जानिए, क्या पश्चिम बंगाल में बीजेपी की बढ़त ने ममता दीदी को डरा दिया है?
नई दिल्ली- 2019 का लोकसभा चुनाव तृणमूल कांग्रेस के लिहाज से बहुत ही अहम है। कुल सांसदों के हिसाब से उसके पास बीजेपी और कांग्रेस के बाद तीसरे सबसे बड़े दल के रूप में उभरने का मौका है। ऐसा होने पर ममता बनर्जी को किंग या कम से कम किंगमेकर बनाने का अवसर भी हाथ आ सकता है। लेकिन, इसका एक दूसरा पहलू भी है, जो उनकी सारी उम्मीदों पर पानी फेर सकता है। यह चुनौती राज्य में बीजेपी की अप्रत्याशित बढ़त से है। आज की तारीख में खुद दीदी भी मानती हैं कि टीएमसी के लिए बीजेपी सबसे बड़ी चुनौती है। अगर राज्य की सभी 42 लोकसभा सीटों के लिए टीएमसी की ओर से जारी उम्मीदवारों की लिस्ट पर नजर डालें तो साफ लगता है कि दीदी ने सारी चुनावी रणनीति बीजेपी से मुकाबले के लिए ही बनाई है।

टीएमसी के लिए बीजेपी सबसे बड़ी चुनौती
पश्चिम बंगाल में इसबार का लोकसभा चुनाव बीजेपी बनाम टीएमसी होने जा रहा है, यह बात तो पहले से ही स्पष्ट था। ममता बनर्जी में कांग्रेस और लेफ्ट को कोई चुनौती नहीं मान रही हैं। उन दोनों की जगह आज की तारीख में बीजेपी ले चुकी है। वामपंथियों के प्रभाव वाले कई जिलों में बीजेपी काफी मजबूत बनकर सामने आई है। टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के मुताबिक कांग्रेस और लेफ्ट तो खुद को राजनीतिक तौर पर जिंदा रखने के लिए मैदान में खड़ी हैं। उम्मीदवारों की लिस्ट जारी करने के बाद ममता ने खुद कहा है कि 2019 का चुनाव उनके लिए बहुत बड़ी चुनौती है, जिसमें बीजेपी ही उनकी मुख्य विरोधी है। खासकर, जिस तरह से उनके सांसदों अनुपम हजारे और सौमित्र खान एवं चार बार के विधायक अर्जुन सिंह ने पार्टी छोड़कर बीजेपी का दामन थामा है, उसने सियासी तौर पर उन्हें हिलाकर दिया है।
बीजेपी से तो वो इतनी परेशान हैं कि नरेंद्र मोदी के खिलाफ प्रचार के लिए खुद ही वाराणसी जाने की इच्छा जता चुकी हैं। जबकि, वहां पर टीएमसी का कोई वजूद नहीं है। दरअसल, ममता को डर ये लग रहा है कि मुस्लिम बहुल इलाकों में जो बीजेपी ने अपना ग्राफ बढ़ाया है, वह बीजेपी विरोधी मतों को कहीं बांट न दे, जिससे बीजेपी को फायदा मिलने की संभावना है।

इसलिए ममता को बदलनी पड़ी रणनीति
बीजेपी के बढ़ते प्रभाव ने दीदी को अंदर ही अंदर इतने दबाव में ला दिया है कि उन्होंने एक-एक सीट पर उम्मीदवारों को चुनने में बहुत ही सावधानी बरती है। उन्होंने कोई ऐसा जोखिम नहीं लिया है, जो उन्हीं पर भारी पड़ जाए। उनकी इस रणनीति को 3 बिंदुओं से समझा जा सकता है। पहला, लगभग 1/3 मौजूदा सांसद उनके उम्मीदवारों की लिस्ट से गायब हैं। मसलन, 8 मौजूदा सांसदों का टिकट काट लिया है, जबकि दो पार्टी छोड़कर बीजेपी में शामिल हो चुके हैं। दूसरा, उनकी लिस्ट में 2/5 से ज्यादा यानी 42 में से 17 प्रत्याशी या तो पहली बार लोकसभा का चुनाव लड़ेंगे या उनकी सीटें इसबार बदल दी गई हैं।
उदाहरण के लिए टीएमसी के राष्ट्रीय सचिव सुब्रता बक्शी से दक्षिण कोलकाता की प्रतिष्ठित सीट छीनकर कोलकाता नगर निगम की चेयरपर्सन माला रॉय को दे दी गई है। इसी तरह, बांकुरा सीट पर इस दफे बीजेपी कड़ी टक्कर दे रही है, इसलिए वहां पार्टी के दिग्गज नेता और पंचायत पंत्री सुब्रत मुखर्जी को उतारा गया है। गौरतलब है कि 2018 के पंचायत चुनावों में बीजेपी ने बांकुरा,झारग्राम,मिदनापुर और बोलपुर जिलों में ही सबसे ज्यादा बढ़त बनाई थी। इसी तरह एक दशक से बीजेपी के कब्जे में रही सीट दार्जिलिंग पर ममता ने गोरखा जनमुक्ति मोर्चा और स्थानीय विधायक अमर सिंह राय को टिकट दे दिया है। क्योंकि, बिनय तमांग गुट का टीएमसी को समर्थन मिलने से बीजेपी की यह सीट पहले से ही फंसी हुई है।
तीसरा, उन्होंने करीब 41% महिलाओं को टिकट देकर भी सत्ता विरोधी लहर और बीजेपी की आक्रामक लड़ाई की धार कम करने की कोशिश की है। ममता का यह दांव एक और हिसाब से दिलचस्प है कि पिछले 6 लोकसभा चुनावों में पूरे देश में जितनी भी महिलाओं को प्रत्याशी बनाया गया है, उसमें जीतने वालों का औसत पश्चिम बंगाल में सबसे बेहतर रहा है। जैसे-पिछले 6 लोकसभा चुनावों में यहां कुल 182 महिलाओं को उम्मीदवार बनाया गया है, जिसमें से 37 यानी 20% जीतकर लोकसभा पहुंच गईं। यह आंकड़ा देश में सबसे ज्यादा है।

कैसे बदली दीदी के गढ़ की सियासी फिजा?
दरअसल, पंचायत चुनाव के बाद से बंगाल की सियासी फिजा बदली हुई नजर आ रही है। गौरतलब है कि पिछले साल कम से कम 5 आदिवासी बहुल जिलों में से टीएमसी ने कई सीटें बीजेपी के हाथों गंवा दिए थे। इन 5 जिलों में से 3 जंगलमहल और दो उत्तर बंगाल के जिले हैं। झारखंड से सटे झारग्राम, बांकुरा और पुरुलिया जिलों में तो बीजेपी 30 से 40 प्रतिशत तक पंचायत सीटें झटकने में सफल हो गई थी। ऊपर से बीजेपी का हौसला और बढ़ा दिया है, उसी समय हुए महेशतला विधानसभा उपचुनाव ने। वहां पर बीजेपी काफी अंतर से दूसरे नंबर पर तो रही, लेकिन उसका वोट शेयर 8% से बढ़कर सीधे 35% तक पहुंच गया था।
अगर हम इन आंकड़ों को और गौर से पढ़ना चाहें तो पिछले साल राज्य में जिला परिषद की जिन 824 सीटों के लिए चुनाव हुए उनमें टीएमसी के 793 के बाद 22 सीटें झटकने वाली बीजेपी ही रही। जबकि, कांग्रेस को सिर्फ 6 और लेफ्ट को 1 सीट से ही संतोष करना पड़ा। वहीं 9,214 सीटों वाले पंचायत समिति में तो भारतीय जनता पार्टी का प्रदर्शन इससे भी बेहतर रहा। उसमें पार्टी को टीएमसी के 8,062 सीटों के मुकाबले 769 सीटें मिलीं। जबकि, कांग्रेस 133 और लेफ्ट पार्टियों को 124 सीटें ही मिल पाईं। यानी इन दोनों को जोड़ने के बाद भी बीजेपी उनसे कहीं बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी, जिसने आज दीदी का सियासी ब्लड प्रेशर बढ़ा रखा है।












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