T-20 की मुंबई टीम के कप्तान रहे इस क्रिकेटर को अब चलाना पड़ रहा है ई-रिक्शा!पाई-पाई को है मोहताज
गाजियाबाद, 16 अगस्त: देश में एक से बढ़कर एक टैलेंटेड युवा खिलाड़ी हैं। लेकिन कई हुनरमंद खिलाड़ियों को उतने मौके नहीं मिल पाते कि वह अपना टैलेंट दिखा सकें। कई खिलाड़ी परिस्थितियों और सिस्टम के शिकार हो जाते हैं। आज हम आपको एक ऐसे ही हुनरमंद क्रिकेटर के बारे में बताने वाले हैं। क्रिकेटर का नाम है राजा बाबू। लेकिन राजा एक दिव्यांग क्रिकेटर हैं। 2017 में एक नेशनल लेवल के टूर्नामेंट में राजा बाबू ने 20 गेंदों पर ताबड़तोड़ 67 रन ठोंक डाले थे। लेकिन अब राजा बाबू गाजिबाद की सड़कों पर ई-रिक्शा चलाने को मजबूर हैं।

20 गेदों में ठोंक डाले 67 रन
एनबीटी की खबर के मुताबिक, दिव्यांग क्रिकेटर राजा बाबू इन दिनों गाजियाबाद में ई रिक्शा चलाकर अपने परिवार को गुजारा कर रहे हैं। कभी नेशनल लेवल पर क्रिकेट खेलने वाले राजा ने 2017 में मेरठ में हुए टूर्नामेंट में दिल्ली के खिलाफ यूपी की ओर से खेलते हुए 20 गेदों में 67 रन ठोंक डाले थे। उनके की धुंआधार पारी ने हर किसी का दिल जीत लिया था। इस मैच से उन्हें तारीफों के साथ एक ई रिक्शा भी मिला था। जो अब उनकी कमाई का एक मात्र जरिया है।

2 सालों से गाजियाबाद में ई रिक्शा चलाने को मजबूर
रिपोर्ट्स के मुताबिक, लेफ्ट हेंड विस्फोटक बल्लेबाज राजा बाबू दिव्यांग क्रिकेट सर्किट में स्टेट और नेशनल लेवल के टूर्नमेंट्स में काफी नाम हुआ। इसी बीच 2017 में आईपीएल की तर्ज पर शुरू हुए टी-20 टूर्नामेंट में उन्हें मुंबई टीम का कप्तान भी चुना गया। कोरोना वायरस महामारी ने उनके करियर और जिंदगी दोनो के गर्त में पहुंचा दिया। आर्थिक तंगी झेल रहे राजा बाबू पिछले 2 सालों से गाजियाबाद में ईरिक्शा चलाने को मजबूर हैं।

10-12 घंटों तक रोज चलाते हैं ई रिक्शा
राजा बाबू के चार बच्चों के परिवार में उनकी पत्नी निधि (27) और बच्चे कृष्णा (7) और शानवी (4) है। इनके पालन-पोषण के लिए राजा बाबू गाजियाबाद की सड़कों पर 10-12 घंटों तक ईरिक्शा चलाते हैं। हालांकि कोरोना महामारी से पहले भी क्रिकेट खेलने के दौरान भी राजा बाबू को इधर-उधर का काम करना पड़ता था। लेकिन 2020 के बाद जिंदगी और भी कठिन हो गई।

गाजियाबाद की सड़कों पर दूध बेचा
राजा बताते हैं कि, कोरोना काल में 2020 में आई यूपी में दिव्यांग क्रिकेटर्स के लिए बनी चैरिटेबल संस्था-दिव्यांग क्रिकेट एसोसिएशन (डीसीए) भंग कर दी गई। जिसके चलते वहां से मिलने वाली मदद खत्म हो गई। जिसके बाद राजा बाबू कुछ महीने मैंने गाजियाबाद की सड़कों पर दूध बेचा और जब मौका मिला ई-रिक्शा चलाया। अभी मैं बहरामपुर और विजय नगर के बीच रोज करीब 10 घंटे ई-रिक्शा चलाने को मजबूर हूं ताकि सिर्फ 250-300 रुपये कमा सकूं।

क्रिकेटर को प्राइवेट संस्था कर रही थी मदद
राजा बाबू ने बताया कि, इस पैसे से मेरे घर का खर्च नहीं चल पाता है। जिसके चलते मैं अपने बच्चों को भी नहीं पढ़ा पा रहा हूं। दिव्यांग क्रिकेट एसोसिएशन के कोच अमित शर्मा ने बताया कि,डीसीए उत्तर प्रदेश क्रिकेट एसोसिएशन के अंडर में नहीं थी। इसे चलाने के लिए हमने कुछ लोकल कारोबारियों की मदद और चंदे से एसोसिएशन चलाई। टूर्नमेंट्स के दौरान ट्रांसपोर्ट और खाने का खर्च कवर हो जाता था। मैन ऑफ द मैच की अवार्ड मनी के रूप में उन्हें जो कुछ मिलता था, वही उनकी सैलरी थी।'

जन्म से दिव्यांग नहीं थे राजा बाबू
राजा बाबू जन्म से दिव्यांग नहीं थे। 1997 में स्कूल से घर लौटते वक्त एक ट्रेन हादसे में मैंने बायां पैर खो दिया। उस समय वह कानपुर में अपने परिवार से साथ रहते थे। उनके पिता रेलवे में ग्रेड IV कर्मचारी थे। हादसे के बाद उनकी पढ़ाई भी रुक गई। बाबू ने 12 साल की उम्र से क्रिकेट खेलना शुरू किया था। 2000 में उन्होंने कानपुर में आरामीना ग्राउंड पर ट्रेनिंग शुरू की। 23 साल की उम्र में वह जिला स्तर के टूर्नमेंट्स खेलने लगे। 2013 में वह दिव्यांग क्रिकेट एसोसिएशन से जुड़े।

गाजियाबाद में जूता फैक्ट्री में किया काम
इस दौरान उनकी शादी हो गई। शादी के बाद रोजगार की तलाश में राजा बाबू गाजियाबाद आ गए। जूता बनाने वाली एक फैक्ट्री में 200 रुपये दिहाड़ी पर काम करने लगे। लेकिन क्रिकेट और फैक्ट्री के काम में तालमेल बिठा पाना बहुत मुश्किल हो रहा था। छह महीनों बाद नौकरी छोड़कर सिर्फ क्रिकेट पर फोकस किया। बाबू के शानदार खेल ने हर किसी का ध्यान खींचा। एक समय ऐसा आया कि हर टीम बाबू को अपनी टीम में चाहने लगी। किस्मत चमकी तो यूपी और गुजरात में उन्होंने कुछ अवार्ड्स जीते।

क्रिकेट से इज्जत तो मिली लेकिन पैसा नहीं
2016 में वह नेशनल लेवल के टूर्नमेंट में मैन ऑफ द मैच रहे। बाद में उसी साल बिहार सरकार ने उन्हें खेल के क्षेत्र में योगदान के लिए सम्मानित किया। बाबू ने कहा कि, मैच खेलते हुए मुझे मेडल्स भी मिले और इज्जत भी मगर गुजारे के लिए उतना काफी नहीं था। लेकिन लॉकडाउन ने फिर उन्हें अंधेरे की ओर धकेल दिया। लॉकडाउन के समय राजा और उनका परिवार सड़क पर बांटे जाने वाले खाने के सहारे जिंदा रहा। आज भी बाबू तंगी से गुजर रहे हैं। उन्हें और उनके टैलेंट को मदद की जरूरत है।
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