क्या भारत के राज्यों में राज्यपाल होने चाहिये?

वहीं एनडीए के इस कदम की कांग्रेस जमकर भर्त्सना कर रही है। एनडीए के हाथ में बाग डोर आते ही राज्यपाल के इस्तीफे देने के विषय पर कांग्रेस ने टिप्पणी करते हुए इसे एकपक्षीय और तानाशाही रवैया करार दिया। लेकिन यहां कांग्रेस यह भूल गई कि 2004 में यूपीए-1 के शासनकाल के दौरान एनडीए शासन के वक्त नियुक्त हुए राज्यपालों को उन्होंने एक झटके से हटा दिया गया था। और इसका कारण सिर्फ आरएसएस पृष्ठभूमि से होना था।
अगर एक दशक पीछे की ओर नजर घुमाएं तो कांग्रेस नियुक्त अधिकतम राज्यपालों में खोट नजर आना कोई बड़ी बात नहीं। दिल्ली की मुख्यमंत्री रह चुकीं शीला दीक्षित का नाम जहां कॉमनवेल्थ घोटाले में उछला था। वहीं, कानून मंत्री रह चुके एच आर भारद्वाज ने भी बोफोर्स घोटाले के केस को बंद करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। जे बी पटनायक भी असम के मुख्यमंत्री बने रहने के दौरान भ्रष्टाचार के दाग से बच नहीं पाए थे।
लिहाजा, प्रश्न यह उठता है कि इस संवैधानिक पद की गरिमा को चोट पहुंचाने वाले इन राज्यपालों की इस देश को अब कितनी दरकार है? जो पद की प्रतिष्ठा के साथ खेलकर सिर्फ अपने मुखिया के आंख और कान बन पद पर स्थापित हैं। साथ ही "न्यूनतम सरकार, अधिकतम शासन" के इस राजनैतिक युग में आज यह एक बड़ा विषय बनकर उभर रहा है कि क्या हमारे राज्यपाल राज्य के मुद्दे में अपना उचित और सकारात्मक योगदान दे रहे हैं?












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