डायबिटीज के रोगियों के लिए वरदान, हफ्ते में सिर्फ एक बार लगेगी ये इंसुलिन, जानें कब और कितने में मिलेगी ?
मधुमेह रोगियों के लिए बहुत अच्छी खबर है। डायबिटीज के जिन रोगियों को हर दिन इंसुलिन लेना पड़ता है, उन्हें आने वाले दिनों में एक ही लेने से काम चल सकता है। इसकी ट्रायल भारत में भी चल रही है।

डेनमार्क की एक दवा कंपनी एक ऐसी इंसुलिन बना रही है, जो इसे रोजाना लेने के झंझट से छुटकारा दिला देगी। यह इंसुलिन हफ्ते में सिर्फ एक बार ली जा सकेगी। भारत कंपनी के लिए बहुत बड़ा बाजार है, इसलिए ट्रायल में इसपर काफी फोकस किया गया है। इस समय देश में करीब 8 करोड़ लोग हैं, जो किसी ना किसी रूप में मधुमेह से पीड़ित हैं। इनमें से 50 लाख तो ऐसे हैं, जिन्हें खुद का शुगर लेवल कंट्रोल रखने के लिए इंसुलिन पर निर्भर रहना पड़ता है। ऐसे ही मरीजों के लिए कंपनी यह दवा बना रही है, जो आने वाले समय में बाजार में लॉन्च होने वाली है।

हफ्ते में एक बार लगेगी यह इंसुलिन
डेनमार्क की कंपनी Novo Nordisk भारत में मधुमेह रोगियों के लिए हफ्ते में एक बार लगने वाली इंसुलिन लॉन्च करने वाली है। न्यूज18 डॉट कॉम ने कंपनी के ग्लोबल बिजनेस के मैनेजिंग डायरेक्टर जॉन सी डॉवबेर के हवाले से यह रिपोर्ट दी है। मधुमेह रोगियों के लिए यह खबर किसी वरदान से कम नहीं है। खासकर उनके लिए, जिन्हें रोजाना इंसुलिन लेने की जरूरत पड़ती है। इस दवा को डायबिटीज के नियंत्रण के लिए गेमचेंजर माना जा रहा है। भारत में 7.7 करोड़ से ज्यादा मधुमेह रोगी हैं, जिनमें से 50 लाख ऐसे मरीज हैं, जो इंसुलिन पर निर्भर हैं।

नए ग्रोथ हॉर्मोन पर भी चल रहा है काम
डॉवबेर के मुताबिक कंपनी को ट्रायल से सकारात्मक नतीजे मिलने की उम्मीद है। उनका कहना है कि सच तो यह है कि ट्रायल के लिए भारत में ही बड़े केंद्र काम कर रहे हैं। यह दवा कंपनी भारत में 27 जगहों पर ट्रायल में जुटी है, जिसमें 217 मरीजों पर परीक्षण चल रहा है। डेनमार्ग की इस नामी फार्मा कंपनी ने गुरुवार यानि 16 फरवरी को ही अपनी 100वीं वर्षगांठ मनाई है। नोवो नॉर्डिस्क इंडिया के कॉर्पोरेट वाइस प्रेसिडेंट और एमडी विक्रांत श्रोत्रिय ने कहा है कि उनकी कंपनी हफ्ते में एक बार पड़ने जाने वाले ग्रोथ हॉर्मोन को भी लॉन्च करने की तैयारी में है, इसका लक्ष्य किसी के विकास में हो रही देरी का इलाज करना है।

2025 में बाजार में आएगी एडवांस इंसुलिन
वहीं श्रोत्रिय ने हफ्ते में एक बार लगने वाली इंसुलिन के बारे मे कहा है कि अगर सबकुछ योजना के अनुसार चलता रहा तो उनकी कंपनी साल 2025 की दूसरी तिमाही में इसे बाजार में लाने की तैयारी में है। वे बोले, 'आम तौर पर एक प्रोडक्ट के ग्लोबल या अमेरिकी मार्केट में लॉन्च होने और भारत में लॉन्च होने में 9 महीने से एक साल का अंतर होता है- यह समय भारतीय रेग्यूलेटरी प्रक्रियाओं में लगता है। नहीं तो भारत हमारी वैश्विक योजना का बहुत ही महत्वपूर्ण हिस्सा है।' वो बोले कि 'आखिरकार मैं एक भारतीय हूं और कंपनी का बेस्ट मैं भारत लेकर आऊंगा।' हालांकि हफ्ते में एक बार लगाए जाने वाले ग्रोथ हॉर्मोन के बारे में उनका कहना है कि उसे आने में रेग्यूलेटरी मंजूरी के अलावा एक साल या डेढ़ साल से भी ज्यादा लग सकते हैं।

इंसुलिन की कीमत क्या होगी ?
भारतीय मरीजों के लिए दवा की कीमतें काफी अहमियत रखती हैं। इस तरह के सवालों पर कंपनी के अधिकारी ने कहा कि 'बीमारी को नियंत्रण में नहीं रखने का खर्च, नियंत्रण रखने से 10 गुना ज्यादा है।' श्रोत्रिय का कहना है, '...आज मानवीय इंसुलिन की इलाज का खर्च सड़क किनारे की कॉफी की एक कप से भी कम है।' उन्होंने कहा कि 'जब भी हम कोई नई खोज लॉन्च करते हैं, तो हम यह सुनिश्चित करते हैं कि पूरे विश्व में कीमतें नॉर्मल प्राइस बेंचमार्क में रहें। हम कीमतों का ध्यान रखते हैं और कीमतों को उस दायरे के भीतर रखा जाता है, जो एक इकोनॉमिक जोन में आने वाले सभी देशों को स्वीकार्य हैं। ' उन्होंने तर्क दिया कि अगर कोई व्यक्ति डायबिटीज को नियंत्रित नहीं रखता है तो क्या होगा। उसे शुगर घटने की वजह से अस्पताल जाना पड़ेगा। उन्होंने कहा, 'दो दिन अस्पताल में रहने का खर्च या शुगर नहीं कंट्रोल रहने के परिणाम स्वरूप पैर काटने, किडनी खराब होने, हृदय रोग या स्ट्रोक जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है, जो कि दवा की कीमतों से ज्यादा पड़ेगी।'
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भारत के लिए कंपनी की योजना
नोवो नॉर्डिस्क के दोनों अधिकारियों ने कहा कि कंपनी के विकास में भारत का बहुत ही अहम रोल है। डॉवबेर ने बताया, '7.7 करोड़ मधुमेह रोगियों की वजह से भारत हमारे लिए बहुत ही महत्वपूर्ण बाजार है।' उनकी कंपनी के लिए ऑस्ट्रेलिया के बाद एशिया प्रशांत में भारत दूसरा सबसे बड़ा बाजार है। उनके मुताबिक 140 करोड़ की आबादी में से 8 करोड़ से ज्यादा लोगों को डायबिटीज है। डायबिटीज के क्षेत्र के वर्ल्ड लीडरों को भारत के लोगों के लिए अच्छी, प्रभावी और हर संभव नए और बेहतर उपचार तेजी से लाने की जिम्मेदारी है। उनका दावा है कि भारत के 35 लाख लोग उनकी दवाओं के भरोसे हैं। उनका यह भी दावा है कि कंपनी के राजस्व में भारत का योगदान सिर्फ 1% है, जबकि दुनियाभर में कंपनी पर निर्भर रहने वाले मरीजों में भारत के मरीजों की संख्या 8% है। (तस्वीरें- सांकेतिक)












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