दिल्ली प्रदूषण: क्या इस तरह मिलेगी धुएं से राहत?
दिल्ली में बीते कई दिनों से जारी वायू प्रदूषण की समस्या के चलते इस हवा में सांस लेना हानिकारक हो चुका है. दिल्ली सरकार ने बीते दिनों स्मॉग की समस्या सामने आने के बाद स्कूलों को एक हफ़्ते के लिए बंद रखने का आदेश जारी किया था. लोगों को काम के लिए घर से बाहर निकलने से पहले मास्क यूज़ करने की सलाह दी जा रही है.
सीएसई ने अपनी हालिया रिपोर्ट में बताया है कि भारत में जन्म से पहले मरने वाले 30 फ़ीसदी बच्चों की मौत के लिए वायू प्रदूषण को ज़िम्मेदार बताया है.
इस सबके बीच एक अहम सवाल ये है कि दिल्ली समेत देशभर में रहने वाले बूढ़े, बच्चे और जवान आख़िर किस तरह अपने आपको वायू प्रदूषण से सुरक्षित रख सकते हैं.
क्या मास्क है एक बेहतर विकल्प?
दिल्ली समेत दुनियाभर में वायू प्रदूषण से बचाव के लिए मुंह ढकने वाले मास्क को एक बेहतर विकल्प माना जाता है.
दिल्ली में स्मॉग सामने आने के बाद भी मास्क की बिक्री में उछाल देखा गया था. बाजार में इस समय अलग-अलग तरह के कई मास्क मौजूद हैं.
आईएमए के अध्यक्ष के के अग्रवाल बताते हैं, "वह फिल्टर जो हवा में तैरने वाले 99 फीसदी पार्टिकल्स को फिल्टर करते हैं उन्हें 99 रेटिंग मिलती है. इसी तरह 95 फीसदी फिल्टर करने की क्षमता करने वाले मास्क को 95 रेटिंग दी जाती है. इसमें एन-95, एन-99 और एन-100 रेटिंग वाले मास्क आते हैं जो वायू प्रदूषण से बचाते हैं."
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"एन सिरीज़ के मास्क के साथ एक अच्छी बात ये है कि इनकी नियत समयसीमा नहीं होती और ये तब तक इस्तेमाल किया जा सकता है जब तक इससे सांस लेने में समस्या ना हो."
अग्रवाल कहते हैं, "एन सिरीज़ के मास्क सूक्ष्म कणों से बचाने में सक्षम हैं लेकिन ट्रैफिक से जुड़े प्रदूषण से बचाव में सक्षम नहीं हैं. इसके साथ ही सर्ज़िकल और धुले जा सकने वाले कपड़ों से बना मास्क वायु प्रदूषण से बचाने में सक्षम नहीं हैं."
क्या मास्क से बेहतर होगी ये डिवाइस?
आईआईटी दिल्ली के पूर्व छात्रों ने वायू प्रदूषण से बचने के लिए एक डिवाइस बनाई है. इसे प्रयोग करते समय आपको मास्क की तरह अपना पूरा चेहरा ढकने की ज़रूरत नहीं होती है.
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ऐसा बताया जा रहा है कि नैसोफ़िल्टर नाम की ये डिवाइस पूरी तरह जैविक रूप से विघटित होने वाले मैटेरियल से बनी है. इस डिवाइस में पीएम 2.5 प्रदूषक को रोकने की क्षमता है.
किसने बनाई है ये डिवाइस?
डिवाइस को बनाने वाले आईआईटी के पूर्व छात्र प्रतीक शर्मा ने इस मुद्दे पर बीबीसी से बात की है.
शर्मा का दावा हैं, "ये एक फेस मास्क नहीं, एक पैच जैसा है जो सीधे आपकी नाक पर चिपक जाता है. सामान्य लोगों के लिए सांस लेने में रुकावट 4 मिलीबार से कम होनी चाहिए लेकिन इस डिवाइस में ये रुकावट 0.4 मिलीबार है. वहीं, मास्क में सांस लेने में होने वाली रुकावट 1.5 मिलीबार होती है."
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डिवाइस के प्रभावी होने की वजह
प्रतीक शर्मा का दावा हैं, "ये डिवाइस मास्क से अलग है क्योंकि मास्क में डेप्थ फिल्टरेशन तकनीक का इस्तेमाल होता है जिसका मतलब ये है कि फिल्टर की कई पर्तें मास्क पार्टिकल्स को इकट्ठा करती हैं. इससे मास्क के छेद बंद हो जाते हैं. लेकिन इस डिवाइस में हमने नैनो फाइबर की 2 डी लेयर बनाई है जिसके ऊपर सरफेस फिल्टरेशन की तकनीक इस्तेमाल की गई है. जब भी धूल के कण इससे टकराते हैं तो 2 डी लेयर को पार कर ही नहीं पाते. इसके बाद जैसे ही व्यक्ति सांस बाहर निकालता है तो धूल के कण वापस हवा में मिल जाते हैं. इस तरह ये ऑटो क्लीनिंग तकनीक की तरह है."
हाल ही में आईआईटी के कुछ पूर्व छात्रों ने भी एम्स के साथ मिलकर एक दूसरी डिवाइस को बनाने का दावा किया है जिसे बच्चों के लिए बनाया गया है.
साल 2012 में आईआईटी से मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने वाले योगेश अग्रवाल ने अपने कुछ अन्य साथियों के साथ मिलकर एयरलेंस नाम की डिवाइस बनाई है.
योगेश अग्रवाल ने बीबीसी से बात करते हुए दावा किया, "हमारा समाधान डिवाइस को इस्तेमाल करने वालों को उनकी जगह से जुड़ा डेटा उपलब्ध कराता है. मॉलिक्युलर तकनीक पर आधारित हमारी डिवाइस नाक पर लगाई जा सकती है. हमने ये डिवाइस बच्चों के लिए बनाई है क्योंकि एम्स के निदेशक डॉ. रणदीप गुलेरिया हमारे मेंटॉर हैं. उन्होंने हमें बच्चों के लिए एक डिवाइस बनाने के लिए प्रेरित किया. हमारी डिवाइस ISO-10993 और मेडिकल डिवाइसों पर यूरोपीय निर्देशों 93/42/EEC (CE प्रामाणिकता) के मानकों पर आधारित है."
क्या बाजार में उपलब्ध हैं ये डिवाइसें?
मास्क के विकल्प के रूप में सामने आने वाली ये डिवाइसें अभी तक बाजार में मौजूद नहीं है.
यूसूफ सराय बाजार में स्थित मेट्रो कैमिस्ट पर काम करने वाले देव पांडे ने बीबीसी को बताया, "कई लोग पूछते हुए आए हैं कि 10 रुपये का फ़िल्टर आपके पास आया है या नहीं. लेकिन हमें अब तक इसके बारे में ज़्यादा नहीं पता है और ये डिवाइस हमारी और नज़दीकी दुकानों पर मौजूद नहीं है."
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