूद मशहूर उद्योगपति जे आर डी टाटा ने उन्हें गले लगा लिया था.

इंजीनियर बताते हैं, ''मैं 'सेंचुरी' के बाद 'आउट' होकर 'पवेलियन' लौट रहा था तभी 'गवर्नर पवेलियन' में बैठे हुए जे आर डी टाटा ने दौड़ कर मुझे गले लगा लिया. मैंने उनसे कहा भी कि आपका सफ़ेद 'सफ़ारी सूट' ख़राब हो जाएगा, क्योंकि मैं पसीने से तरबतर हूँ.''

''लेकिन वो नहीं माने. 'पवेलियन' में अचानक मैंने कहा कि मुझे प्यास लगी है. मैं ये देख कर आश्चर्यचकित रह गया कि टाटा ने खुद उठ कर मुझे पानी का गिलास दिया. हद तब हुई जब मैंने महसूस किया कि कोई मेरे 'पैड' के 'बकल्स' खोल रहा है. जब मैंने देखा तो पाया कि ये काम टाटा कर रहे थे.''

जब भारतीय मैनेजर के हाथ से मूंगफलियाँ गिर कर कालीन पर फैलीं

फ़ारुख इंजीनियर ग़ज़ब के किस्सेबाज़ है. वो 1974 के इंग्लैंड दौरे का एक किस्सा सुनाते हैं जब इंग्लैंड की महारानी एलिज़ाबेथ ने भारतीय क्रिकेट टीम को 'बकिंघम पैलेस' में चाय पर बुलाया.

इंजीनियर बताते हैं, ''हम लोग एक 'हॉल' में महारानी का इंतज़ार कर रहे थे. हमारे मैनेजर हेमू अधिकारी को मूंगफली खाने का बहुत शौक था. उन्होंने हाल में घुसते ही दो मुटठी मूंगफली उठाई. एक मुटठी तो उन्होंने अपने मुंह में डाली और दूसरी अपने हाथ में ही रहने दी.''

''तभी महारानी ने 'हॉल' में प्रवेश किया और वो सीधे 'मैनेजर' अधिकारी के पास आईं. उन्होंने उनसे मिलाने के लिए अपना हाथ आगे किया. लेकिन अधिकारी के हाथ में तो मूंगफलियाँ थी.''

''उन्होंने घबराहट में हाथ मिलाने के बजाए नमस्ते की मुद्रा में अपने हाथ जोड़ दिए. उनका ऐसा करना था कि उनके हाथ की सारी मूंगफलियाँ नीचे लाल कालीन पर गिर कर फैल गईं. उनमें से कुछ मूंगफलियाँ तो महारानी की 'सेंडिल' में घुस गई और वहाँ मौजूद सभी लोगों का हंसते हंसते बुरा हाल हो गया.''

पूरे भारत में छुट्टी

1983 में जब भारत ने विश्व कप जीता तो फ़ारुख़ इंजीनियर बीबीसी के लिए कमेंट्री कर रहे थे. जब भारत जीत की कगार पर था तो उनके साथी कॉमेंट्रेटर ब्रायन जॉन्सटन ने उनसे मज़ाक में पूछा, अगर भारत जीतता है तो क्या इंदिरा गाँधी कल भारत में छुट्टी घोषित करेंगी?

फ़ारुख़ का जवाब था, ''बिल्कुल. इंदिरा गाँधी क्रिकेट की शौकीन हैं. अगर वो इस समय कमेंट्री सुन रही हों, तो मैं उनसे अनुरोध करूंगा कि भारत की जीत पर पूरे भारत में छुट्टी घोषित कर दी जाए.''

भारत की जीत के आधे घंटे बाद 'कमेंट्रेटर बाक्स' के फ़ोन की घंटी बजी. दूसरे छोर पर प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी थी. उन्होंने इंजीनियर से कहा, 'मैंने आपकी सलाह मान ली है. कल पूरे भारत में छुट्टी है.'

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English summary
Explanation When Farooq Engineer wash the balls of Wes Hall like cotton
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