बदलते वैरिएंट के बीच क्या अब नई कोरोना वैक्सीन की जरूरत? जानिए एक्सपर्ट्स की राय
coronavirus vaccine: कोरोना के बदलते वैरिएंट के बीच एक नई चर्चा ने जन्म दे दिया कि अब नई वैक्सीन बनाने का वक्त आ गया है।

पूरी दुनिया में 'कोहराम' मचाने वाले कोरोना वायरस से आज भी तीन साल बाद मौतों का सिलसिला जारी है। कोरोना हर बार अपना रूप बदलकर अटैक करता है। अब ओमिक्रोन के सबवेरिएंट से दुनिया सहित भारत में फिर से केस बढ़ने लगे हैं।
ओमिक्रोन के सबवेरिएंट XBB.1.16 ने फिर से चिंता बढ़ा दी। क्योंकि कोरोना की कई लहरों को झेलने के बाद जो शांति आई थी, उसे इस वैरिएंट ने बिगाड़ दी है। ऐसे में अब बूस्टर डोज पर भी चर्चा हो रही है, क्योंकि इससे पहले भी कोरोना के नए वैरिएंट से बचने के लिए बूस्टर डोज पर जोर दिया गया था।
बूस्टर डोज पर भी सवाल?
कई विशेषज्ञों ने इस पर सहमति जताई है कि एक चौथी खुराक गंभीर संक्रमण की आशंकाओं को काफी हद तक कर सकती है, जबकि कई एक्सपर्ट्स इसकी सुरक्षा और प्रभाव के बारे में संदेह कर रहे हैं। ऐसा इसलिए कि अब तक जो भी वैरिएंट सामने आए है, उन्होंने वैक्सीन और बूस्टर डोज के चुके लोगों को भी संक्रमित किया है।
कोरोना के अलग-अलग वैरिएंट काफी हद तक वैक्सीन की प्रभावकारित पर भी सवाल उठाती है। इन सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए कई लोगों का मानना है कि 'अगली पीढ़ी' के टीके के बारे में सोचने का सही समय है। ऐसे में सवाल उठता है कि हमें अब नई वैक्सीन की जरूरत क्यों है?
500 से ज्यादा वैरिएंट
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने बताया है कि वर्तमान में दुनिया भर में ओमिक्रॉन वैरिएंट सहित 500 से ज्यादा वैरिएंट घूम रहे हैं। इतना ही नहीं हर म्यूटेशन के साथ कोरोनो वायरस बहुत फिट भी हो रहा है। ऐसे में इस बात की बहुत ज्यादा संभावना है कि जो टीके अभी यूज में हैं, वो टाइम के साथ कम प्रभावी हो सकते हैं।
इस बीच समस्या उस वक्त आ सकती है, तब अगर कोई नया वैरिएंट उभरता है, जो मौजूदा की तुलना में बहुत फैलने वाला और घातक हो। जिस पर एक्सपर्ट्स की माने तो उसी समय नेक्स्ट जनरेशन का टीका बनाना एक चुनौती होगी। वायरस की उत्पत्ति और विकास पर काम करने वाले प्रोफसर डॉ. किरण कोंडाबागिल ने इस पर अपनी राय रखी है।
सब अलग-अलग तरह के वैरिएंट
चीफ साइंटिफिक मेंटर प्रो. किरण कोंडाबागिल ने कहा, "बेशक, ओमिक्रॉन वैरिएंट गंभीर संक्रमण पैदा नहीं कर रहे हैं, लेकिन क्या होगा अगर डेल्टा अभी भी कहीं छिपा हुआ है और एक नया उपवंश उत्परिवर्तित होता है।"
मिंट की रिपोर्ट के अनुसार चीफ साइंटिफिक मेंटर, बायोसाइंसेस और बायो-इंजीनियरिंग विभाग, आईआईटी बॉम्बे के प्रोफसर किरण ने स्वीकार किया कि दुनिया भर में घूम रहे वैरिएंट की संख्या को देखते हुए है उसी वक्त अगली जनरेशन की वैक्सीन बनाना एक चुनौती है। उन्होंने कहा, "जब 2019 में पहला टीका विकसित किया गया था, तो चिंता करने के लिए वायरस का केवल एक ही वैरिएंट था। अब कई अलग-अलग तरह के वैरिएंट आ चुके हैं, जिनमें से प्रत्येक के अपने अलग लक्षण हैं।"
किस तरह से बन सकती है नई वैक्सीन
वहीं अगली पीढ़ी के टीके को विकसित करने का एक संभावित तरीका यह है कि जिस तरह से फ्लू के टीके बनाए जाते हैं, उससे सीख ली जाए। जो हर साल शोधकर्ता फ्लू की स्टडी करते हैं। कोरोना के लिए भी ऐसा दृष्टिकोण का उपयोग किया जा सकता है।
दूसरी कोशिश यह कि एक ही टीका बनाने पर सारा ध्यान करना है, जो वायरस के सभी अब तक वैरिएंट के विरुद्ध प्रभावी होगा। हालांकि इस तरह टारगेट काफी बड़ा है, लेकिन कुछ शोधकर्ताओं का मानना है कि यह संभव है। एक सार्वभौमिक टीका बनाने की एक रणनीति यह है कि सामान्य एंटीजन की पहचान की जाए जो वायरस के सभी प्रकारों में मौजूद हैं और उनका उपयोग एक टीका विकसित करने के लिए किया जाए, जो उन सभी के खिलाफ प्रभावी होगा।












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