नयी पार्टी बनाने से पहले योगेंद्र यादव की भावुक अपील और सवाल
नई दिल्ली। आम आदमी पार्टी की नींव रखने वाले नेताओं में शुमार योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण को जिस तरह से पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाया गया है। उसके बाद आम आदमी पार्टी को समर्थन करने वाले एक बड़े तबके को काफी निराशा हुई है। यही नहीं लोगों के मन में यह सवाल भी है कि जिस आदर्श और व्यवस्था परिवर्तन के नाम पर पार्टी का उदय हुआ था क्या वह उम्मीद फिर टूट जाएगी।

पार्टी के सभी अहम जिम्मेदारियों से बाहर किये जाने के बाद योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण ने एक लेख के जरिए भावुक अपील करते हुए सवाल पूछे हैं। यादव ने लोगों से कुछ सवाल पूछे-
- देश बदलने की जो यात्रा आज से चार साल पहले शुरू हुई थी उसकी दिशा अब क्या हो ?
- क्या इस आंदोलन का राजनैतिक वाहन वैकल्पिक राजनीति की जगह सामान्य पार्टियों जैसा एक चालू राजनैतिक विकल्प बनेगा ?
- पूरे देश में बदलाव का बीड़ा उठाने वाले क्या सिर्फ दिल्ली का क्षेत्रीय दल बनाकर रह जायेंगे ?
- स्वराज का मंत्र लेकर चली इस यात्रा का ‘स्व' कहीं एक व्यक्ति तक सिमट कर तो नहीं रह जायेगा ?
- इस आंदोलन का राजनैतिक औज़ार कहीं इस आंदोलन की मूल भावना से ही विमुख तो नहीं हो गया ?
लोगों की समस्याओं को सुलझाना होगा
योगेंद्र यादव लिखते हैं कि जो सवाल आज सार्वजनिक हुए हैं वो मेरे और प्रशांत भूषण जैसे सहयात्रियों के मन में बहुत समय से चल रहे हैं। इस यात्रा के भटकाव के चिन्ह बहुत समय से दिख रहे थे। कुछ साथी उन मुद्दों को उठाकर यात्रा छोड़ भी चुके थे। लेकिन हम दोनों जैसे अनेक साथियों ने तय किया कि इस सवालों को अंदर रहते हुए ही सुलझाने की हर संभव कोशिश करेंगे।
योगेंद्र यादव पार्टी की टूट पर लिखते हैं कि चूंकि तोड़ना आसान है और बनाना बहुत मुश्किल। एक बार लोगों की आशा टूट जाये तो फिर भविष्य में कुछ भी नया और शुभ करना असंभव हो जायेगा। हमारी दुविधा यह थी कि आंदोलन की एकता भी बनाये रखी जाय और इसकी आत्मा भी बचायी जाय।
हम आंदोलन के टूटने के मूक दर्शक नहीं बने रह सकते
एक तरफ यह खतरा था कि कहीं हमारी भूल से इतना बड़ा प्रयास टूट न जाये, कहीं देश भर में फैले हुए कार्यकर्ताओं की उम्मीदें न टूट जाएँ तो दूसरी ओर यह खतरा था की हम कहीं पाप के भागीदार ना बन जाएँ, कल को ये न लगे कि सब कुछ जान-बूझते हम इस आंदोलन के नैतिक पतन के मूक दर्शक बने रहे।
राजनीति को छोड़ नहीं सकते, लोकतंत्र को सुधारना है
आज इस आंदोलन के कार्यकर्ता, समर्थक और शुभचिंतक एक तिराहे पर खड़े हैं। एक रास्ता है कि हम जहां से आये थे वहीं वापिस चले जाएँ। यानी राजनीति को छोड़ दें और अपने अपने तरीके से समाज की सेवा में लग जाएँ। दिक्कत ये है कि ऐसा करने से लोकतंत्र मजबूत होने की बजाय और कमजोर हो जायेगा। ‘राजनीति तो गन्दी ही होती है' वाला विचार लोकतन्त्र की जड़ काटने का काम करता है। राजनीति को छोड़ देंगे तो लोकतंत्र को कैसे सुधारेंगे?
दूसरा रास्ता है कि इसी वाहन को ठोक-पीट कर ठीक किया जाय। कई लोगों की राय है कि पिछले दिनों की गलतियों को सुधारने के लिए कोर्ट-कचहरी या फिर चुनाव आयोग की शरण ली जाय। इसमें कोई शक नहीं कि 28 तारीख को आम आदमी पार्टी की राष्ट्रीय परिषद में जो कुछ हुआ वह पार्टी के संविधान और लोकतंत्र की मर्यादा के बिलकुल खिलाफ था।
झगड़े में पड़कर आंदोलन को खत्म नहीं होने दे सकते
लेकिन क्या इस मामले को खानदानी जायदाद के झगड़े की तरह कोर्ट-कचहरी में सालों तक घसीटा जाय ? लोकतान्त्रिक राजनीति में सबसे बड़ी अदालत तो जनता की अदालत होती है। अगर कोर्ट-कचहरी नहीं तो फिर और किस तरीके से इस वाहन को सुधारा जाय ? जहाँ हर मतभिन्नता को विद्रोह करार दिया जाय, वहां भीतर से बदलाव कैसे हो ?
तीसरा रास्ता एक नयी किस्म की राजनीति की ओर ले जाता है। ऐसी राजनीति जो स्वराज के आंदोलन की मूल भावना के अनुरूप हो। राजनीति का विकल्प बनाने या सिर्फ चालू राजनैतिक विकल्प बन जाने की जगह एक सच्चे अर्थ में वैकल्पिक राजनीति का रास्ता।
- सवाल है कि कैसी होगी यह राजनीति ? इसका वैचारिक ताना-बाना क्या होगा ?
- तात्कालिक सफलता के लालच से मुक्त कैसे रहा जाय ?
- अपने नैतिक आदर्शों से समझौता किये बिना सफलता कैसे हासिल की जा सकती है ?
- यह भी कि क्या दूध से जली जनता क्या ऐसे किसी नए प्रयास से जुड़ेगी ?
ये मेरे और प्रशांत भूषण के प्रश्न नहीं है। यह आज पूरे देश के प्रश्न हैं। आपके प्रश्न हैं। इस बार उत्तर भी आप ही देंगे।












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