कोविड-19 के लक्षणों के बावजूद कई लोगों की टेस्ट रिपोर्ट निगेटिव क्यों आ रही है ?
नई दिल्ली, 1 मई: देश में कोरोना के नए संक्रमण के मामले हर दिन रिकॉर्ड तोड़ रहे हैं। आरटी-पीसीआर टेस्ट की मांग बहुत ही ज्यादा बढ़ी हुई है, सैंपल लेने से लेकर टेस्ट रिपोर्ट देने तक में कई-कई दिन लग जा रहे हैं। कई जगहों पर टेस्ट किट कम पड़ जाने की शिकायतें मिल रही हैं। कई लैब वाले टेस्ट करने को लेकर हाथ खड़े कर रहे हैं। लेकिन, इन सब परेशानियों के बीच एक और बात है जो बहुत बड़ी चिंता की वजह बन चुकी है। जानकारी के मुताबिक कोविड-19 के लक्षणों वाले करीब 20 फीसदी लोग ऐसे सामने आ रहे हैं, जिनकी टेस्ट रिपोर्ट निगेटिव आ (फॉल्स निगेटिव) रही है। इसका नतीजा ये हो रहा है कि गंभीर रूप से बीमार मरीजों को भी वक्त पर इलाज नहीं मिल पा रहा है, जिससे वायरस के संक्रमण का खतरा तो बढ़ ही गया है, कई मरीज समय पर सही उपचार के अभाव में दम तक तोड़ रहे हैं। गलत निगेटिव रिपोर्ट के इस ट्रेंड ने एम्स के डायरेक्टर डॉक्टर रणदीप गुलेरिया जैसे एक्सपर्ट को भी यह सलाह देने को मजबूर कर दिया है कि जिन मरीजों में कोरोना के पूरे लक्षण दिखाई पड़ रहे हैं, उनके आरटी-पीसीआर टेस्ट के परिणाम चाहे कुछ भी रहें उनका इलाज होना जरूरी है।

इन चार बातों पर निर्भर है रिपोर्ट की गुणवत्ता
मतलब साफ है कि तकरीबन सवा साल से जिस आरटी-पीसीआर टेस्ट को कोविड-19 का पता लगाने का सबसे स्टैंडर्ड टेस्ट माना जाता था, वह भी अब पुख्ता हो इसकी कोई गारंटी नहीं है। अभी तक इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) आरटी-पीसीआर टेस्ट में सिर्फ 5 फीसदी मामलों में ही गलत (फॉल्स निगेटिव) रिपोर्ट की उम्मीद करता था और 95 फीसदी मामलों में उसे पूरी तरह से पुख्ता मानता था। सैद्धांतिक तौर पर आरटी-पीसीआर टेस्ट की सटीकता चार बातों से तय होती है- रोगी का वायरल लोड, सैंपल लेने और उसे प्रोसेस करने की प्रक्रिया, टेस्ट किट की गुणवत्ता और टेस्ट की विवेचना का बेंचमार्क।

वायरल लोड
आमतौर पर कोविड-19 इंफ्केशन 5वें दिन तक चरम पर होता है। इससे पहले अगर किसी व्यक्ति का टेस्ट हो तो उसकी रिपोर्ट निगेटिव आने की संभावना रहती है। लेकिन, इस समय जो फॉल्स निगेटिव के मामले सामने आ रहे हैं, उसकी मुख्य वजह ये नहीं हो सकती। क्योंकि, कोविड-19 के कई म्यूटेंट पहले के मुकाबले बहुत जल्द ही लक्षण दिखाने शुरू कर देते हैं। कोरोना के लक्षण वाले जिन मरीजों का आरटी-पीसीआर टेस्ट फॉल्स निगेटिव बताता है उसकी बीमारी की पुष्टि बीएएल टेस्ट से की जाती है, जिसमें ब्रोनकोस्कोप के जरिए लोअर रेस्पिरेटरी ट्रैक्ट से सैंपल लिया जाता है। इसका अर्थ है कि कोरोना के कई म्यूटेंट का नाक और गले से लिए गए सैंपल से पता नहीं लग पाता है, जो कि आरटी-पीसीआर टेस्ट का मूल आधार है। यानी ऐसे मामलों में इस टेस्ट से वायरल लोड का पता नहीं चल पाता।

लैब पर क्षमता से ज्यादा भार!
पिछले साल जनवरी में भारत में कोरोना टेस्ट की सिर्फ एक लैब थी, उसी साल फरवरी में इसकी संख्या 14 हुई और आज की तारीख में यह बढ़कर 2,400 से ज्यादा हो चुकी है। इसका मतलब ये हुआ कि इतनी संख्या में लैब के लिए हजारों टेक्नीशियन को जल्दीबाजी में कोविड के लिए आरटी-पीसीआर टेस्ट की ट्रेनिंग मिली है। सुरक्षा के मद्देनजर पिछले साल जुलाई में आईसीएमआर ने क्वालिटी कंट्रोल के लिए 30 लैब को मंजूरी दी थी और आगे चलकर ऐसे 8 लैब और बढ़ाए गए। हालांकि, इंडियन एक्सप्रेस की एक खबर के मुताबिक तीन राज्यों में वास्तव में कुछ ही प्रयोगशालाओं और उसके उपकरणों की निगरानी समय पर हो पाई है। आईसीएमआर इंस्टीट्यूट के एक वैज्ञानिक ने बताया जो कि मीडिया में बोलने के लिए अधिकृत नहीं हैं, 'आदर्श रूप से पॉजिटिव और निगेटिव सैंपल को रैंडमली लेकर उसका लैब में फिर से जांच होनी चाहिए। क्या कभी ऐसा हुआ? हां। क्या यह लगातार होता रहा ? नहीं।' इसको लेकर जुटाए गए आंकड़ों के बारे में आईसीएमआर और कई क्वालिटी कंट्रोल लैब ने चुप्पी साधे रखी है।

मानवीय पहलू
सैंपल लेने से लेकर, उसे रखने और लैब तक पहुंचाने में कई जगह गलती होने की आशंका रहती है। सभी आरटी-पीसीआर किट में एक इंटर्नल कंट्रोल होता है, ताकि जब आरएनए नहीं निकल पाए तो फॉल्स निगेटिव आने की आशंका को रोका जा सके। अगर सिंथेटिक आरएनए का पता नहीं लग पाता है तो टेस्ट को शून्य माना जाता है और दोबारा से जांच करने को कहा जाता है। लेकिन, मुंबई के एक मोलेक्यूलर बायोलॉजिस्ट का कहना है कि भारतीय बाजारों में उपलब्ध आरटी-पीसीआर किट सस्ते इंटर्न कंट्रोल का इस्तेमाल करते हैं। यानी गलत निगेटिव आने की आशंका इस वजह से भी हो सकती है।

ये भी हो सकते हैं कारण
कोरोना वायरस का पता लगाने के लिए आरटी-पीसीआर टेस्ट कुछ खास क्षेत्र पर फोकस करता है, जिसमें एक या अधिक वायरल जीन का पता चलता है। लेकिन, अगर वायरस का म्यूटेशन हो चुका है तो इसकी वजह से फॉल्स निगेटिव आने की आशंका रहती है। हालांकि, भारत में जो टेस्ट किए जा रहे हैं, उसमें म्यूटेशन की वजह से चकमा खाने की आशंका कम होती है। लेकिन, अमेरिका में जिस तरह से आरटी-पीसीआर टेस्ट पर म्यूटेशन के असर की निगरानी की व्यवस्था लगातार काम करती है, उसका अपने यहां अभाव है, क्योंकि यहां इसके लिए 200 से ज्यादा तरह की आरटी-पीसीआर टेस्ट को मंजूरी मिली हुई है और सबको साथ के साथ मॉनिटर करना बहुत ही मुश्किल है।












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