Explainer: कश्मीर में उमर अब्दुल्ला की सरकार बनने के बाद अचानक क्यों बढ़े आतंकी हमले?
Terrorist Attack increasing in Jammu and Kashmir: जम्मू और कश्मीर में 10 साल बाद लोकतांत्रिक ढंग से चुनी हुई सरकार बने महज 10 दिन ही हुए हैं, लेकिन इस दौरान कश्मीर घाटी में आतंकी हमलो में कम से कम 11 लोगों की जान जा चुकी है और कई जख्मी हुए हैं। 2019 में आर्टिकल 370 हटने के बाद से कश्मीर घाटी आतंकी वारदाताओं में इतना ज्यादा इजाफा अचानक देखा जा रहा है। सवाल है कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है।
जम्मू कश्मीर में नेशनल कांफ्रेंस की अगुवाई वाली उमर अब्दुल्ला सरकार बनने के बाद सबसे बड़ी आतंकी वारदात गांदरबल के गगनगीर में देखा गया, जहां सात लोगों को मौत के घाट उतार दिया गया और पांच लोग जख्मी हो गए। कहा जा रहा है कि यह तो महज संयोग था कि दहशतगर्दों की टाइमिंग गलत रही, नहीं तो वहां पर सैकड़ों लाशें बिछ सकती थीं।

कश्मीर घाटी में नई सरकार बनने के बाद बढ़ गई आतंकी वारदातें
गुरुवार को ही पुलवामा के त्राल में यूपी के बिजनौर निवासी शुभम कुमार नाम के एक कामगार को गोली मारी गई, जिसमें वह घायल हो गया। इसी रात बारामूला जिले के गुलमर्ग के पास आतंकियों ने सेना के एक वाहन को निशाना बनाया, जिसमें दो सैनिक शहीद हो गए और दो पोर्टर्स की भी मौत हो गई। इस वारदात के बाद गोंडोला केबल कार का संचालन बंद करना पड़ा, जो कि गुलमर्ग आने वाले सैलानियों के लिए आकर्षण का प्रमुख केंद्र है।
आतंकवाद के नए दौर के पीछे सोची-समझी साजिश की आशंका
आर्टिकल-370 हटने के बाद बन रहे नया कश्मीर में आतंकी वारदातों का यह बिल्कुल नया ट्रेंड है। पिछले कुछ महीनों में जम्मू इलाकों में जरूर आतंकी वारदातों को अंजाम दिया जाने लगा था, जिसपर अब काफी हद तक लगाम लग चुका है।
लेकिन, एक लोकप्रिय सरकार बनने के बाद कश्मीर घाटी में आतंकवाद का एक नया दौर शुरू करने के पीछ एक बहुत ही सोची-समझी साजिश लग रही है।
जम्मू और कश्मीर में शांतिपूर्ण और निष्पक्ष तरीके से हुए दो-दो चुनाव
जम्मू और कश्मीर में इस साल पहले लोकसभा के और फिर विधानसभा के चुनाव हुए हैं, जो कि बहुत ही सफल रहे हैं। इन दोनों चुनावों में जम्मू-कश्मीर के मतदाताओं ने जिस उत्साह के साथ हिस्सा लिया है, उसे पूरी दुनिया से सराहना मिल रही है।
सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि भारतीय चुनाव आयोग जम्मू-कश्मीर में जिस तरह से शांतिपूर्ण और निष्पक्ष चुनाव करवाने में कामयाब रहा है, वह पूरे भारत ही नहीं, अन्य लोकतांत्रिक देशों के लिए भी बहुत बड़ा उदाहरण बन चुका है।
पूर्ण राज्य के दर्जे की वापसी के वादे के साथ जीती है नेशनल कांफ्रेंस
अभी जम्मू-कश्मीर में नेशनल कांग्रेस की अगुवाई में गठबंधन सरकार बनी है। विधानसभा चुनावों के दौरान फारूक अब्दुल्ला और उमर अब्दुल्ला की पार्टी और उनके गठबंधन का सबसे प्रमुख वादा इस केंद्र शासित प्रदेश को फिर से पूर्ण राज्य का दर्जा दिलवाने का रहा है।
यूं तो अब्दुल्ला की पार्टी ने आर्टिकल-370 की वापसी का भी वादा किया है, लेकिन यहां की जनता भी समझ चुकी है कि उस वादे को निभाना लगभग नामुमकिन है।
पूर्ण राज्य के दर्जे को लेकर सक्रिय भी हैं सीएम उमर अब्दुल्ला
उमर अब्दुल्ला अपनी सरकार बनते ही पूर्ण राज्य का दर्जा बहाली करवाने के अपने एजेंडे पर सक्रिय हैं। उन्होंने इस प्रस्ताव को अपनी कैबिनेट से मंजूरी दिलवाई। उपराज्यपाल मनोज सिन्हा की मुहर लगवाई। इस मसले को लेकर केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक अपनी बात पहुंचा आए हैं।
पूर्ण राज्य का दर्जा देने को केंद्र तैयार, लेकिन सही समय का इंतजार
लेकिन, केंद्र सरकार की ओर से बार-बार संकेत दिया जा चुका है कि राज्य का दर्जा बहाली का वादा खुद प्रधानमंत्री मोदी जम्मू-कश्मीर के लोगों से कर चुके हैं, इसलिए यह होना तो तय है। लेकिन यह भी तय है कि इसका सही समय कब आएगा यह जम्मू और कश्मीर के सुरक्षा हालातों पर निर्भर करेगा।
पूर्ण राज्य का दर्जा देने से पहले शांतिपूर्ण माहौल जरूरी
गुरुवार को ही श्रीनगर में जम्मू और कश्मीर के बीजेपी महासचिव अशोक कौल ने कहा, 'प्रधानमंत्री और गृहमंत्री ने राज्य का दर्जा बहाल करने का वादा किया है। केंद्र सरकार और यहां की एजेंसियां तय करेंगी कि राज्य का दर्जा बहाल करने का उचित समय कब है और क्या अभी यह समय है या नहीं।' उन्होंने यह भी कहा कि, '(उचित समय वह होगा जब) गगनगीर जैसी वारदातें न हों और पूरी तरह से शांति बहाल हो।'
कश्मीर में अचानक क्यों बढ़े आतंकी हमले?
कश्मीर घाटी में आतंकी वारदाताओं में अचानक हुई बढ़ोतरी के पीछे यही वजह है। पाकिस्तान के पालतू आतंकी आकाओं को मालूम है कि अगर अब भी शांति का माहौल कायम रहा तो जम्मू और कश्मीर में केंद्र शासित प्रदेश से अलग पूरी तरह से देश के अन्य राज्यों के समान ही लोकतांत्रिक व्यवस्था बहाल हो जाएगी। लेकिन, अगर दहशतगर्दी का दौर जारी रखा गया तो इसे पूर्ण राज्य का दर्जा वापस करने में कठिनाइयां पैदा होंगी।
इन हालातों में देश के दुश्मनों को लगता है कि जम्मू-कश्मीर की जो जनता पूरी तरह से लोकतांत्रिक व्यवस्था को आत्मसात कर चुकी है, अलगाववादियों को भी अपनी गलतियों का एहसास हो चुका है और उन्होंने मुख्यधारा की राजनीति में ही अपना भविष्य देखना शुरू कर दिया है,उनकी बेचैनी बढ़ सकती है।
बस वह ऐसी ही परिस्थितियां फिर से पैदा करना चाहते हैं, जिससे उनके लिए लोगों को गुमराह करना फिर से आसान हो जाए। वैसे शांति और अमन के दौर में जीना सीख चुकी कश्मीर की जनता फिर से उनके नापाक मंसूबों को कामयाब होने देंगे, इसकी संभावना फिलहाल दूर-दूर तक नजर नहीं आ रही है।
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