श्रीदेवी के शव पर लेप, लेकिन ये ज़रूरी क्यों?

शनिवार देर रात अभिनेत्री श्रीदेवी का निधन हुआ और दो दिन तक जारी अटकलों के दौर के बाद मंगलवार दोपहर उनका शव भारत ले जाने की इजाज़त दे दी गई.

दुबई पुलिस ने भारत के वाणिज्य दूतावास और श्रीदेवी के परिवार को वो दस्तावेज़ सौंप दिए,जिससे उनके शव पर लेप लगाने की प्रक्रिया शुरू की जा सके. साथ ही दुबई पुलिस ने श्रीदेवी की मौत का केस भी ख़त्म कर दिया है.

लेकिन शव पर लेप लगाने की प्रक्रिया यानी एम्बाममेंट या एम्बामिंग क्या है, इसमें क्या किया जाता है और ये क्यों ज़रूरी है यानी अगर लेप न किया जाए तो शव के साथ क्या दिक्कतें हो सकती हैं?

एम्बामिंग क्या है?

एम्बामिंग
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एम्बामिंग या शव-लेपन वो प्रक्रिया है, जो मौत के बाद शव को सुरक्षित रखने के लिए ज़रूरी होती है. इंसान हज़ारों साल से शव को बचाने के लिए अलग-अलग तरीके अपनाता आया है और इसमें रसायनों का इस्तेमाल किया जाता है.

दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान यानी एम्स के फ़ॉरेंसिक चीफ़ डॉक्टर सुधीर गुप्ता ने बीबीसी को बताया कि एम्बामिंग इसलिए की जाती है ताकि शव को सुरक्षित किया जा सके. उसमें कोई इंफ़ेक्शन न आए, बदबू न आए और उसे एक जगह से दूसरी जगह तक ले जाया जा सके.

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लेकिन एम्बामिंग कैसे की जाती है और इसमें क्या किया जाता है? डॉक्टर गुप्ता ने कहा, ''कुछ लोग केमिकल इस्तेमाल करते हैं, कुछ अल्कोहल. कुछ मामलों में आर्सेनिक और फ़ॉर्मलडिहाइड. ये सभी वो रसायन हैं, जिनकी मदद से हम शव को सड़ने से बचा सकते हैं.''

''इन रसायनों का इस्तेमाल करने से शव सड़ता नहीं है साथ ही ये ट्रांसपोर्ट के लिए सुरक्षित भी हो जाता है.''

कितने दिन तक सुरक्षित रहता है शव?

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एम्बामिंग से शव को कितने दिन तक अच्छी हालत में रखा जा सकता है, उन्होंने जवाब दिया, ''ये इस बात पर निर्भर करता है कि शव पर किस रसायन का कितनी मात्रा में इस्तेमाल किया गया है. आम तौर पर जो तरीके इस्तेमाल किए जाते हैं, उनकी मदद से शव को तीन दिन से लेकर तीन महीने तक सुरक्षित रखा जा सकता है.''

लेकिन अगर एम्बामिंग न की जाए तो क्या होता है?

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डॉ. गुप्ता ने बताया कि शव दूसरे लोगों के लिए ख़तरनाक साबित हो सकता है. उन्होंने कहा, ''मौत के बाद अगर शव को संरक्षित ना किया जाए तो वो नुकसान दे सकता है.''

''शव से अलग-अलग तरह की गैसें निकलती हैं, बैक्टीरिया का संक्रमण होता है. शव से मीथेन और हाइड्रोजन सल्फ़ाइड जैसी गैस निकलती हैं जो ना सिर्फ़ विषैली हैं और बदबू भी इन्हीं की वजह से आती है. इसके अलावा जो बैक्टीरिया निकलते हैं, वो दूसरे लोगों को नुकसान पहुंचा सकते हैं.''

क्या शव नुकसानदायक है?

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लेकिन क्या हर बार जब शव को एक से दूसरी जगह ले जाया जाता है, तो एम्बामिंग ज़रूरी होती है, उन्होंने जवाब दिया, ''जी हां, ये ज़रूरी होता है. यहां तक कि जब कभी शव को ट्रांसपोर्ट किया जाता है, तो लिखा भी जाता है कि शव की एम्बामिंग हो चुकी है और इसे केमिकल से ट्रीट भी किया गया है.''

''और ये भी लिखा जाता है कि इससे कोई बदबू नहीं आएगी, किसी को नुकसान नहीं होगा और इसे सुरक्षित तरीके से ले जाया जा सकता है.''

funeralzone.co.uk के मुताबिक आम तौर पर एम्बामिंग के दो तरीके होते हैं, जिन्हें आर्टेरियल और कैविटी कहा जाता है.

आर्टेरियल प्रक्रिया में ख़ून की जगह शरीर में एम्बामिंग फ़्लूड भरा जाता है, जबकि कैविटी एम्बामिंग में पेट और छाती को खाली कर उसमें ये भरा जाता है.

शव को मसाज क्यों किया जाता है?

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एम्बामिंग से पहले शव को डिसइंफ़ेक्टेंट सॉल्यूशन से नहलाया जाता है और शरीर को मसाज भी किया जाता है क्योंकि मौत के बाद मांसपेशियां और जोड़ काफ़ी सख़्त हो जाते हैं. इसके अलावा शव की आंखें और मुंह बंद कर दिया जाता है.

आर्टेरियल एम्बामिंग के मामले में धमनियों के ज़रिए शरीर का रक्त निकाल लिया जाता है और उसकी जगह उन्हीं के रास्ते एम्बामिंग फ़्लूड डाल दिया जाता है. एम्बामिंग सॉल्यूशन में फ़ॉर्मलडिहाइड, ग्लूटरल्डेहाइड, मेथेनॉल, इथेनॉल, फ़ेनोल और पानी शामिल होते हैं.

कैविटी एम्बामिंग के मामले में एक छोटा सा छेद करके छाती और पेट से प्राकृतिक फ़्लूड निकाल लिए जाते हैं और उसकी जगह एम्बामिंग सॉल्यूशन डालकर वो छेद बंद कर दिया जाता है.

एम्बामिंग के बाद क्या?

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एम्बामिंग की प्रक्रिया पूरी होने के बाद शव को कॉस्मेटिक आधार पर तैयार किया जाता है ताकि लोग उसके अंतिम दर्शन कर सकें. इसमें एक बार फिर शव को नहलाया जाता है, कपड़े पहनाए जाते हैं, बाल ठीक किए जाते हैं और मेकअप भी किया जाता है.

एम्बामिंग की प्रक्रिया शुरू करने से पहले आंखें बंद की जाती हैं, कई बार स्किन ग्लू या प्लास्टिक से बनी आई-कैप लगाई जाती हैं जो आंखों पर लगाई जाती हैं ताकि उनके बाहरी हिस्से को सुरक्षित रखा जा सके.

मुंह बंद कर दिया जाता है और निचला जबड़ा भी संभाला जाता है. इसके लिए सिलाई तक की जाती है.

ये प्रक्रिया टैक्सीडर्मी से अलग है. इसमें मानव शव को सुरक्षित रखा जाता है, जबकि टैक्सीडर्मी में किसी जानवर का शव लिया जाता है, उसे भीतर से खाली किया जाता है और फिर इसमें दूसरी सामग्री भरकर असली रूप देने की कोशिश की जाती है.

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