अपना बिजनेस बढ़ाने के लिये क्या-क्या नहीं किया बाबा रामदेव ने!
[अनिल कुमार] योग गुरु बाबा रामदेव राजनेताओं के कितने करीब हैं, यह किसी से छिपा नहीं है। बाबा कहते हैं कि उन्होंने अपने निजी फायदे के लिये कभी राजनेताओं का इस्तेमाल नहीं किया, लेकिन अगर आप पिछले दो तीन साल की गतिविधियों पर नजर डालें तो बाबा तमाम सारे राजनीतिक प्रयास किये हैं... वो प्रयास किसी ट्रस्ट या समाज सेवा के लिये नहीं बल्कि उनके खुद के बिजनेस को बढ़ाने के लिये थे।

आज बाबा का आयुर्वेदिक दवाओं और दूध का बिजनेस फलफूल रहा है। इसमें कोई शक नहीं कि बाबा का ट्रस्ट पूरी ईमानदारी से काम करता है, लेकिन उनके काम में कोई भी पॉलिटिकल लोचा नहीं आये, इसके लिये बाबा ने उसी दिन से प्लानिंग शुरू कर दी थी, जिस दिन उन्हें लगा कि नरेंद्र मोदी भारत के प्रधानमंत्री बन सकते हैं।
शुरुआत अन्ना आंदोलन के बाद से हुई
अन्ना और अरविंद केजरीवाल के भ्रष्टाचार अभियान से जुदा हुए बाबा राम देव ने पहले ही भाजपा का समर्थन कर दिया था, लेकिन अब वह पूरी तरह से खुलकर नरेंद्र मोदी के समर्थन में दिख रहे हैं। रामदेव ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वच्छ भारत अभियान को लेकर अपना समर्थन दिया है। लेकिन इसके कई मायने हैं। क्योंकि बाबा रामदेव को लग रहा है कि अब उनके अच्छे दिन आएंगे। क्यों ऐसा लग रहा है, आखिर क्या चाहते हैं बाबा रामदेव। इस ग्राउंड अनुभव के आधार पर हम आपको वो जानकारियां देने जा रहे हैं, जो शायद आप पहले नहीं जानते होंगे।
यह बताने की जरूरत नहीं है कि अन्ना हजारे और केजरीवाल के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के समर्थन में बाबा रामदेव ने एक बड़ा बिगुल फूंका था। भ्रष्टाचार सहित कालेधन को वापस लाने के लिए रामलीला मैदान पर अनशन किया था। बाबा रामदेव की लोकप्रियता उस गति से नहीं बढ़ पाई जिस गति से अन्ना हजारे और केजरीवाल की बढ़ी। यही कारण था कि बाबा रामदेव का पूरा का पूरा आंदोलन ध्वस्त होने के बाद रामदेव फिर से एक आंदोलनकारी के रूप में वापसी नहीं कर पाए।
अनसेफ महसूस करने लगे बाबा रामदेव
इस बीच केजरीवाल की लोकप्रियता लगातार बढ़ रही थी। वर्ष 2011 से लेकर वर्ष 2013 तक आते आते केजरीवाल भ्रष्टाचार से त्रस्त औऱ बेरोजगार युवाओं के हीरो बन चुके थे। इन तीन सालों में केजरीवाल की टीम ने अपने मुद्दों में कालेधन के मुद्दे को भी उठाया था। यही वो समय था जब बाबा रामदेव को अहसास हो चुका था कि अब उनका भ्रष्टाचार और कालाधन आंदोलन हड़प लिया गया है।
तैयार की नेशनल रिसर्च टीम
वर्ष 2013 के अंत तक बाबा रामदेव की टीम वापस आंदोलन की लोकप्रियता को पाने के लिए छटपटाने लगी। इस दौरान रामदेव ने सबसे लोकप्रिय और तेजी से युवाओं के बीच चर्चित होने का माध्यम सोशल मीडिया और ऑनलाइन पर ज्यादा से ज्यादा ध्यान दिया। दिसंबर 2013 का समय था।
बाबा रामदेव की नेशनल रिसर्च टीम और ऑनलाइन टीम को मजबूत करने का काम चल रहा था। तभी नेशनल रिसर्च टीम के सदस्य से मुलाकात के दौरान एक चर्चा में पता चला था कि बाबा रामदेव यह समझते हैं कि अन्ना हजारे और अरविंद केजरीवाल ने उनके आंदोलन को हथियाने का काम किया है।
ऑफ द रिकॉर्ड बातचीत में क्या निकला
ऑफ द रिकॉर्ड बातचीत में सामने आया था कि बाबा रामदेव की एक सोशल मीडिया टीम और राष्ट्रीय स्तर की ऑनलाइन टीम को नए सिरे से ट्रेनिंग दी जा रही है। जिनको विशेष तौर पर युवाओं को टारगेट करने के लिए तैयार किया जा रहा था। यह टीम नोएडा की एक बिल्डिंग में तैयार हो रही थी।
इस टीम को विशेष तौर पर गउ हत्या का विरोध, गाय के दूध को बढ़ावा देना, विदेशी वस्तुओं के विरोध के लिए स्वदेशी आंदोलन और कालेधन के मुद्दे को भुनाने के लिए ढाला जा रहा था। उस दौरान भारी-भारी पैकेज पर युवाओं और मीडिया और ऑनलाइन से जुड़े धुरंधरों की इसमें भर्ती हुई थीं। जिनको सिर्फ बाबा रामदेव की दवा, दूध कम्पनी और बाबा रामदेव के मुद्दों को प्रमोट करने पर ही काम करना था।
ऐसा क्यों किया बाबा रामदेव ने?
बाबा रामदेव दुग्ध उत्पादन क्षेत्र में भी कदम रख चुके हैं। रामदेव की गाउशालाओं में अच्छी किस्म की गाय के दूध का उत्पादन होता है। बाबा रामदेव की इन दूध उत्पाद की मांग बाजार में कम थी। जो शायद अभी भी कम है। इस आंदोलन से उनके गाय के दूध पैकेट की बिक्री पहले के मुताबिक ज्यादा बढ़ने की उम्मीद थी।
दूसरी ओर बाबा रामदेव की खो चुकी लोकप्रियता जितनी ज्यादा बढ़ती उतना ही उनका हरिद्वार आश्रम में लोगों का आना-जाना बढ़ना तय था। कई लोग जो हरिद्वार आश्रम से इलाज कराकर लौटे हैं उनका कहना है कि बाबा रामदेव महंगी दवाइयां देते हैं।
किसका है यह स्वदेशी आंदोलन
गौरतलब है कि लोकसभा चुनाव से पहले बाबा रामदेव अचानक से भाजपा के समर्थन में आ गए थे। उस समय बाबा रामदेव की गुप्त बैठकें भी नरेंद्र मोदी और भाजपा के आला नेताओं के साथ हुई थीं। जिसके बाद कुछ समझौतों के आधार पर बाबा रामदेव ने भाजपा का समर्थन किया था। हालांकि वह गुप्त समझौते क्या है यह तो आज भी गुप्त है लेकिन इतना कहा जा सकता है कि आंदोलन एक लोकप्रियता पाने का जरिया बना है। कुल मिलाकर भाजपा से करीबी संबंधों ने बाबा के बिजनेस के आगे आने वाली उन अढ़चनों को दूर कर दिया है, जो कांग्रेस के शासन के वक्त आती थीं।












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