पूरा देश 'ईद' की मस्ती में चूर, जानिए बिन चांद देखें क्यों नहीं मनता ये त्योहार
नई दिल्ली। आज पूरा देश ईद का त्योहार बड़े उल्लास के साथ मना रहा है, मंगलवार को चांद के दीदार को आतुर मुस्लिम समाज के लोग शाम होते ही अपने घरों की छतों और सड़कों पर से आसमान में नजर गड़ाए रहे। आसमान में बाद छाए रहने की वजह से काफी इंतजार करना पड़ा , लेकिन आखिरकार इंतजार के बाद चांद दिखा और लोग ईद मनाने में जुट गए।
क्या कभी आपने सोचा है कि आखिर ईद का चांद से क्या लेना-देना है, अगर नहीं तो चलिए हम बताते हैं कि आखिर दोनों का कनेक्शन क्या है...
शव्वाल उल-मुकरर्म
दरअसल ईद-उल-फितर हिजरी कैलेण्डर (हिजरी संवत) के दसवें महीने शव्वाल (शव्वाल उल-मुकरर्म) की पहली तारीख को मनाई जाती है। हिजरी कैलेण्डर, इस्लाम में काफी पाक माना जाता है क्योंकि इससे एक ऐतिहासिक घटना जुड़ी है, ये उस दिन से शुरू होता है, जिस दिन हजरत मुहम्मद साहब ने मक्का शहर से मदीना की ओर प्रवास किया था।
हिजरी संवत चांद पर आधारित है...
हिजरी संवत चांद पर आधारित कैलेण्डर है। इस संवत के बाकी के अन्य महीनों की तरह शव्वाल महीना भी 'नया चांद' देख कर ही शुरू होता है। यदि इस महीने का पहला चांद नजर नहीं आता है, तो माना जाता है कि रमजान का महीना अभी पूरा नहीं हुआ है, इसलिए ईद उसके 24 घंटे बाद यानी कि अगले दिन मनाई जाती है।
जकात उल-फितर
मूल रूप से मुसलमानों का त्योहार ईद भाईचारे को बढ़ावा देने वाला पर्व है। इस त्योहार को सभी आपस में मिल के मनाते है और खुदा से सुख-शांति और बरक्कत के लिए दुआएं मांगते हैं। ईद के दिन मस्जिदों में सुबह की प्रार्थना से पहले हर मुसलमान का फर्ज है कि वो दान या भिक्षा दे, इस दान को जकात उल-फितर कहते हैं।
ईद का दिन उत्सव जैसा होता है....
उपवास की समाप्ति की खुशी के अलावा ईद में मुसलमान अल्लाह का शुक्रिया अदा इसलिए भी करते हैं कि उन्होंने महीने भर उपवास रखने की शक्ति दी। ईद का दिन उत्सव जैसा होता है इसलिए इस दिन बढ़िया खाने के अतिरिक्त नए कपड़े भी पहने जाते हैं और परिवार और दोस्तों के बीच तोहफों का आदान-प्रदान होता है। सेवईं इस त्योहार मुख्य खाद्य पदार्थ है, इसी कारण ये 'मीठी ईद' कहलाती है।












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