शख्स ने भेजा मैसेज- 'सर मेट्रो में बैग खो गया, उसमें मां के हाथ की रोटियां थी', DCP ने खोज निकाला
डीसीपी जितेंद्रमणि त्रिपाठी ने दिल जीतने वाला काम किया है...
नई दिल्ली। 'हैलो सर, इतनी रात में आपको मैसेज करने के लिए मैं माफी चाहता हूं, लेकिन मेरा एक बैग वैशाली से द्वारका जाने वाली मेट्रो के अंदर खो गया है। बैग में मेरी मां के हाथ की बनी सत्तू की रोटियां हैं, प्लीज उसे पाने में मेरी मदद करिए।' डीसीपी जितेंद्रमणि त्रिपाठी अपने पर्सनल नंबर पर रात करीब 10 बजे ये वॉट्सऐप मैसेज देखकर पहले तो चौंक गए, लेकिन अगले ही पल उन्होंने अपनी टीम को इस बैग को खोजने के निर्देश दे दिए। कुछ देर की खोजबीन के बाद बैग मिल गया और उसके मालिक को सौंप दिया गया। सुनने में ये घटना भले ही छोटी लगे, लेकिन डीसीपी जितेंद्रमणि त्रिपाठी के इस दिल जीतने वाले काम की चर्चा पूरी दिल्ली में हो रही है। आइए जानते हैं कि क्या था पूरा मामला।

क्या है पूरी कहानी
जितेंद्रमणि त्रिपाठी, नई दिल्ली में रेलवे और मेट्रो सेवाओं के डीसीपी के तौर पर नियुक्त हैं। डीसीपी त्रिपाठी ने अपने फेसबुक पेज पर एक पोस्ट के जरिए इस पूरे मामले की जानकारी दी है। दरअसल, यह मामला शुक्रवार रात का है। डीसीपी जितेंद्रमणि त्रिपाठी ने अपनी पोस्ट में लिखा, 'मैं सोने जा रहा था कि तभी मुझे रात में एक वॉट्सऐप मैसेज आया कि मेरा बैग मेट्रो में छूट गया है और बैग में मेरी मां के हाथ की बनी सत्तू की रोटियां हैं। नंबर अंजान शख्स का था और रात करीब 9:54 बजे मैसेज आया था, तो मैंने तुरंत अपने स्पेशल स्टाफ, कंट्रोल रूम और जो हमारा मेट्रो यूनिट का ग्रुप है, जिसमें सभी एसएचओ सदस्य हैं, इस मैसेज को फॉरवर्ड कर दिया।'

डीसीपी त्रिपाठी ने अपनी टीम से क्या कहा
डीसीपी जितेंद्रमणि त्रिपाठी ने आगे लिखा, 'बैग की तलाश के लिए निर्देश देने के बाद कंट्रोल रूम से मेरे पास फोन आया और मुझे बताया गया कि शिकायतकर्ता से बात हो गई है, उसके बैग में केवल उसका रात का खाना और कुछ घर की बनी हुई रोटियां हैं। ये सुनने के बाद मैं निर्देश दिया कि उस शख्स के लिए उसका बैग बहुत जरूरी है और उसे खोजने का प्रयास करें। अगर बैग मिल जाए तो तुरंत उस व्यक्ति तक पहुंचाएं, ये बहुत ही पुण्य का काम होगा।'

आखिरकार बैग मिल गया
जितेंद्रमणि त्रिपाठी ने अपनी पोस्ट में बताया, 'कुछ देर बाद स्पेशल स्टाफ ने मुझे फोन पर जानकारी दी कि सर बैग मिल गया है और इसकी सूचना शिकायतकर्ता को दे दी गई है, वो अपना बैग लेने आ रहे हैं। शिकायतकर्ता को बैग मिल गया और इसके बाद मैंने उनसे पूछा कि जिस नंबर पर आपने मैसेज किया, वो मेरा निजी नंबर है, आपको वो नंबर कैसे मिला और आप मुझे कैसे जानते हैं?'

डीसीपी त्रिपाठी को कैसे जानता था शख्स?
डीसीपी त्रिपाठी की पोस्ट के मुताबिक, 'शख्स ने बताया कि सर इलाहाबाद विश्वविद्यालय परिवार का एक वॉट्सऐप ग्रुप है, जिसमें आप भी मेंबर हैं। वहीं से आपके बारे में जानकारी मिली और मैंने आपको मदद के लिए मैसेज किया। खैर, उस शख्स को उसका बैग मिल गया और उसे उसका बैग लौटाकर मुझे, मेरी टीम को काफी संतुष्टि मिली। शख्स का नाम ऋषभ था, जिसकी मां के हाथ की बनी रोटियां उसे वापस मिल गईं।' इस पोस्ट के बाद से डीसीपी जितेंद्रमणि त्रिपाठी की हर कोई तारीफ कर रहा है।

10 महीनों से अपने घर नहीं गए थे ऋषभ
जितेंद्रमणि त्रिपाठी को मैसेज करने वाले ऋषभ बिहार के छपरा जिले के रहने वाले हैं और इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन करने के बाद साउथ दिल्ली के साकेत में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं। ऋषभ पिछले 10 महीनों से अपने घर नहीं गए थे। ऋषभ के एक मित्र जब छपरा से दिल्ली के लिए आ रहे थे तो उनकी मां ने सत्तू की बनी रोटियां, गुंजिया और कुछ अन्य खाने का सामान अपने बेटे के लिए पैक कर दिया। शुक्रवार को ऋषभ ने अपने दोस्त से वो बैग लिया और लक्ष्मी नगर से साकेत आने के लिए मेट्रो में चढ़ गए। राजीव चौक पर जब ऋषक्ष मेट्रो बदलने के लिए उतरे तो उनका बैग ट्रेन में ही छूट गया था।












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