रिपोर्टरों पर केस करने को लेकर हाई कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला, मानहानि का दावा करने वालों हो जाओ सावधान!

दिल्ली की सर्द हवा के बीच अदालत से आया एक ऐसा फैसला जिस पर पूरे मीडिया जगत की नजर टिक गई। एक दशक से ज्यादा पुराने लेख पर चली लंबी कानूनी लड़ाई आखिर खत्म हो गई है। अदालत ने साफ शब्दों में कहा कि खबर लिखने का मकसद सच सामने लाना होता है, न कि किसी की छवि खराब करना। यह फैसला न केवल पत्रकारों के अधिकारों को मजबूत करता है, बल्कि यह भी बताता है कि सच बोलना कभी अपराध नहीं हो सकता।

दिल्ली हाई कोर्ट (Delhi High Court) ने पत्रकार नीलांजना भौमिक के खिलाफ चल रहे मानहानि केस को खत्म कर दिया है। यह केस 2010 में टाइम्स मैगज़ीन में छपे एक लेख को लेकर था। कोर्ट ने साफ कहा कि अगर किसी खबर में दिए गए तथ्य सही हों, तो उसे मानहानि नहीं कहा जा सकता। कोर्ट ने माना कि पत्रकार का काम ही होता है कि वह तथ्य जनता तक पहुंचाए, और अगर रिपोर्टिंग सही हो तो उस पर आपराधिक कार्रवाई नहीं हो सकती।

Delhi High Court

लेख में NGO सेक्टर पर उठे सवाल

यह मामला उस लेख से जुड़ा था जिसमें भारत में काम कर रहे कई NGOs की कार्यप्रणाली और उन पर उठे सवालों का जिक्र था। लेख में साउथ एशिया ह्यूमन राइट्स डॉक्यूमेंटेशन सेंटर (SAHRDC) और उसके डायरेक्टर रवि नायर का नाम भी आया था। संगठन ने दावा किया कि लेख में ऐसी बातें कही गईं जो उन्हें गलत तरीके से वित्तीय गड़बड़ी से जोड़ती हैं। इसी आधार पर 2014 में पत्रकार के खिलाफ मानहानि केस दायर किया गया।

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लेक की सच्चाई पर कोर्ट की मुहर

हाई कोर्ट ने लेख को ध्यान से पढ़कर कहा कि उसमें दिए गए तथ्य पूरी तरह सही थे। लेख में कहीं भी यह नहीं कहा गया था कि SAHRDC पर कोई आरोप साबित हुआ है या किसी जांच में उन्हें दोषी पाया गया है। लेख का उद्देश्य सिर्फ यह बताना था कि कुछ NGOs को लेकर सरकारी स्तर पर सवाल उठे थे और इस मुद्दे पर बड़े स्तर पर चर्चा चल रही थी।

कोर्ट ने कहा कि किसी बात का सच होना ही मानहानि न होने का सबसे बड़ा प्रमाण है। अगर तथ्य सही हों, तो सिर्फ इसलिए केस नहीं बनता कि किसी व्यक्ति या संस्था को वह बात अच्छी न लगी हो।

चार साल की देरी भी बनी वजह

इस मामले में एक और अहम बात यह रही कि शिकायत दर्ज करने में चार साल की देरी हुई। लेख 2010 में ही छप चुका था और ऑनलाइन भी उपलब्ध था, लेकिन शिकायत 2014 में की गई। कोर्ट ने कहा कि इतनी देरी का कोई ठोस कारण नहीं दिया गया। इसलिए यह मामला समय-सीमा के हिसाब से भी चल नहीं सकता था। इसी आधार पर भी केस को खत्म करना जरूरी था।

समन आदेश भी रद्द

हाई कोर्ट ने 2018 में ट्रायल कोर्ट द्वारा जारी समन आदेश को रद्द कर दिया और पूरे आपराधिक मुकदमे को खत्म कर दिया। इसके साथ ही नीलांजना भौमिक के खिलाफ चल रही सारी कार्यवाही बंद कर दी गई।

पत्रकारिता पर अदालत का स्पष्ट संदेश

इस फैसले ने यह साफ कर दिया कि पत्रकार अगर सही और तथ्य आधारित रिपोर्टिंग करते हैं, तो उन्हें मानहानि जैसे मामलों में घसीटा नहीं जा सकता। अदालत ने कहा कि कानून का दुरुपयोग कर किसी पत्रकार को परेशान नहीं किया जा सकता, और देरी करके दाखिल की गई शिकायतों को भी मान नहीं दिया जा सकता।

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