भूकंप की दृष्टि से कितने सेफ हैं लखनऊ, कानपुर, दिल्ली?

जी हां ''भूकंप''...यानि की जब धरती कांपने लगती है। जो लोगों की धड़कनें बढ़ा देता है। जिसकी वजह से अफरा-तफरी मच जाती है। दरअसल हम ''भूकंप'' का जिक्र इसलिए कर रहे हैं क्योंकि बीते कल उत्तर भारत के कई शहर भूकंप से थर्रा उठे। रिएक्टर स्केल पर भूकंप की तीव्रता 6.8 मापी गई। लेकिन ये कोई पहली दफा नहीं है। इससे पहले भी भूकंप की जद में फंसकर कई शहर तबाह हो गए। जनहानि के साथ ही भूकंप का असर आर्थिक स्थिति पर भी पड़ा।

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फिर वो किसी भी देश में ही क्यों न हो। लेकिन कभी आपने ये जानने की कोशिश की कि यदि भूकंप के तेज झटके दिल्ली और यूपी में आ गए तो क्या होगा। कितनी सुरक्षित है दिल्ली और यूपी। भूकंप के लिहाज से सुरक्षा के लिए क्या उपाय किए गए हैं। हालांकि भूकंप सिर्फ भारत की समस्या नहीं है, ये दुनिया भर के लिए चिंताजनक बात है।

नेपाल का ''डर'' यूपी के ''जहन'' में

बीते साल नेपाल में आए विनाशकारी भूकंप ने सीमावर्ती राज्य उत्तर प्रदेश में खतरे की घंटी बजा दी थी। बाराबंकी, कुशीनगर, संत कबीर नगर और गोरखपुर जिलों में भूकंप के बाद भी कई झटके महसूस किए गए थे। तब भूकंप विशेषज्ञ और भारतीय भू-सर्वेक्षण (जीएसआई) के पूर्व निदेशक वीके जोशी ने आशंका व्यक्त की थी कि उत्तर प्रदेश में बढ़ते शहरीकरण से भविष्य में जानमाल का भारी नुकसान हो सकता है।

जर्जर अवस्था में कानपुर की इमारतें

भूकंप से गर यूपी में नुकसान का आंकलन किया जाए तो सबसे पहल नजर डालते हैं कानपुर शहर पर। सुरक्षा मानकों के हिसाब से गर बात की जाए तो कानपुर का परेड, घंटाघर, मॉल रोड, अफीम कोठी, राखी मंडी में बनी रेलवे कॉलोनी समेत कई पुरानी ईमारतें अपनी जर्जर हालत में पहुंच चुकी हैं।

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अफीम कोठी से सटी हुई राखी मंडी में रेलवे कर्मचारियों को दी गई कॉलोनियों की हालत को कुछ इस हद तक खराब है कि उन में आम तौर पर छत किसी भी वक्त पर गिरती रहती हैं।

तस्वीरें नेपाल, भारत में भूकंप की

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भूकंप की तस्वीरें

भूकंप की तस्वीरें

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हालांकि रेलवे प्रशासन द्वारा कई लोगों से कॉलोनियों को खाली कराने की प्रक्रिया कई बार शुरू की गई। लेकिन और कहीं ठिकाना न होने की वजह से लोग इन्हीं जर्जर कॉलोनियों में रहने को मजबूर हैं। इन सबके इतर बीते कुछ दिनों या फिर कहें हाल में बन रही ईमारतों को महज खर्च की परवाह करने के कारण सुरक्षा मानकों के अनुसार नहीं तैयार कराया जाता। जो कि आगे आने वाले बड़े ''खतरे'' की ओर इशारा करता है।

नवाबों का शहर 'लखनऊ' भी

पिछले साल नेपाल में आए विनाशकारी भूकंप से लखनऊ एवं अन्य पूर्वी क्षेत्रों के लोग हर वक्त डर के साये में जी रहे हैं। चारबाग से कैसरबाग की बात हो या फिर सिकंदरबाग क्षेत्र में बनी कई ईमारतें पुरानी होने की वजह से अपनी जर्जर हालत में पहुंच चुकी हैं। जबकि अमीनाबाद एरिया में बनी ईमारतों को निश्तनाबूत करने के लिए भूकंप का एक तेज झटका कुछ सेंकेंड्स के लिए ही काफी हैं।

इसके बावजूद इनमें बाकायदा दुकानें संचालित हो रही हैं। इन सबके इतर परिवर्तन चौक से हनुमान सेतु के बीच में बने कुछ घर बगैर किन्हीं सुरक्षा मानकों के तैयार कराए गए हैं। ये क्षेत्र सघन आबादी वाले क्षेत्रों के अंतर्गत आते हैं।

जिस वजह से हर वक्त डर का साया बड़ी संख्या में लोगों पर मंडराता रहता है। यह बात सिर्फ लखनऊ या कानपुर तक ही सीमित नहीं है बल्कि यूपी के हर शहर में जर्जर हो चुकी इमारतें मौजूद हैं। जहां पर मजबूरी के चलते लोग रह रहे हैं। साथ ही धड़ल्ले से गैर भूकंपरोधी मानकों के ऊंची ऊंची ईमारतें तैयार की जा रही हैं।

भूकंप से सबसे ज्यादा खतरे में है 'दिल्ली'

दिल्ली में बीते कल ही भूकंप के झटके महसूस किए गए। जिसके कारण दिल्लीवासियों की सांसे कुछ पल के लिए थम गईं। सोशल मीडिया पर दिल्ली में रह रहे लोग सेफ होने का स्टेटस अपलोड करने लगे। जानकार सिस्मिक ज़ोन-4 में आने वाले भारत के सभी बड़े शहरों की तुलना में दिल्ली में भूकंप की आशंका ज़्यादा बताते हैं।

मुंबई, कोलकाता, चेन्नई और बेंगलुरु जैसे शहर सिस्मिक ज़ोन-3 की श्रेणी में आते हैं। भूगर्भशास्त्री कहते हैं कि दिल्ली की दुविधा यह भी है कि वह हिमालय के निकट है जो भारत और यूरेशिया जैसी टेक्टॉनिक प्लेटों के मिलने से बना था और इसे धरती के भीतर की प्लेटों में होने वाली हलचल का खामियाज़ा भुगतना पड़ सकता है।

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वहीं एक मीडिया रिपोर्ट में 'इंडियन एसोसिएशन ऑफ स्ट्रक्चरल इंजीनियर्स' के अध्यक्ष प्रोफ़ेसर महेश टंडन ने बताया है कि दिल्ली में भूकंप के साथ-साथ कमज़ोर इमारतों से भी ख़तरा है।

उन्होंने कहा, "हमारे अनुमान के मुताबिक़ दिल्ली की 70-80% इमारतें भूकंप का औसत से बड़ा झटका झेलने के लिहाज़ से डिज़ाइन ही नहीं की गई हैं। पिछले कई दशकों के दौरान यमुना नदी के पूर्वी और पश्चिमी तट पर बढ़ती गईं इमारतें ख़ास तौर पर बहुत ज़्यादा चिंता की बात है क्योंकि अधिकांश के बनने के पहले मिट्टी की पकड़ की जांच नहीं हुई है"।

सीएसई ने भी किया दिल्लीवासियों को खतरे से आगाह

जी हां सीएसई यानि की सेंटर फॉर साइंस एंड इन्वायरमेंट के मुताबिक दिल्ली की 80 फीसदी इमारतें निर्माण के समय तय मापदंडो के हिसाब से खरी नहीं उतरतीं। यहां हल्का या मध्यम दर्जे का भूकंप गर आता है तो तबाही मचने की आशंका है। इन तमाम बातों को जानने और समझने के बाद जरूरत है अख्तियार बरतने की, भूकंपरोधी इमारत बनाने की। जिससे हम, आप और हम सभी का परिवार सुरक्षित रह सके।

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