राष्ट्रपति के गार्ड सिर्फ इन 3 जातियों के क्यों?, दिल्ली हाईकोर्ट ने सेना और सरकार को जारी किया नोटिस

नई दिल्ली। दिल्ली हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार और थल सेनाध्यक्ष से एक याचिका पर जवाब मांगा है। जिसमें आरोप लगाया गया है कि राष्ट्रपति के अंगरक्षक की भर्ती में केवल तीन जातियों को ही शामिल किया जा रहा है। जस्टिस एस मुरलीधर और संजीव नरूला की बेंच ने याचिका पर रक्षा मंत्रालय, सेनाध्यक्ष, राष्ट्रपति के अंगरक्षक निदेशक और सेना भर्ती के कमांडेंट को नोटिस जारी किया है। कोर्ट ने सभी को चार सप्ताह को भीतर जबाव दाखिल करने के लिए कहा है।

तीन जातियों के जवानों की नियुक्ति क्यों?

तीन जातियों के जवानों की नियुक्ति क्यों?

इन सभी विभागों में से कोई भी अगली तारीफ से पहले भी अपना जबाव दाखिल कर सकता है। दिल्ली हाईकोर्ट ने इस मामले की अगली सुनवाई की तारीख 8 मई 2019 रखी है। शुक्रवार को धारूहेड़ा निवासी युवक गौरव यादव की याचिका पर दिल्ली हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार को नोटिस आफ मोशन जारी किया है। अब फरवरी में केंद्र सरकार को दिल्ली हाईकोर्ट में अपना पक्ष रखकर इस बात का जवाब देना होगा कि आखिर राष्ट्रपति के अंगरक्षक नियुक्त होने का अधिकार सिर्फ तीन जातियों के जवानों को ही क्यों दिया जा रहा है?

राष्ट्रपति के अंगरक्षक भर्ती मामले में केंद्र को नोटिस

राष्ट्रपति के अंगरक्षक भर्ती मामले में केंद्र को नोटिस

अदालत हरियाणा निवासी गौरव यादव ने राष्ट्रपति के अंगरक्षक की 4 सितंबर, 2017 हुई भर्ती पर सवाल खड़े किए थे। इस भर्ती में केवल तीन जातियों - जाटों, राजपूतों और जाट सिखों को भर्ती के लिए आमंत्रित किया था। याचिकाकर्ता ने कहा कि वह अहीर / यादव जाति से संबंधित है और राष्ट्रपति के अंगरक्षक भर्ती के सभी पात्रता मानदंडों को पूरा करता है। सिर्फ जाति को छोड़कर। उसे इस पद के लिए भर्ती किया जाए।

भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 का पूर्ण उल्लंघन

भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 का पूर्ण उल्लंघन

वकील राम नरेश यादव के माध्यम से दायर याचिका में कहा गया है कि, सिर्फ तीन जातियों को ही इस भर्ती के मान्यता दी गई है। जबकि इस पद के लिए योग्य अन्य जातियों के उम्मीदवारों को भर्ती में शामिल नहीं किया गया है। भर्ती का पालन किया जाने वाली वर्गीकरण मनमाना है। जो जाति के आधार पर किया जाता है। यह नियम भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 का पूर्ण उल्लंघन करता है। इसके अलावा, भर्ती प्रक्रिया अनुच्छेद 15 (1) का उल्लंघन करती है, जो जाति, धर्म, जाति, लिंग, रंग और जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव पर रोक लगाती है।

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