मां की बाली का लॉकेट बनाकर खाई थी कसम, इसे मेडल में बदलूंगा: हॉकी खिलाड़ी सुमित की दर्द भरी दास्तां
मां की बाली का लॉकेट बनाकर खाई थी कसम, इसे मेडल में बदलूंगा: हॉकी खिलाड़ी सुमित की दर्द भरी दास्ता
नई दिल्ली। सफलता के रास्ते में बाधाएं तमाम आती है, लेकिन जो उन मुश्किलों को पार कर जाता है वहीं असली सूरमा कहलाता है। 41 सालों के बाद देश का इंतजार उस वक्त खत्म हुआ जब भारतीय हॉकी टीम ने टोक्यो ओलंपिक में कांस्य पदक अपने नाम कर लिया। भारतीय़ पुरूष हॉकी टीम ने टोक्यो ओलंपिक में ब्राउंज मेडल जीतकर देश का सिर गर्व से ऊंचा कर दिया। जर्मनी को हराकर कांस्य पदक अपने नाम करने वाले इन भारतीय खिलाड़ियों ने एक बार फिर हॉकी में जान फूंक दी, लेकिन ये जीत इतनी आसान नहीं थी। सालों की मेहनत और खिलाड़ियों का संघर्ष इस जीत का कारण बना। भारतीय हॉकी टीम के मिड फिल्डर सुमित वाल्मिकी की संघर्ष की कहानी आपको भावुक कर देगी।

हरियाणा के सोनीपत के रहने वाले सुमित ने जूतों के लालच में हॉकी की स्टिक पकड़ी और आज देश के हीरो बन गए। वनइंडिया ने सुमित के साथ एक्सक्लूसिव बात की। बातचीत के दौरान सुमित अपने संघर्ष और गरीबी को याद कर भावुक हो गए। एक वक्त था जब कई रातें उन्होंने खाली पेट गुजारी थी। सुमित बेहद गरीब परिवार से आते हैं। पिता सफाई कर्मचारी थे और मां दिहाड़ी मजदूर थीं। दोनों भाई भी मजदूरी करते थे। सुमित के भाई उन्हें हमेशा खेलने के लिए प्रेरित करते रहे, लेकिन अभावों में गुजर रही जिंदगी में खेल के लिए जरूरी सुविधाएं थी, ऐसे में खेल तो दूर की बात है, जीवनयापन करना भी मुश्किल हो रहा था।
सुमित ने बातचीत के दौरान बताया कि वो अपनी मां के बहुत करीब थे और चाहते थे टोक्यो ओलिंपिक में उनकी मां भी उनके साथ जाएं, लेकिन भगवान को कुछ और ही मंजूर था। ओलंपिक से कुछ महीने पहले ही उनकी मां का देहांत हो गया। मां के बेहद करीब रहने वाले सुमित उनके जाने से टूट गए थे, लेकिन सुमित ने खुद को संभाला और प्रैक्टिस में जुट गए। टीम के साथ साछ जब सुमित टोक्यो पहुंचें तो उन्हें मां की याद आने लगीं। सुमित ने अपने भाई से कहा कि मां की कान की बाली का लॉकेट बनवा कर उन्हें भेज दें। भाई समझ गए कि सुमित को मां की याद आ रही है, उन्होंने फौरन मां के कान की बाली का लॉकेट बनाया और सुमित के पास टोक्यो भेज दिया। इस लॉकेट को सुमित हमेशा अपने गले में पहनकर रखते हैं। इसे पहनकर उन्हें अहसास होता है कि मां उनके करीब है। सुमित ने आज उस लॉकेट को ब्राउंज मेडल में बदल दिया।
सुमित बात करते हुए भावुक हो गए, वो चाहते थे कि वो ये मेडल मां के गले में पहनाए। सुमित का गला भर आया, उनके आंखों में आंसू छलक उठे, लेकिन सुमित खुश है कि उनकी मां जहां भी हैं उन्हें देखकर खुश हो रही होंगी। जिस सुमित ने कई रातें भूखे पेट बताई, शादियों में जूठे बर्तन धोएं, ताकि वो परिवार का पेट भर सके, आज वो देश के हीरो बन गए है। भाई ने जूते दिलाने का लालच देकर सुमित को खेल के मैदान तक पहुंचाया और वो सुमित ओलंपिक मेडल विजेता टीम का अहम हिस्सा है। स्वभाव से बेहद सरल और शर्मिले स्वभाव के सुमित ने आगे की तैयारी कर ली है। उन्हें विश्वास है कड़ी मेहनत और प्रैक्टिक के दम पर वो पेरिस ओलंपिक में मेडल के रंग को बदलने में कामियाब होगें।












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