कच्चा तेल 14 साल के सबसे महंगे स्तर पर, कैसे संभाल पाएगी सरकार, इकोनॉमी का क्या होगा?

नई दिल्ली, 8 मार्च। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे बाजार की कीमतें आसमान छू रही हैं। सोमवार को कच्चे तेल के दाम 140 डॉलर प्रति बैरल पहुंच गए जो 14 साल का सर्वोच्च स्तर था। इधर यूक्रेन में चल रही जंग के चलते यूरोपीय देश रूस से गैस और तेल की निर्भरता कम करने पर विचार कर रहे हैं ऐसे में कच्चे के तेल की कीमत कभी भी 147.50 डॉलर के रिकॉर्ड उच्च स्तर को पार कर सकती है।

भारत की अर्थव्यवस्था पर बढ़ेगा बोझ

भारत की अर्थव्यवस्था पर बढ़ेगा बोझ

कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों से भारत की अर्थव्यवस्था पर भी बोझ बढ़ने वाला है खासतौर पर जब भारत अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए आयात पर बहुत अधिक निर्भर है। देश की लगभग 86 प्रतिशत कच्चे तेल की आवश्यकता आयात के माध्यम से पूरी की जाती है। ऐसे में देश के आयात बिलों में वृद्धि होना तय है। व्यापार घाटा देश के चालू खाते की शेष राशि पर दबाव को और बढ़ाएगा।

आरबीआई के नवीनतम आंकड़ों के अनुसार भारत ने 2021-22 की दूसरी तिमाही में चालू खाता घाटा $9.6 बिलियन या सकल घरेलू उत्पाद का 1.3 प्रतिशत दर्ज किया। वित्तीय वर्ष 2021-22 की पहली तिमाही में भारत ने चालू खाता अधिशेष $6.6 बिलियन दर्ज किया था जो सकल घरेलू उत्पाद का 0.9 प्रतिशत था।

हाल के महीनों में व्यापार घाटा बढ़ा है। इससे चालू खाते के घाटे में तेज उछाल आने की उम्मीद है। हालांकि तेल की बढ़ती कीमतों से केवल चालू खाता अधिशेष ही प्रभावित नहीं होगा बल्कि भारतीय अर्थव्यस्था पर इसका व्यापक प्रभाव पड़ने वाला है।

आर्थिक विकास को होगा नुकसान

आर्थिक विकास को होगा नुकसान

कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि से मुद्रास्फीति बढ़ेगी और जिसका सीधा असर आर्थिक विकास की गतिविधियों पर पड़ेगा।

रूस-यूक्रेन संघर्ष के चलते गैस, खाद्य तेल, उर्वरक और कोयले जैसी अन्य वस्तुओं की कीमतों में भी उछाल आया है। इससे भारत के आयात बिल में 35 अरब डॉलर की बढ़ोतरी हो सकती है। कच्चे तेल और अन्य वस्तुओं का उच्च आयात बिल के चलते मुद्रास्फीति में कम से कम एक प्रतिशत की वृद्धि होने का अनुमान है।

राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (एनएसओ) द्वारा पिछले महीने जारी आंकड़ों के अनुसार मुद्रास्फीति जनवरी 2022 में बढ़कर 6.01 प्रतिशत हो गई, जो पिछले महीने 5.66 प्रतिशत थी। खुदरा महंगाई ने सात महीनों में पहली बार आरबीआई के 6 फीसदी के टॉलरेंस बैंड की ऊपरी सीमा को पार कर लिया है। वहीं थोक मूल्य सूचकांक (WPI) आधारित मुद्रास्फीति जनवरी में 12.96 प्रतिशत रही।

सरकार के अनुमान से दोगुने पर कीमत

सरकार के अनुमान से दोगुने पर कीमत

31 जनवरी को वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा संसद में पेश किया गया आर्थिक सर्वेक्षण, अप्रैल 2022 से शुरू होने वाले वर्ष के लिए सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि 8 से 8.5 प्रतिशत की है, यह मानते हुए कि 2022-23 के दौरान कच्चे तेल की कीमतें औसतन $ 70 से $ 75 प्रति बैरल होंगी।

यहां इस बात को ध्यान में रखना होगा कि वित्त मंत्री ने संसद में पेश आर्थिक सर्वेक्षण में अप्रैल 2022 से शुरू होने वाले वित्तीय वर्ष के लिए सकल घरेलू उत्पाद में 8 से 8.5 प्रतिशत वृद्धि का अनुमान लगाया गया है। इसके पीछे यह माना गया था कि कच्चे तेल की कीमतें औसतन 70 से 75 डॉलर प्रति बैरल होंगी।

आज तेल की कीमतें सरकार के अनुमान के लगभग दोगुने स्तर पर हैं।

300 डॉलर तक जा सकते हैं कच्चे तेल के दाम

300 डॉलर तक जा सकते हैं कच्चे तेल के दाम

वहीं रूस ने चेतावनी दी है कि अगर अमेरिका और यूरोपीय देश रूसी तेल के आयात पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगाते हैं तो कच्चे तेल की कीमत 300 डॉलर प्रति बैरल तक बढ़ सकती है। कच्चे तेल की कीमत पिछले एक साल में दोगुने से ज्यादा हो गई है। रूस द्वारा 24 फरवरी को यूक्रेन में सैन्य अभियान शुरू करने के बाद से इसमें 30 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि हुई है।

ब्रेंट क्रूड ऑयल, जो दिसंबर 2020 में 50 डॉलर प्रति बैरल से कम था, 7 मार्च को बढ़कर 140 डॉलर प्रति बैरल हो गया। ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमत अप्रैल 2020 में कोरोना महामारी के दौरान 16 डॉलर प्रति बैरल के निचले स्तर पर पहुंच गई थी।

अगर 2022-23 के दौरान कच्चे तेल की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर रहती है, तो यह भारत के बजट गणित को काफी परेशान करेगा। केंद्रीय बजट 2022-23 में किए गए लगभग सभी मैक्रो-इकोनॉमिक अनुमानों पर इसका काफी प्रभाव पड़ेगा।

सरकार के पास क्या हैं विकल्प?

सरकार के पास क्या हैं विकल्प?

जहां तक कच्चे तेल की ऊंची कीमतों के प्रबंधन की बात है इसे लेकर दो संभावनाएं हैं। पहली, कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि का भार उपभोक्ताओं पर पेट्रोल, डीजल और अन्य पेट्रोलियम उत्पादों की खुदरा कीमतों में वृद्धि के तौर पर दिया जाए।

दूसरी संभावना यह है कि सरकार अंतिम उपयोगकर्ता पर बोझ देने के बजाय पूरे तेल की कीमत के झटके को सहन कर ले। इससे घाटे में वृद्धि होगी। अगर सरकार अपनी राजकोषीय और अन्य घाटे की प्रतिबद्धताओं को बनाए रखने का फैसला करती है, तो उसे सामाजिक कल्याण और बुनियादी ढांचे के विकास जैसे क्षेत्रों पर खर्च कम करना होगा।

देश में बढ़ सकते हैं तेल के दाम

देश में बढ़ सकते हैं तेल के दाम

भारत में पिछले चार महीने से डीजल और पेट्रोल के खुदरा दाम नहीं बढ़ाए गए हैं। विश्लेषकों का कहना है कि तेल विपणन कंपनियों, जो सरकार के नियंत्रण में हैं, ने राज्य चुनावों के कारण नवंबर 2021 से डीजल और पेट्रोल की खुदरा कीमतों में वृद्धि नहीं की है। ऐसा कहा जा रहा है कि इन दामों को न बढ़ाने के पीछे सरकार की तरफ से अनाधिकारिक फरमान था। चूंकि पांच राज्यों में चुनाव अब खत्म हो चुके हैं, इसलिए तेल की कीमतों में बाद की बजाय जल्द ही बढ़ोतरी की जाएगी।

Notifications
Settings
Clear Notifications
Notifications
Use the toggle to switch on notifications
  • Block for 8 hours
  • Block for 12 hours
  • Block for 24 hours
  • Don't block
Gender
Select your Gender
  • Male
  • Female
  • Others
Age
Select your Age Range
  • Under 18
  • 18 to 25
  • 26 to 35
  • 36 to 45
  • 45 to 55
  • 55+