Covid 19: ऐसे रोगियों पर इबोला मेडिसिन का इस्तेमाल कर सकता है भारत?
नई दिल्ली। भारत गंभीर कोरोना वायरस रोगियों पर इबोला के प्रकोप के दौरान इस्तेमाल की गई रेमेडिसविर नामक दवा का इस्तेमाल Covid19 के खिलाफ कर सकता है। दरअसल, न्यू इंग्लैंड जर्नल ऑफ मेडिसिन में प्रकाशित एक अध्ययन रेमेडिसविर के उपयोग और परामर्श के बारे में बताता है। यही नहीं, कोरोना वायरस के खिलाफ लड़ाई के संबंध में इबोला मेडसिन के उपयोग से कुछ अनुकूल रिजल्ट सामने आए हैं।

बताया जा रहा है कि गंभीर Covid-19 रोगियों के लिए गिलियड साइंसेज इंक की प्रायोगिक दवा रेमेडिसविर के प्रारंभिक विश्लेषण में इसका भरोसा जगा है। अस्थायी ही सही, लेकिन उम्मीद है कि Covid19 वायरस के लिए जल्द पहला उपचार किया जा सकता है।

इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (ICMR) के निदेशक डॉ रमन गंगाखेडकर ने संकेत दिए है कि भारत विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) द्वारा सुझाए गए इस दवा के 'एकजुटता' क्लिनिकल परीक्षणों पर ध्यान रख रहा है। ऐसा एक परीक्षण किया गया तो ऑक्सीजन सहायता और वेंटिलेटर पर निर्भर तीन गंभीर Covid -19 रोगियों में से दो मरीजों में सुधार के संकेत मिले।

ICMR के निदेशक डॉ रमन गंगाखेडकर ने कहा कि रेमेडिसविर एक ऐसी दवा है जो इबोला के प्रकोप में इस्तेमाल की जा रही थी। यह दवा covid -19 वायरस के उत्परिवर्तन पर काम करती है, जिसके कारण शोधकर्ताओं का मानना है कि यह काम कर सकता है। हालांकि ICMR निदेशक ने स्पष्ट किया कि यह एक क्लीनिकल परीक्षण नहीं था।

उनके मुताबिक अध्ययन एक क्लीनिकल नहींं बल्कि एक निगरानी परीक्षण था। कुछ लोग जिन्हें दवा दी गई है, उनकी जांच की जा रही है। यह पाया गया कि 68 फीसदी, या 3 में से 2 रोगियों को दवा के बाद वेंटीलेटर सहयोग या ऑक्सीजन सहयोग की आवश्यकता नहीं थी।

उन्होंने बताया कि ये वो मरीज थे, जिन्हें घातक SARS-CoV-2 संक्रमण की पुष्टि हुई थी। अध्ययन में शामिल करीब 200 मरीजों को रेमेडिसविर का डोज लगातार 10 दिन तक दिया गया था। रिपोर्ट के अनुसार मरीजों को 9 दिनों के उपचार के लिए रोजाना 100 मिलीग्राम प्रतिदिन के हिसाब से मिलीग्राम दिया जाता है।

न्यू इंग्लैंड जर्नल ऑफ़ मेडिसिन स्टडी रिपोर्ट कहती है कि यह रिपोर्ट 25 जनवरी, 2020 से 7 मार्च, 2020 तक की अवधि के दौरान रेमेडिसविर के डोज रिसीव करने वाले रोगियों के डेटा पर आधारित है और उनमें कम से कम 1 दिन का डेटा क्लीनिकल है।

पत्रिका आगे कहती है कि जिन 61 मरीजों को रेमेडिसविर की कम से कम एक खुराक मिली, उनमें से 8 मरीजों के डेटा का विश्लेषण नहीं किया जा सकता था। (जिसमें 7 मरीज बिना पोस्ट-ट्रीटमेंट वाले थे और 1 मरीज की खुराक में त्रुटि थी) जिन 53 रोगियों के डेटा का विश्लेषण किया गया, उनमें से 22 संयुक्त राज्य अमेरिका में, 22 यूरोप या कनाडा में और 9 जापान में थे।

बेसलाइन पर परीक्षण में शामिल कुल 30 रोगियों (57 फीसदी) को यांत्रिक वेंटिलेशन प्राप्त हो रहा था और 4 (8 फीसदी) को एक्सट्राकोरपोर्म झिल्ली ऑक्सीकरण प्राप्त हो रहा था। 18 दिनों के मध्यकाल के दौरान 36 रोगियों (68 फीसदी) ने ऑक्सीजन में सुधार किया था, जिसमें शामिल 30 में से 17 मरीज (57 फीसदी) यांत्रिक वेंटीलेशन प्राप्त कर रहे थे।

अध्ययन के बाद परीक्षण में शामिल कुल 25 रोगियों (47 फीसदी) को छुट्टी दे दी गई थी जबकि 7 रोगियों (13 फीसदी) की इस दौरान मौत हो गई थी। न्यू इंग्लैंड जर्नल ऑफ मेडिसिन में प्रकाशित अध्ययन में कहा गया है कि आक्रामक वेंटिलेशन प्राप्त करने वाले मरीजों में से (34 में से 6) की मृत्यु दर 18 फीसदी थी और आक्रामक वेंटिलेशन प्राप्त नहीं करने वालों में मृत्युदर (19 में से 1) 5 फीसदी थी )।

आईसीएमआर निदेशक डॉ रमन गंगाखेडकर ने कहा कि रेमेडिसविर दवा गिलियड कंपनी द्वारा निर्मित उत्पाद है। ICMR विश्व स्वास्थ्य संगठन के साथ एकजुटता परीक्षण में भाग ले रही है। इसके अलावा एक और धड़ा भी कारेमेडिसविर की प्रभावकारिता पर काम कर रहा है। उन्होंने कहा कि एक बार जब हम आगे बढ़ेंगे तो अन्य दवा कंपनियां भी इस दवा को बना सकती हैं।
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