आपातकाल: 25 जून, 1975 को क्या हुआ जिसने भारत का इतिहास बदल दिया?
Emergency in India: 25 जून, 2024 को आपातकाल की 49वीं 'बरसी' है। हमारे लिए इसे वर्षगांठ कहना इसलिए मुश्किल है, क्योंकि यह दिन आजाद भारत के इतिहास में अब 'काला अध्याय' के तौर पर दर्ज हो चुका है।
25 जून, 1975 को देश के तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने संविधान के अनुच्छेद 352 के तहत केंद्र में इंदिरा गांधी की अगुवाई वाली कांग्रेस सरकार की सिफारिश पर आपातकाल की घोषणा पर मुहर लगा दी थी।

आपातकाल: स्वतंत्र भारत के राजनीतिक इतिहास का विवादित अध्याय
देश पर थोपा गया यह आपातकाल 25 जून, 1975 से लेकर 21 मार्च, 1977 तक लागू रहा और तब से लेकर आजतक यह आधुनिक और स्वतंत्र भारत के राजनीतिक और सामाजिक इतिहास का सबसे विवादित अध्याय बन चुका है।
मौलिक अधिकार निलंबित कर दिए गए
आपातकाल की घोषणा बिना किसी पूर्वसूचना के की गई थी। 26 जून, 1975 की सुबह जब देश की जनता जागी तो मालूम हुआ कि संविधान से मिली उनकी स्वतंत्रताएं छीन ली गई हैं और उनके मौलिक अधिकार भी निलंबित हो चुके हैं।
आपातकाल के नाम पर सरकार ने दमनकारी कार्य किए
आपातकाल स्वतंत्र भारत के इतिहास में एक काला इसलिए बन गया, क्योंकि इस दौरान मेंटेनेंस ऑफ इंटर्नल सिक्योरिटी एक्ट 'The Maintenance of Internal Security Act (MISA)' के तहत लोगों को जेलों में डालने की सरकार को बेलगाम छूट मिल गई।
असहमति को सख्ती से कुचल दिया गया और नागरिक स्वतंत्रता को सरकार की ओर से रौंदने का काम किया गया। 21 महीने जबतक आपातकाल लागू रहा, मानवाधिकारों के उल्लंघन और प्रेस पर दमनकारी वाली सेंसरशिप तक की खबरें आती रहीं।
आपातकाल लागू करने की वजह क्या थी?
तत्कालीन कांग्रेसी प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के खिलाफ इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक फैसले को आपातकाल लगाने की वजह माना जाता है। दरअसल, 12 जून, 1975 को इलाहाबाद हाई कोर्ट का एक फैसला आता है, जिसमें तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को चुनावी धांधली का दोषी पाया जाता है और किसी भी चुने हुए पद पर आसीन होने से वंचित कर दिया जाता है। इसके फौरन बाद ही देश पर आपातकाल थोप दिया जाता है।
इंदिरा गांधी को किस गुनाह का दोषी पाया गया था?
इंदिरा गांधी 1971 का लोकसभा चुनाव उत्तर प्रदेश की रायबरेली सीट से बड़े आराम से जीत गईं थीं। बाद में उनसे हारने वाले समाजवादी नेता राज नारायण ने उनपर चुनावी धांधली का आरोप लगाते हुए जनप्रतिनिधित्व कानून, 1951 के उल्लंघन को लेकर उनके निर्वाचन को अदालत में चुनौती दी।
इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा ने इस मामले में प्रधानमंत्री को दोषी पाया और इंदिरा गांधी को संसद से अयोग्य ठहराते हुए, 6 साल तक किसी निर्वाचित पद बैठने पर भी रोक लगा दी।
24 संगठनों को प्रतिबंधित किया गया, मीडिया पर सेंशरशिप लागू हुआ
आपातकाल लागू होते ही जनता के मौलिक अधिकार निलंबित करने के साथ ही मेंटेनेंस ऑफ इंटर्नल सिक्योरिटी एक्ट के तहत सभी विपक्षी दलों के नेताओं को जेल में डाल दिया गया और मीडिया पर सेंशरशिप लागू कर दिया गया। कई पत्रकार भी सलाकों के पीछे पहुंचा दिए गए। आरएसएस समेत 24 संगठनों पर बैन लगा दिया गया।
कांग्रेस सरकार ने आपातकाल लागू करने के लिए क्या तर्क दिया?
कांग्रेस सरकार ने आपातकाल लागू करने के लिए कानून और व्यवस्था, राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरा, पाकिस्तान से कुछ वर्ष पहले हुए युद्ध की दलीलें दीं। हालांकि, तब कांग्रेस में भी आपातकाल लागू करने को लेकर आम सहमति नहीं थी, लेकिन इंदिरा गांधी के सामने किसी की एक न चली और उनके वफादारों ने तो उनकी हौसला अफजाई का भी काम किया। इसमें पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री सिद्दार्थ शंकर रे भी शामिल थे।
जबरन सामूहिक नसबंदी करवाने का गंदा खेल हुआ!
कुछ इतिहासकारों का दावा है कि आपातकाल लागू करने के पीछे इंदिरा गांधी के छोटे बेटे और पूर्व पीएम राजीव गांधी के भाई संजय गांधी का बहुत बड़ा रोल रहा, जिन्होंने 21 महीने के आपातकाल के दौरान कथित तौर पर 'गैर-संवैधानिक' शक्ति के रूप में काम किया। इंदिरा गांधी उन्हीं के कहने पर सारे फैसले लेती गईं। उनपर जनसंख्या नियंत्रण के लिए देश में जबरन सामूहिक नसबंदी करवाने के भी आरोप लगे।












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