नजरें नहीं थीं फिर भी निगाहें थीं हमेशा लक्ष्य पर, स्ट्रॉन्ग माइंडसेट से राजशेखर को मिली जीत
नई दिल्ली। हुनर को कभी किसी दिए की जरूरत नहीं होती अंधेरे दूर करके वो रोशनी की ओर खुद ही खुद बढ़ते जाते हैं। कितनी भी मुश्किलें क्यों न हो न बस उनका तो माइंडसेट होता है। इसलिए वह अपने लक्ष्य की तरफ बढ़ते जाते हैं बढ़ते ही जाते हैं। अगर किसी की आंखों की रोशनी न हो तो जाहिर सी बात है कि उसके सामने अंधेरा ही अंधेरा होगा लेकिन दुनिया में कुछ लोग ऐसे होते हैं जो आंखों से नहीं दिल-दिमाग से देखते हैं। ऐसा ही एक उदाहरण हैं आंध्र प्रदेश के रहने वाले राजशेखर जी। राजशेखर जी एक ऊर्जावान इंसान हैं और लाइफ में सिर्फ आगे की ओर बढ़ना ही जानते हैं।

ब्रेन टयूमर होने के बाद भी सीए बनने का सपना संजोए रहे
गुंटूर आंध्र प्रदेश के राजशेखर जन्म से अंधे नहीं थे। जब वो Fifth स्टेंडर्ड में पढ़ते थे तो इतनी उम्र में उन्हें ब्रेन टयूमर हो गया था। डॉक्टर ने तत्काल प्रभाव से टयूमर को उनके दिमाग से अलग कर दिया गया। टयूमर तो निकल गया लेकिन इसका असर कहीं न कहीं तो पड़ना ही था। एक समय 11 क्लास में पहुंचने के बाद उनके आंखों का विजन चला गया। उन्होंने स्कूल छूट गया लेकिन उन्हें आगे बढ़ने से कोई नहीं रोक सका।
ब्रेल लिपि के अभाव में लेक्चर्स सुनते और रिकॉर्ड करते
पढ़ाई पूरी करने के बाद एक समय ऐसा आया जब वो उस्मानिया यूनिवर्सिटी में बीकॉम भी करने गए। उन्होंने सीए एंटे्स एग्जाम की तैयार शुरू की। इसके लिए वह रोजना हैदराबाद जाया करते थे। ब्रेल लिपि में लिखी किताबें मिलना आसान नहीं था। टीचर्स के लेक्चर्स सुनते, रिकॉर्ड करते और तब जाकर एग्जाम की तैयारी करते । उनकी मदद एक एनजीओ ने भी की जो उनके लिए स्टडी मटीरियल प्रोवाइड करता था।
नहीं हारे दोबारा कोशिश की और बन गए "सीए"
राजशेखर ने 2013 में सीए का अपना पहला अटेंप्ट किया और असफल रहे। दोबारा उठे और सेकेंड अटेंप्ट में उन्होंने एग्जाम दिया और इस बार वह अपने इरादों में कामयाब रहे। उन्होंने सीए बनकर आज अपने बचपन से संजो रहे सपने को आखिरकार पूरा कर लिया और तमाम लोगों को सीख दे डाली। कहती है कि अगर आपके पास कुछ करने के लिए तो आगे बढ़ते रहे।












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