तो ये है ‘गुजरात मॉडल’ का विद्रुप चेहरा!

गुजरात में दलितों की रक्षा के लिए अधिकारियों की नाकामी निश्चित रूप से चौंकाने वाली है। अब हालात सवाल कर रहे हैं कि क्या यही गुजरात मॉडल है? पिछले दिनों चार दलित युवकों को गुजरात में कपड़े उतारकर पीटा गया था। गुजरात के उना शहर में उन युवकों को अर्द्धनग्न कर जिस स्पोर्ट्स यूटिलिटी व्हीकल (एसयूवी) से बांधा गया वह हमारी अर्थव्यवस्था की रफ्तार का प्रतीक है।

Gujarat Dalit

महिंद्रा की ज़ाइलो की कीमत साढ़े आठ लाख से साढ़े दस लाख के बीच है। इसी ज़ाइलो से बांधकर दलित युवकों को शहर में अर्द्धनग्न कर घुमाया गया और लाठियों से कई बार मारा गया। गांव में मारा गय। फिर शहर लाकर मारा गया, ताकि शहर भी देखे। दलित युवकों की पीठ पर बरसती लाठियों की आवाज़ बता रही थी वह तमाम सदियां और दस्तूर अभी ज़िन्दा हैं, जिनमें दलित कभी ज़िन्दा नही। दलित के हर आवाज़ को दबाकर उनके स्वाभिमान को कुचला जा रहा था।

पीठ की कोई कीमत नहीं

प्रतीत हो रहा था कि दलित की पीठ की कोई कीमत नहीं। उसके स्वाभिमान-सम्मान की कोई कीमत नहीं। उसकी नागरिकता की कोई कीमत नहीं। कीमत उस ज़ाइलो एसयूवी की है, जिस पर एक भी लाठी नहीं लगती। कई दिन से उनकी पीठ पर बरसती लाठियां की आवाज़ गूंज रही हैं, मगर हमारा समाज उसे संगीत समझकर झूम रहा है। क्या यह लड़ाई अकेले दलित की है? क्या उन युवाओं की पीठ पंचायत का चबूतरा है, जहां कोई भी दबंग बैठकी लगाकर जम जाए?

वह लाठी बता रही है कि हमारे बीच क्रूरता मौजूद है। हमारी चुप्पी बता रही है कि हम उस क्रूरता से सहमत हैं और दलित की पीठ, लात और लाठी के लिए बनी है। क्या यह तस्वीर काफी नहीं है कि ग़ैर-दलित समाज अपने भीतर की इस धार्मिक और सांस्कृतिक क्रूरता के ख़िलाफ चीत्कार उठे। इन सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या इसी गुजरात मॉडल की बात करके वर्ष 2014 में नरेन्द्र मोदी चुनाव जीते थे। ये तमाम इस प्रकार के सवाल हैं, जिसका जवाब सबसे पहले देश प्रधानमंत्री से मांगेगा, बाकी लोगों से बाद में।

समुदाय में भड़का आक्रोश

भारत के गुजरात राज्य में दलितों की पिटाई के बाद इस समुदाय के बीच भड़का आक्रोश शांत नहीं हो रहा है जबकि दूसरी ओर इस मुद्दे पर राजनीति भी गर्मा गई है। पिछले दिनों गुजरात में अहमदाबाद सहित कई भागों में दलितों ने हिंसक प्रदर्शन किए इस दौरान 2 लोगों की मौत हो गई। सूचना के अनुसार पथराव के दौरान एक हेड कांस्टेबल की मौत हो गई जबकि कुछ दलितों ने ज़हर खाकर आत्म हत्या की कोशिश की जिनमें से एक की जान चली गई। दलित समुदाय के लोगों ने सरकारी परिवहन बसों पर हमला किया।

ज्ञात रहे कि गुजरात के उना स्थित गिर-सोमनाथ ज़िले में कथित तौर पर एक गाय का चमड़ा उतारने को लेकर 11 जुलाई को दलित समुदाय के लोगों को गाड़ी में बांध कर बहुत बुरी तरह पीटा गया और उन्हें शहर में घुमाया गया तथा इस घटना की वीडियो क्लिप भी सोशल मीडिया पर डाली गई। पुलिस के अनुसार अमरेली कस्बे में गए स्थानीय अपराध शाखा के हेड कांस्टेबल वहां हुए पथराव में घायल हो गए। लेकिन राजकोट अस्पताल में उपचार के दौरान उनकी मौत हो गई।

उधर, पुलिस के अनुसार तीन युवकों ने जूनागढ़ जिले के बातवा कस्बे में स्थित अपने निवास स्थान पर ज़हर खाकर खुदकुशी करने का प्रयास किया। बाद में उनमें से एक व्यक्ति की मौत हो गई। राजकोट जिले के धोराजी कस्बे में एक बस को आग लगा दी गई और कुछ अन्य को क्षतिग्रस्त किया गया, प्रदर्शनकारियों ने कथित रूप से राजकोट में बस रैपिड ट्रांजिट सिस्टम बीआरटीएस के बस स्टैंड में तोड़ फोड़ की। विपक्षी कांग्रेस ने उना घटना की न्यायिक जांच कराने की मांग है। इस वक्त स्वतंत्र जांच की आवश्यकता है।

सड़क पर उतरे हार्दिक पटेल

गुजरात के पटेल आंदोलन के नेता हार्दिक पटेल ने उना घटना के विरोध में प्रदर्शन कर रहे दलितों के समर्थन की घोषणा की है। गुजरात की मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल ने भी घटना की निंदा की और लोगों से शांति बनाए रखने की अपील की। उन्होंने कहा कि यह वास्तव में एक घृणित कृत्य है और कोई समुदाय इसे बर्दाश्त नहीं कर सकता। स्थानीय पुलिस की भी ग़लती है क्योंकि उन्होंने तत्परता से कार्रवाई नहीं की। दोषियों को गिरफ्तार करने के अलावा हमने ऐसे पुलिसकर्मियों को निलंबित कर दिया, जिन्होंने कार्रवाई में लापरवाही बरती थी। राज्य सरकार प्रत्येक पीड़ित को चार लाख रुपये का मुआवजा देगी।

सरकार ने सीआईडी जांच के आदेश दिए हैं और युवकों के इलाज़ का खर्च उठाने का वादा किया है। भाजपा के वरिष्ठ नेता और केन्द्रीय मंत्री वैंकइया नाइडू के इस बयान की भी आलोचना हो रही है कि इस प्रकार की घटनाएं देश में हो जाती हैं इस पर राजनीति नहीं करनी चाहिए। काबिलेगौर है कि गुजरात में तथाकथित गौरक्षक दल के सदस्यों द्वारा 4 दलित युवकों की पिटाई का वीडियो वायरल होने और दलितों के उग्र प्रदर्शनों के बाद स्थिति तनावपूर्ण है। गुजरात के सौराष्ट्र इलाक़े में वेरावल, राजकोट, सुरेंद्र नगर और गोंडल में हिंसक प्रदर्शनों का सिलसिला जारी है।

गौरतलब है कि बीते हफ्ते गुजरात की उना तहसील के दलडी और मोतिसर गांव में मरी हुई गाय को उठाने गए दलित युवकों की गौरक्षक दल के लोगों ने बेरहमी से पिटाई की। सरकार और पुलिस के रवैये से आहत दलित समुदाय के 7 लोगों ने आत्महत्या की कोशिश की। प्रशासन से नाराज़ दलित समुदाय के लोगों ने विरोध जताने के लिए सौराष्ट्र के सुरेंद्र नगर और गोंडल में सरकारी दफ़्तरों के सामने ट्रकों में भरकर मरी हुई गायों के शव एकत्रित कर दिए।

किस बात का तिरंगा सप्ताह

भारत आज़ादी की आजादी के करीब 70 वर्ष हो गए हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपनी पार्टी से कहा है कि वे तिरंगा सप्ताह मनाएं। गली-गली में तिरंगा रैली निकालें। सवाल उठ रहा है कि किसके लिए निकलेगी तिरंगा रैली? कब तक हम ऐसे राष्ट्रवादी आयोजनों की आड़ लेकर इन सवालों से बचेंगे।

कब तक हम आंख से आंख मिलाकर बात नहीं करेंगे कि आज भी दलित को वह जगह नहीं मिली, जहां मिलनी चाहिए। संविधान से उसे अधिकार और संरक्षण नहीं मिला होता तो आज़ाद भारत का समाज उनके साथ क्या करता, गुजरात की घटना प्रमाण है। उसके बाद भी जो हो रहा है, उससे ज़्यादा क्रूर होता। आप लोकतंत्र के नौटंकीबाज़ सोशल मीडिया को खंगालकर देखिए। वहां जातिवाद और संप्रदायवाद किस कदर ज़िन्दा है।

गुलामी तो खत्‍म हुई ही नहीं

सब अपने जातिवाद को बचाने के लिए तिरंगे और राष्ट्रवाद का सहारा ले रहे हैं। हम अपने पूर्वाग्रहों के गुलाम हैं। हम अपने भीतर की नफरतों के ग़ुलाम हैं। हम आज़ाद नहीं हैं। सिर्फ दलित ही क्यों निकलते हैं दलित हिंसा के ख़िलाफ। मीडिया भले गुजरात में प्रदर्शनों को जितना व्यापक बता ले, मगर हकीकत यही है कि इस व्यापकता में भी दलितों का अकेलापन झलक रहा है। लोकसभा में अनुसूचित जाति और जनजाति के 100 से भी अधिक सांसद हैं।

इन सांसदों ने भी दलितों को अकेला छोड़ दिया है। ये सभी नाम तो बाबा साहब का लेते हैं, मगर बाबा साहब जिनका नाम लेते थे, बस उनका ही नाम नहीं लेते। दलितों की पीठ पर आज़ाद भारत की मानसिक ग़ुलामी की लाठी बरस रही है। गुजरात के कुछ दलित युवकों ने ज़हर पीकर आत्मविलोपन करने का प्रयास किया है। उन्हें समाज, संसद और सरकार से सवाल करना चाहिए। गुजरात ही नहीं, बिहार से लेकर यूपी तक क्यों है हमारे ख़िलाफ इतनी नफरत।

राहुल गांधी और केजरीवाल भी

'गोरक्षा' के नाम पर गुजरात में दलितों की पिटाई का मुद्दा लगातार गरमाता जा रहा है। 20 जुलाई को इस मुद्दे की गूंज संसद में देखी गई। लोकसभा में पीएम मोदी की मौजूदगी में हंगामा हुआ। गुजरात में दलितों की पिटाई के बाद वहां दलित समुदाय में भारी गुस्सा है। राज्यसभा में बहुजन समाज पार्टी और कांग्रेस के सांसदों ने इस मुद्दे पर तत्काल बहस की मांग की। कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी 21 जुलाई को और आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल का 22 जुलाई को इन पीड़ितों से मिलने जाएंगे।

यूं कहें कि गुजरात में कथित गौ-रक्षकों के हाथों दलित युवकों की पिटाई का मुद्दा तूल पकड़ रहा है। चमड़ा उद्योग से जुड़े चार युवकों को एक कार से बांधकर गो रक्षकों ने पिटाई का वीडियो ऑनलाइन पोस्ट करने के बाद बाद पूरे देश में गुस्से की लहर दौड़ गई। बहरहाल, अब देखना यह है कि गुजरात की इस घटना का असर क्या होता है और सरकार दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई में कितनी तत्परता दिखा पाती है?

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