वो कुत्ते, जिनसे मोदी कांग्रेस को देशभक्ति सिखाना चाहते हैं...

चुनावों का वक़्त हो और देशभक्ति का ज़िक्र न हो, ऐसा कैसे हो सकता है. कर्नाटक में इन दिनों कुछ ऐसा ही चल रहा है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी प्रदेश के जामखंडी में थे और निशाने पर कांग्रेस थी.

उन्होंने कहा, ''जब कभी हमारे देश में देशभक्ति की बात होती है, राष्ट्रभक्ति, राष्ट्रगीत, वंदे मातरम का ज़िक्र होता है, कुछ लोगों को चिंता हो जाती है.''

क्या कभी किसी ने सोचा होगा कि आज़ादी के बाद कांग्रेस इस हद तक चली जाएगी कि उसके नेता 'भारत के टुकड़े होंगे' जैसे नारे लगाने वालों के बीच जाकर उन्हें आशीर्वाद देंगे.

''मैं जानता हूं कि कांग्रेस का घमंड सातवें आसमान पर पहुंच गया है. देश की जनता ने उन्हें नज़रअंदाज़ कर दिया है लेकिन वो अब भी ज़मीन पर नहीं आए हैं. इसलिए उनसे ये उम्मीद भी नहीं कर सकते कि वो मुधोल कुत्तों से भी सीखें.''

क्यों आया मुधोल कुत्तों का ज़िक्र?

कुत्ते
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उन्होंने कांग्रेस को सलाह दी कि वो कम से कम बगलकोट के मुधोल कुत्तों से सीखे, जो नई बटालियन के साथ मिलकर देश की रक्षा करने जा रहे हैं.

लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशभक्ति के साथ-साथ मुधोल कुत्तों का ही ज़िक्र क्यों किया? इन कुत्तों में ऐसा क्या है, जो उन्हें देशभक्त बताया जाता है? ये इतने ख़ास क्यों हैं?

मुधोल कुत्तों को मुधोल हाउंड या कैरेवन हाउंड भी कहा जाता है. ये भारतीय कुत्तों की वो प्रजाति है, जिसे ये नाम उत्तरी कर्नाटक के बगलकोट ज़िले में पूर्ववर्ती मुधोल साम्राज्य से मिला है, जहां के शासकों ने इन्हें पालना शुरू किया था.

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सबसे ख़ास बात है कि बेहद पतले मुधोल कुत्ते, भारतीय सेना में शामिल होने वाले पहली भारतीय प्रजाति है.

अपने शिकार और रखवाली से जुड़े हुनर के लिए मशहूर मुधोल कुत्ते बेहद तेज़ रफ़्तार होते हैं. उनमें गज़ब की चपलता और स्टैमिना होता है. तेज़ निगाह और सूंघने की क्षमता भी उन्हें ख़ास बनाती है.

क्या ख़ास है इन कुत्तों में?

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इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक इन्हीं गुणों की वजह से इस प्रजाति के पिल्लों के एक समूह को फ़रवरी 2016 में मेरठ में भारतीय सेना के रिमाउंट एंड वेटरनरी कोर (RVC) में लिए गए.

ये पहला मौक़ा था जब किसी भारतीय प्रजाति को ट्रेनिंग के लिए RVC सेंटर में लिया गया. ये जगह लैबराडोर और जर्मन शेफ़र्ड जैसी विदेशी ब्रीड के कुत्तों को प्रशिक्षण देती रही है. ये कुत्ते ट्रेन होकर भारतीय सेना का हिस्सा बनते हैं.

सेना के अधिकारियों के मुताबिक ट्रेनिंग के लिए शामिल होने वाले आठ में से छह कुत्तों को श्रीनगर के हेडक्वार्टर 15 कोर और नगरोटा के हेडक्वार्टर 16 कोर में फ़ील्ड इवाल्यूशन और सुटेबिलिटी ट्रायल के लिए लिया जाता है.

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इन कुत्तों के पश्मी और करवानी भी कहा जाता है. देश के दक्खनी पठार में कई गांवों में भी इन्हें पाला जाता है. इनके सिर बेहद पतले और लंबे होते हैं और कानों के बीच इनका आकार कुछ चौड़ा होता है. जबड़ा लंबा और ताक़तवर होता है.

ऐसा बताया जाता है कि इन कुत्तों को अगर प्यार और सम्मान से पाला जाता है, ये बेहद वफ़ादार साबित होते हैं. हालांकि, ये व्यवहार में ज़्यादा दोस्ताना नहीं होते और उन्हें अजनबी के हाथों छुआ जाना भी पसंद नहीं है.

इतिहास क्या है?

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ये रखवाली के मामले में साधारण कुत्तों से कहीं अलग होते हैं क्योंकि ये सुरक्षा को लेकर बेहद गंभीर और चौकन्ने होते हैं. कर्नाटक के मुधोल कस्बे में करीब 750 परिवार ऐसे हैं, जो इस प्रजाति के पिल्ले पाल रहे हैं, ताकि बड़े होने पर उन्हें बेचा जा सके.

लेकिन ये कुत्ता दक्षिण भारत कैसे पहुंचा, इसकी कहानी भी दिलचस्प है. मध्य एशिया और अरबिया से ये पश्चिमी भारत पहुंचे और कर्नाटक, महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में पाले गए.

मुधोल स्टेट के श्रीमंत राजासाहेब मलोजीराव घोरपड़े को कुत्तों की इस ख़ास प्रजाति पर ग़ौर करने का श्रेय दिया जाता है. उन्हें पता लगा था कि कुछ आदिवासी इन कुत्तों को पाल रहे हैं और उन्हें बेदार नाम दिया गया है, जिसका मतलब निडर होता है.

1900 की शुरुआत में इंग्लैंड के दौरे पर गए मुधोल के महाराजा ने किंग जॉर्ज पंचम को दो ऐसे कुत्ते तोहफ़े में दिए थे.

भारतीय सेना ने मुधोल कुत्तों में दिलचस्पी इसलिए जताई थी क्योंकि उसके मुताबिक ये सर्वेलांस और सीमा सुरक्षा से जुड़े काम में मदद दे सकते हैं.

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