OPINION: केजरीवाल की ताकत बने झुग्गी-बस्ती के वोटर्स!
OPINION: राजधानी दिल्ली इस वक्त अपने इतिहास की सबसे कड़ी चुनावी जंग का मंच है, क्योंकि आम आदमी पार्टी (AAP), भारतीय जनता पार्टी (BJP) और कांग्रेस विधानसभा चुनावों में एक-एक वोट के लिए जोरशोर से प्रतिस्पर्धा कर रही हैं। 70 सीटों पर लड़ाई जीतने के लिए प्रचार की रणनीतियां अपने चरम पर पहुंच गई हैं। इस बार के चुनाव में सबसे ज्वलंत मुद्दा दिल्ली में झुग्गी-बस्तियों में रहने वाले लोगों का है। एक दौर था जब झुग्गी में निवास करने वाले मतदाताओं का समर्थन कांग्रेस के साथ था, लेकिन बदलते राजनीतिक परिदृश्य के साथ समीकरण भी बदल गया।
पिछले कुछ सालों में अरविंद केजरीवाल की नेतृत्व वाली आम आदमी पार्टी ने इन समुदायों के बीच एक अच्छी पैठ बना ली है, जिसका श्रेय काफी हद तक पिछले दशक में लागू की गई उनकी जनकल्याणकारी योजनाओं को जाता है। ये वो समुदाय है जिन्हें दो वक्त की रोटी और जिंदगी जीने के लिए बुनियादी शर्तों के लिए भी लड़ाई लड़नी पड़ती है।

झुग्गियों में रहने वाले गरीब मतदाता आम आदमी पार्टी की ताकत हुआ करते थे। दिल्ली सरकार की मुफ्त बिजली-पानी जैसी योजनाओं का लाभ इन्हें ही मिलता था। इन गरीब परिवारों की औरतें जब काम के लिए बाहर निकलती हैं तो उसे दिल्ली की बसों में मुफ्त सफर करने को मिलता है जो इनके लिए एक बड़ी राहत है। साथ ही दिल्ली सरकार ने सरकारी स्कूलों में परिवर्तन किया, इसका भी सीधा लाभ इन गरीब परिवारों को मिला। यही वजह है कि ये मतदाता केजरीवाल के साथ डंके की चोट के साथ खड़े रहे।
चनावी सभा हो या पार्टी का कार्यक्रम अरविंद केजरीवाल इन मतदाताओं को एक मैसेज जरूर पहुंचाते हैं कि अगर बीजेपी सत्ता में आई तो आपकी झुग्गियां उजार दी जाएगी और मुफ्त में मिलने वाली सारी योजनाओं को बंद कर देगी। वैसे इस बार कांग्रेस और बीजेपी भी इन मतदाताओं के बीच पैठ बनाने की पुरजोर कोशिश में लगी हुई है। बीते दिनों आप के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल ने शकूर बस्ती के Slum इलाके का दौरा भी किया था। उन्होंने आश्वासन दिया था कि 'AAP' के रहते झुग्गियों को कोई हाथ नहीं लगा सकता। आम आदमी पार्टी ने बीजेपी पर निशाना साधते हुए कहा है कि भाजपा केवल दिखावे की राजनीति कर रही है।
इस बार दिल्ली की सियासी लड़ाई काफी दिलचस्प हो गई है। वादों और दावों के बीच सभी दल झुग्गी बस्ती वालों को अपने पक्ष में करने की कोशिश कर रही है। दिल्ली की आबादी की तुलना में इन समुदायों का आंकड़ा करीब 30 प्रतिशत होता है। अब तो अगले महीने 8 तारीख को ही पता चलेगा कि ये झुग्गी वाले किसके वादों अमल करती है।
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