क्या नेहरू ने यूएन की सुरक्षा परिषद में भारत के बदले चीन को सीट दे दी थी

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चीन ने आतंकवादी संगठन जैश-ए-मोहम्मद के संस्थापक मसूद अज़हर को संयुक्त राष्ट्र से वैश्विक आतंकी घोषित नहीं होने दिया. संयुक्त राष्ट्र के सुरक्षा परिषद में चीन स्थायी सदस्य है और उसने फ़्रांस के प्रस्ताव पर वीटो कर दिया.

चीन ने ऐसा चौथी बार किया है और भारत के लिए इसे बड़े झटके के तौर पर देखा जा रहा है. भारत प्रशासित कश्मीर के पुलवामा ज़िले में 14 फ़रवरी को जैश-ए-मोहम्मद ने सीआरपीएफ़ के एक काफ़िले पर आत्मघाती हमला कर 40 जवानों की जान ले ली थी.

इस हमले की ज़िम्मेदारी ख़ुद जैश ने ली थी और उम्मीद जताई जा रही थी कि इस बार चीन मसूद अज़हर पर भारत के साथ खड़ा होगा.

भारत ने चीन के रुख़ पर दुःख जताया है तो मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस के अध्यक्ष राहुल गांधी ने इसके लिए सरकार पर निशाना साधा है. राहुल ने ट्वीट कर कहा, ''कमज़ोर मोदी शी जिनपिंग से डरे हुए हैं. चीन ने भारत के ख़िलाफ़ क़दम उठाया तो मोदी के मुंह से एक शब्द नहीं निकला.'' राहुल गांधी की इस टिप्पणी पर बीजेपी ने कड़ी आपत्ति जताई है.

क़ानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा कि देश मुश्किल में होता है तो राहुल गांधी को ख़ुशी क्यों होती है? रविशंकर प्रसाद ने कहा, ''चीन की बात राहुल करेंगे तो बात दूर तलक जाएगी.''

प्रसाद ने अपनी प्रेस कॉन्फ़्रेंस में नौ जनवरी 2004 की 'द हिन्दू' की एक रिपोर्ट की कॉपी दिखाते हुए कहा कि भारत के पहले प्रधानमंत्री नेहरू ने संयुक्त राष्ट्र में सुरक्षा परिषद की सीट लेने से इनकार कर दिया था और इसे चीन को दिलवा दिया था.

द हिन्दू की रिपोर्ट में कांग्रेस नेता और संयुक्त राष्ट्र में अवर महासचिव रहे शशि थरूर की किताब 'नेहरू- द इन्वेंशन ऑफ़ इंडिया' का हवाला दिया गया है.

इस किताब में शशि थरूर ने लिखा है कि 1953 के आसपास भारत को संयुक्त राष्ट्र के सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्य बनने का प्रस्ताव मिला था लेकिन उन्होंने चीन को दे दिया. थरूर ने लिखा है कि भारतीय राजनयिकों ने वो फ़ाइल देखी थी जिस नेहरू के इनकार का ज़िक्र था. थरूर के अनुसार नेहरू ने यूएन की सीट ताइवान के बाद चीन को देने की वकालत की थी.

दरअसल, रविशंकर प्रसाद यह कहना चाह रहे थे कि आज अगर चीन यूएन के सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्य है तो नेहरू के कारण और उसी का ख़ामियाजा भारत को भुगतना पड़ रहा है.

हलांकि जो इस बात को लेकर नेहरू की आलोचना करते हैं वो कई अन्य तथ्यों की उपेक्षा करते हैं. संयुक्त राष्ट्र 1945 में बना था और इसे जुड़े संगठन तब आकार ही ले रहे थे. 1945 में सुरक्षा परिषद के जब सदस्य बनाए गए तब भारत आज़ाद भी नहीं हुआ था. 27 सितंबर, 1955 को नेहरू ने संसद में स्पष्ट रूप से इस बात को ख़ारिज कर दिया था कि भारत को सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्य बनने का कोई अनौपचारिक प्रस्ताव मिला था.

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27 सितंबर, 1955 को डॉ जेएन पारेख के सवालों के जवाब में नेहरू ने संसद में कहा था, ''यूएन में सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य बनने के लिए औपचारिक या अनौपचारिक रूप से कोई प्रस्ताव नहीं मिला था. कुछ संदिग्ध संदर्भों का हवाला दिया जा रहा है जिसमें कोई सच्चाई नहीं है. संयुक्त राष्ट्र में सुरक्षा परिषद का गठन यूएन चार्टर के तहत किया गया था और इसमें कुछ ख़ास देशों को स्थायी सदस्यता मिली थी. चार्टर में बिना संशोधन के कोई बदलाव या कोई नया सदस्य नहीं बन सकता है. ऐसे में कोई सवाल ही नहीं उठता है कि भारत को सीट दी गई और भारत ने लेने से इनकार कर दिया. हमारी घोषित नीति है कि संयुक्त राष्ट्र में सदस्य बनने के लिए जो भी देश योग्य हैं उन सबको शामिल किया जाए.''

क्या है इतिहास?

कहा जाता है कि 1950 के दशक में, भारत संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद में चीन को शामिल किए जाने का एक बड़ा समर्थक था. तब यह सीट ताइवान के पास थी.

1949 में पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ़ चाइना के उद्भव के बाद से, चीन का प्रतिनिधित्व च्यांग काई-शेक के रिपब्लिक ऑफ़ चाइना का शासन करता था, न कि माओं का पीपल्स रिपब्लिक ऑफ़ चाइना. संयुक्त राष्ट्र ने पीपल्स रिपब्लिक ऑफ़ चाइना को यह सीट देने से इनकार कर दिया था.

शशि थरूर ने अपनी किताब में लिखा है कि भारत के प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ही थे जिन्होंने संयुक्त राष्ट्र में स्थायी सदस्य बनाए जाने को लेकर पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ़ चाइना की वकालत की.

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नेहरू ने पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ़ चाइना का समर्थन क्यों किया?

कुछ लोगों का मानना है कि नेहरू ने 1950 के दशक में दोनों देशों के बीच तनातनी के मद्देनज़र माओ को ख़ुश करने के लिए ऐसा किया था.

दूसरों का तर्क है कि एशियाई देशों के बीच एकजुटता के लिए नेहरू ने अति उत्साह में दांव ग़लत जगह लगा दी क्योंकि दोनों देशों के इतिहास को देखने पर यह पता चलता है कि चीन और भारत इस ऐतिहासिक यात्रा में साथी रहे हैं.

मौटे तौर पर, कई लोग इसे आदर्शवाद और अंतरराष्ट्रीय संबंधों की हक़ीक़त को लेकर नेहरू के मूल्यांकन में कमी के तौर पर देखते हैं. उनका मानना है कि ताक़त मायने रखती है और इसके लिए समझदारी से काम लेने की ज़रूरत होती है.

द डिप्लोमैट ने अपनी एक रिपोर्ट में लिखा है, ''हालांकि जिन लोगों ने यह तर्क दिया वो संयुक्त राष्ट्र में पीपल्स रिपब्लिक ऑफ़ चाइना को समर्थन देने के पीछे नेहरू के कारणों को जानने में असफल रहे हैं. उन्हें यह नहीं पता कि नेहरू इतिहास के बारे में बहुत पढ़ते थे और राष्ट्रों के बीच शक्ति सामर्थ्य के उनके विचार पर बहुत हद तक आधारित था.''

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नेहरू के रूख़ को समझने के लिए 20वीं सदी में जाना पड़ेगा. उस समय की राजनीति से नेहरू ने यह माना कि बड़ी शक्तियों को अपने मित्रों से दूर नहीं रहना चाहिए, बल्कि उन्हें अंतरराष्ट्रीय संगठनों में शामिल किया जाना चाहिए.

नेहरू का मानना था कि प्रथम विश्व युद्ध के बाद जर्मनी के साथ ग़लत व्यवहार किया गया और अपमान की भावना और बहिष्कार ने उसे एक और असंतुष्ट देश यूएसएसआर के क़रीब ला दिया.

नेहरू इस बात को लेकर स्पष्ट थे कि पीपल्स रिपब्लिक ऑफ़ चाइना कोई साधारण शक्ति नहीं है.

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